थोड़ा खुश हो लेते हैं
श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी
लखनऊ (उत्तर प्रदेश)
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चलो आज से थोड़ा
थोड़ा खुश होते हैं,
मन की दहलीज पर
नई उम्मीदें सजाते हैं!
बाहरी दुनिया से
क्यूँ आस लगाना
खुद से खुद में
उमंग भरते हैं!!
जितने भी घाव
मिले अब तक
मरहम बन दवा
उनकी ढूंढते हैं ,
सूकून मिले
अब दिल को
दर्द का दामन
छोड़ देते हैं!!
कल तक झुठलाया
था जिन राहों को
पथरीली समझ कर,
आज उन्हीं राहों
से रूबरू होते हैं!!
दुःस्वप्न था
जो दुःखद था,
अब मुस्कराहटों से
नाता जोड़ लेते हैं !!
हर एक जीव में
रब है, खुदा है,
ईश् और ईश्वर भी है,
इंसान बन, इनकी
तकलीफों को कुछ
कम करते हैं
इनके मासूम,
निःस्वार्थ प्रेम में
अपने आप को
सराबोर करते हैं
प्रभु की अनमोल
भेट है ये प्रकृति
ये जीव, ये जीवन
इनमे खुशियां बांट
स्वयं में बसे परमात्मा
से मुलाकात करते हैं!
चलो आज थोड़ा खुश होते हैं!!
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