मुसाफिर
पवन जोशी
रामगढ़- महूगांव महू (म. प्र.)
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राहें तांक रही है
चल मुसाफिर चलते जा।
मंजिल बाकी है
रोड़ो को बस छलते जा।।१
धूप है दोपहर की
तो क्या शाम भी तो आएगी।
बेकार नहीं वो सीखें
हर ठोकर काम ही तो आएगी।।
कांटे भी होंगें
जख्म चुभन तक सहते जा।
राहें तांक रही है
चल मुसाफिर चलते जा।।२
अपने साये सी परछाई
को तू छांव बना।
गहरा है दरिया तू चुन
तिनका और नाव बना।।
सुन जग के ताने
उन तानो से अपनी तान बना।
आते जाते है ढेरों
हट कर अपनी पहचान बना।।
आस जीत की
लक्ष्य आँखों में बस जगते जा।।
राहें तांक रही है
चल मुसाफिर चलते जा।।३
थकान तो लगती है
ठहर दम भर पर रुक मत जाना।
बैठै है वो लेकर सांचे
आकर झांसे में झुक मत जाना।।
ऊंची कर उड़ान ये अपनी
के कोई छू न पाए।
बरसेंगें बादल तो छा एसा
के छप्पर चू न पाए।।
तेज भले हो दरिया
मौके तक धारा सगं बहते जा।
राहें तांक रही है
चल मुसाफिर चलते जा।।४
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