
विरेन्द्र कुमार यादव
गौरा बस्ती (उत्तर-प्रदेश)
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मिटटी की बनी ये जो कुम्हार का दीया है,
हमारी सांस्कृति तथा परम्परा को जीवित किया है।
दीया हमारी सास्कृति विरासत की ढाल है,
तमसो मां ज्योति की कायम मिसाल है।
मिट्टी की दीया हम भारतीय की पहली पसंद है,
आधुनिक युग में भी दिया का प्रयोग नहीं बंद है।
दीये से आती हमारी मातृ भूमि की सोधी-सोधी सुगंध है,
हम सब का इस दीये से बहुत पुराना सम्बंध है।
दीयों का पर्व मन भावनी दीपावली आई है,
हर घर-घर की सफाई और रंगाई कराई है।
टूटे-फूटे पुराने बर्तनों को नये में बदलवाई है,
मिट्टी के दिये हम सभी के मन को लुभाई है।
माताए और बहने मिट्टी के दीये खरीद कर लाई हैं,
घर को खूब अच्छे से खूबसूरत सजाई हैं।
मिट्टी के दीये से अपने घर में प्रकाश फैलायेगी,
दीपावली के पावन पर्व को हँसी-खुशी मनायेगी।
दीपावली दीपो का पर्व बहुत नजदीक है,
ये मिट्टी के दीये हमारीआस्था व दीप पर्व का प्रतिक है।
हम भारतीय देशहित व जागरुकता के लिए मिटटी दिये जलायेगे,
इस दीपावली हम सभी चाईनीज झालर नहीं लायेगे।
हम भारतीय मिट्टी के दिये की रोशनी से अंधरे को भगायेगे,
हम अपनी भारतीय सास्कृति को कभी नहीं भुलायेगे।
हम सब की देश के प्रति यही सच्ची सेवा है,
दीपावली के एकमात्र पूज्यनीय देवी लक्ष्मी और गणपति देवा हैं।
दीये की ज्योति से अपने-अपने घर में हम जलायेगे,
दीपावली हँसी-खुशी से हम मनायेगे।
निवासी : गौरा बस्ती (उत्तर-प्रदेश)
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है।
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