कुण्डलियाँ छंद
रजनी गुप्ता "पूनम"
लखनऊ
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कुण्डलियाँ/दिठौना
१
लगा दिठौना माँ मुझे, ले जातीं बाजार।
और दिलातीं हैं वहाँ, चुनरी गोटेदार।।
चुनरी गोटेदार, खिलातीं रबड़ी हलुवा।
ललचाते हैं देख, मुरारी मोटू कलुवा।।
बोलीं वह पुचकार, खरीदो एक खिलौना।
माता का यह लाड़, सहेजूँ लगा दिठौना।।
२
लगा दिठौना देख कर, करते सब उपहास।
बोल रहे हैं सब मुझे, मत आना तुम पास।।
मत आना तुम पास, न कोई रंगत गोरी।
मोटा- सा है गात, सभी करते बरजोरी।।
सुन कर मेरी बात, उतारें माँ धड़कौना।
लिया बलैयाँ खूब, दुबारा लगा दिठौना।।
कुण्डलियाँ/पैसा
३
पैसे दो अम्मा मुझे, जाऊँगी बाजार।
लेने गुड़िया के लिये, लहँगा गोटेदार।।
लहँगा गोटेदार, सितारे सलमा वाला।
चुनरी होगी लाल, गले की लूँगी माला।।
गजरा लाऊँ श्वेत, सजेगी चोटी ऐसे।
जैसे चंदा रात, मुझे दो अम्मा पैसे।।
४
पैसे के बल पर बसे, बेटी का संसार।
आँखों में सपने लिये, बाप खड़ा लाचार।।
बा...