पिता हमारे हैं जनक
पंकज शर्मा "तरुण"
पिपलिया मंडी (मध्य प्रदेश)
********************
पिता हमारे हैं जनक, जिनके हम हैं अंश।
इनका ऋण उतरे तभी, बढ़े हमारा वंश।।
पूर्वज सारे तृप्त हों, ऐसा करें उपाय।
संत सभी कहते यही, इनकी मानें राय।।
श्राद्ध पक्ष में कीजिए, तर्पण कह श्री राम।
पुण्य मिलेगा ज्यों किया, हमने चारों धाम।।
स्वार्थ पूर्ति को त्याग कर, करते पूजा पाठ।
उनके ही बढ़ते दिखे, सुख वैभव अरु ठाठ।।
जपूं निरंतर आपको, शिव शंकर भगवान।
विनती बस इतनी करूं, मिले भक्ति का दान।।
सब ही पूर्वज पूज्य मम, रखना सिर पर हाथ।
चरण कमल में है झुका, सब परिजन का माथ।।
साधन अगणित हो गए, बिगड़ी सब की चाल।
हर पल खोजे आदमी, कहां मिलेगा माल।।
मानवता जीवित रहे, बढ़े परस्पर प्यार।
अगली पीढ़ी को तरुण, देना यह संस्कार।।
गौ रक्षा तो पुण्य है, कहते संत सुजान।
इसकी सेवा कीजिए, खूब बढ़ेगी शान।।
गलत राह से ...