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ग़ज़ल

जिजीविषा
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जिजीविषा

वीणा वैष्णव "रागिनी"  कांकरोली ******************** रोज डर डर के, जिंदगी हर पल ऐसे जी रही थी मैं। तेज आंधी जब चली, तिनके को निहार रही थी मैं। कभी इधर उड़ा कभी उधर, ऐसे उड गिर रहा था वो, हर बार, एक नाकाम कोशिश किए जा रहा था वो, एक झोंका ऐसा आया, उसे उड़ता देख रही थी मैं। मिलती है सफलता, यहीं बैठे सब सोच रही थी मैं बरसों पड़ा था, गलती से आंगन के किसी कोने में, आज आसमान में, सपने सच होते देख रही थी मैं। सब्र फल मीठा, ये आज हकीकत होते देखा मैंने, वरना खो देता अस्तित्व, यही सोच डर रही थी मैं। मंजिल मिली होगी, या कहीं भटक गया होगा वो, यही प्रश्न दिमाग रख, अब परेशान हो रही थी मैं। जिजीविषा रख वो उड़ा, यह भी तो कम नहीं था। गिरेगा उठेगा मिलेगी मंजिल, खुश हो रही थी मैं। कहती वीणा धरा वो मरा, जो कुछ भी ना किया। हिम्मत मिली, आखिरी पड़ाव ऐसे लड़ रही थी मैं। . परिचय : कांकरोली निवासी वीणा वैष...
दिल अश्कों से जला गये
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दिल अश्कों से जला गये

विवेक रंजन 'विवेक' रीवा (म.प्र.) ******************** धुआँ दूर उठता रहा वो दिल अश्कों से जला गये, धुंध छटी तो फिर भी आँसू रुके नहीं छलछला गये। यादों के भीगे दर्पण में वो खुद को खोजते ही रहे, पलकें फिर से सजल हुईं और अक्स धुँधला गये। कैसे और भला किसको फूलों के हार दिये जायें, बाग़ेवफा में जाने क्यों सब गुलदस्ते कुम्हला गये। चुप रहने की ठानी थी जाने क्यों मौसम बदल गया, वो प्यार का इज़हार कर खामोश लब सहला गये। अपने तो सफर का सबब है मुख्तसर 'विवेक', उनकी राहों में फूल बिछाते हम काँटों पे चला करें। . परिचय :- विवेक रंजन "विवेक" जन्म -१६ मई १९६३ जबलपुर शिक्षा- एम.एस-सी.रसायन शास्त्र लेखन - १९७९ से अनवरत.... दैनिक समय तथा दैनिक जागरण में रचनायें प्रकाशित होती रही हैं। अभी हाल ही में इनका पहला उपन्यास "गुलमोहर की छाँव" प्रकाशित हुआ है। सम्प्रति - सीमेंट क्वालिटी कंट्रोल कनसलटेंट के रूप में वि...
मजबूरियां
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मजबूरियां

धैर्यशील येवले इंदौर (म.प्र.) ******************** माना आपकी सल्तनत बड़ी है पर हमारे दम से ही तो खड़ी है आप,आप है, बराबरी कैसे किसकी ऊँचाई वक़्त से बड़ी है कई मजबूरियों से घिरा इंसान है खा ले चुपके से डांट जो पड़ी है कट रही है जिंदगी समझौतों पर खुद्दारी से घर की जरूरतें बड़ी है दिल दरक गया है कोई बात नही जज्बात से, पेट की आग बड़ी है क्यों नही लढ् लेता तू, धैर्यशील, जिंदगी रब के भरोसे पे खड़ी है . परिचय :- नाम : धैर्यशील येवले जन्म : ३१ अगस्त १९६३ शिक्षा : एम कॉम सेवासदन महाविद्याल बुरहानपुर म. प्र. से सम्प्रति : १९८७ बैच के सीधी भर्ती के पुलिस उप निरीक्षक वर्तमान में पुलिस निरीक्षक के पद पर पीटीसी इंदौर में पदस्थ। सम्मान - हिंदी रक्षक मंच इंदौर (hindirakshak.com) द्वारा हिंदी रक्षक २०२० सम्मान आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाश...
दुआ नहीं आती
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दुआ नहीं आती

