जमाना जालिम है
आशीष तिवारी "निर्मल"
रीवा मध्यप्रदेश
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बचकर रहना यार, जमाना जालिम है
हो जाओ होशियार, जमाना जालिम है।
अपनापन, भाईचारा खत्म हो चुका है
है रिश्तों में व्यापार, जमाना जालिम है।
दिन प्रति दिन देखो क्या खूब बढ़े हैं
लुच्चे, टुच्चे, झपटमार, जमाना जालिम है।
नारी सुरक्षा के दावे भी खोखले साबित
होती तेजाबी बौछार, जमाना जालिम है।
रपट लिखाने कभी जो जाओ थाने
रिश्वत मांगे थानेदार, जमाना जालिम है।
न्याय, सत्य, निष्ठा, ईमान हुआ है बौना
भ्रष्टाचार ही शिष्टाचार, जमाना जालिम है।
हो जरूरत यदि कभी धर्म रक्षा के लिए
लो हाथ में तलवार, जमाना जालिम है।
परिचय :- कवि आशीष तिवारी निर्मल का जन्म मध्य प्रदेश के रीवा जिले के लालगांव कस्बे में सितंबर १९९० में हुआ। बचपन से ही ठहाके लगवा देने की सरल शैली व हिंदी और लोकभाषा बघेली पर लेखन करने की प्रबल इच्छाशक्ति ने आपको अल्प समय में...