उम्मीदों की भोर …
भीमराव झरबड़े 'जीवन'
बैतूल (मध्य प्रदेश)
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कष्टों की काली रजनी का, आया अंतिम छोर।
दो गज की दूरी पर बैठी, उम्मीदों की भोर।।
घूम रही है हवा विषैली, बन कर काला नाग।
खुशियों के घर जला रही है, श्मशानों की आग।।
कानों में घोला है दुख ने, त्राहि माम का शोर।
दो गज की दूरी पर बैठी, उम्मीदों की भोर।।१
डोल गया है बुरे वक्त में, लालच का ईमान।
श्वासों का सौदा करते हैं, पग-पग पर शैतान।।
काट रहे हैं चाँदी निर्मम, भूखे आदमखोर।
दो गज की दूरी पर बैठी, उम्मीदों की भोर।।२
एड़ी ऊँची कर पूरब में, झाँक रही सब बाम।
कोई सूरज आकर बाँचे, खुशियों के पैगाम।।
विरह वेदना की खबरें तो, बिखरी हैं चहुँओर।
दो गज की दूरी पर बैठी, उम्मीदों की भोर।।३
हाथों थामे रखना 'जीवन', धीरज की पतवार।
स्वागत करने बैठे तट पर, करुणा के उद्गार।।
सरक रहा है धीरे-धीरे, अपने ओर अँजोर।
दो गज की दूरी पर बैठी, उम्मीदों की भोर।।...