नवीन माथुर पंचोली अमझेरा धार म.प्र. ******************** पास जब तक दुआ नहीं आती। रास कोई दवा नहीं आती। कौनसा फूल है बग़ीचे में, जिसको छूकर हवा नहीं आती। कुछ रही छेड़ छाड़ भी जिम्में, वरना यूँ ही क़ज़ा नहीं आती। है हिदायत ही दूर रहने की, क्यूँ कहें की वफ़ा नहीं आती। वक़्त भी शर्मसार है उनसे, जिनको ख़ुद पर हया नहीं आती। साथ मिलकर संभाल लो ऐसी, मुश्किलें हर दफ़ा नहीं आती। . परिचय :- नाम - नवीन माथुर पंचोली निवास - अमझेरा धार म.प्र. सम्प्रति - शिक्षक प्रकाशन - देश की विभिन्न पत्रिकाओं में गजलों का नियमित प्रकाशन, तीन ग़ज़ल सन्ग्रह प्रकाशित। सम्मान - साहित्य गुंजन, शब्द प्रवाह। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, हिंदी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, हिंदी मे...
मरना अचल-अटल है
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मरना अचल-अटल है

रशीद अहमद शेख 'रशीद' इंदौर म.प्र. ******************** जग में कोरोना के डर से ऐसा अदल-बदल है! सड़कों पर सन्नाटा पसरा घर में चहल-पहल है! अब सतर्क हो गया आदमी साये से भी डरता, अपने ही घर-आँगन में अब चलता संभल-संभल है! क़ुर्बत गुमसुम आज हुई दूरी ने जश्न मनाया, तीन-तीन फुट का अन्तर अब सबके अगल-बगल है! औरत हो या मर्द सभी के चेहरों पर है पर्दा, नज़र-नज़र दर्शन को तरसे हसरत विकल-विकल है! 'रशीद' कोरोना है कारण जाना एक दिवस है, जब तक जीवित रहें सुरक्षित, मरना अचल-अटल है! . परिचय -  रशीद अहमद शेख 'रशीद' साहित्यिक उपनाम ~ ‘रशीद’ जन्मतिथि~ ०१/०४/१९५१ जन्म स्थान ~ महू ज़िला इन्दौर (म•प्र•) भाषा ज्ञान ~ हिन्दी, अंग्रेज़ी, उर्दू, संस्कृत शिक्षा ~ एम• ए• (हिन्दी और अंग्रेज़ी साहित्य), बी• एससी•, बी• एड•, एलएल•बी•, साहित्य रत्न, कोविद कार्यक्षेत्र ~ सेवानिवृत प्राचार्य सामाजिक गतिविधि ~ मार्गदर्शन औ...
दिखता हैं ख़ौफ़
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दिखता हैं ख़ौफ़

निर्मल कुमार पीरिया इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** दिखता हैं ख़ौफ़ कितना, आज फिजाओं में, घोला जहर हैं किसने, बहती इन हवाओँ में... दूर से ही वो पूछते है, खैरियत कि कैसे हो? हैं झिझक ये के सी, हमसे मिलने मिलाने में... खुदगर्जी कहे उनकी, या समझें की बेबसी, दो कदम सँग ना आये, यु रिवाज निभाने में... हर शख्स आज हैं डालें, नकाब सा चेहरे पे, हया इतनी कब से हैं आईं, बेहया जमाने मे... इब्तिदा-ए-इश्क़ ये, मुक़ाम बाकी हैं "निर्मल", दम भर, जा गुजर, ना ज़ोर बेकस जमाने मे... . परिचय :- निर्मल कुमार पीरिया शिक्षा : बी.एस. एम्.ए सम्प्रति : मैनेजर कमर्शियल व्हीकल लि. निवासी : इंदौर, (म.प्र.) शपथ : मेरी कविताएँ और गजल पूर्णतः मौलिक, स्वरचित और अप्रकाशित हैं आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, हिंदी रक्षक मंच पर अपन...
उनको जगाइये
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उनको जगाइये

विवेक रंजन 'विवेक' रीवा (म.प्र.) ******************** जन्नत का तसव्वुर ना अभी दिल में लाइये, दोज़ख में ही बस प्यार की शम्मा जलाइये। दिल में उमड़ते ज्वार कब रफ्तार पकड़ लें, तूफाँ मचल ना जाये सनम मान जाइये। वक़्त की गिरफ़्त में कैदी हों कब तलक, दिल को तो महका हुआ गुलशन बनाइये। रंजोगम के फैसले किस्मत पे छोड़िये, बस ज़िन्दगी है प्यार, यही प्यार पाइये। क़ाफ़िर तो है हर शख्स जो इंसान बना है, तनहा सी राहों में नये दीपक जलाइये। खोये हुए हैं लोग क्यों गुमनाम से ‘विवेक, ज़रा प्यार से पुकार कर उनको जगाइये। . परिचय :- विवेक रंजन "विवेक" जन्म -१६ मई १९६३ जबलपुर शिक्षा- एम.एस-सी.रसायन शास्त्र लेखन - १९७९ से अनवरत.... दैनिक समय तथा दैनिक जागरण में रचनायें प्रकाशित होती रही हैं। अभी हाल ही में इनका पहला उपन्यास "गुलमोहर की छाँव" प्रकाशित हुआ है। सम्प्रति - सीमेंट क्वालिटी कंट्रोल कनसलटेंट के रूप में विभिन्न ...
बेबसी सी हुई जिंदगी
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बेबसी सी हुई जिंदगी

नवीन माथुर पंचोली अमझेरा धार म.प्र. ******************** बेबसी सी हुई जिंदगी इन दिनों। भूल ही हम गए शायरी इन दिनों। ख़ौफ़ इक सारी दुनियाँ में छाया हुआ, इस तरह कुछ हवाएँ चली इन दिनों। घर से निकले तो लोगों ने चमका दिया, यूँ नहीं ये सफ़र लाज़मी इन दिनों। शब अंधेरे उठाने को तैयार है, आग बरसा रही चाँदनी इन दिनों। लग रही हो हमारी जुबाँ तल्ख़ गर, है किसी से सिला न बदी इन दिनों। दूरियाँ ही सलामत रखेगी तुम्हें, ये रिवायत निभा लो सभी इन दिनों। . परिचय :- नाम - नवीन माथुर पंचोली निवास - अमझेरा धार म.प्र. सम्प्रति - शिक्षक प्रकाशन - देश की विभिन्न पत्रिकाओं में गजलों का नियमित प्रकाशन, तीन ग़ज़ल सन्ग्रह प्रकाशित। सम्मान - साहित्य गुंजन, शब्द प्रवाह। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, हिंदी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानिया...
शौहरत जमाना शहर
ग़ज़ल

शौहरत जमाना शहर

प्रमोद त्यागी (शाफिर मुज़फ़्फ़री) (मुजफ्फरनगर) ******************** यह शौहरत जमाना शहर आपका है हर शै है नशीली असर आपका है तुम्हें हो मुबारक हसीं जामे उल्फत जो मैंने पिया वो जहर आपका है रूको या रखो दिल में मंजिल की हसरत कदम है तुम्हारे सफर आपका है पाने है दिल गर जो खोए हुए हैं उधर है हमारा इधर आपका है भटकते भटकते न मायूस होना जो आओ इधर तो ये घर आपका है पड़ा है कोई आपके आस्तां पर उठा लो उसे वो अगर आपका है ठुकरा दो चाहे गले से लगा लो "शाफिर" तो बस उम्र भर आपका है . परिचय :- प्रमोद त्यागी (शाफिर मुज़फ़्फ़री) ग्राम- सौंहजनी तगान जिला- मुजफ्फरनगर प्रदेश- उत्तरप्रदेश आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, हिंदी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, हिंदी में ...
तुम्हे गर भूलना चाहूं
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तुम्हे गर भूलना चाहूं

दामोदर विरमाल महू - इंदौर (मध्यप्रदेश) ******************** तुम्हे गर भूलना चाहे तो अक्सर याद आते हो। हमे गर चोट लगती है तो क्यों आंसू बहाते हो। तुम्ही ने की है गर ये हंसी ज़िन्दगी मेरी बर्बाद, फिर क्यों मुझपे ये बदनुमा इल्ज़ाम लगाते हो। हम तो किया करते थे कोशिशें तुम्हे हंसाने की, तुम हो ज़ालिम जो मुझे हर एक पल रुलाते हो। तुमसे बिछड़े हुए कितने बरस बीत गए देखो, फिर क्यों तुम मुझे अपने ही पास... बुलाते हो। जब बचा ही नही कुछ तेरे और मेरे दरमियान, तो क्यों गैरो से अक्सर मेरी खैरियत मंगाते हो। बहुत देर की अपने आपको साबित करने की, अब फ़िज़ूल में क्यों इतना झूठा प्यार जताते हो। बुरे तुम नही थे बुरा तो दिल है तुम्हारा शायद, क्यों अपने अंदर तुम ये सब देख नही पाते हो। हम अंजान नही है तुम्हारी ज़िंदगी से समझे, पता है तुम अब भी औरों से दिल लगाते हो। . प...
उजालों की निशानी
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उजालों की निशानी

पुरु शर्मा अशोकनगर (म.प्र.) ******************** . उजालों की निशानी संभाले रखना उम्मीदों की लौ जलाऐ रखना गुजरेंगी मुश्किलों की हवाएँ भी बस होठों पे मुस्कुराहट बनाएँ रखना मंजिलें मुकम्मल होंगी जरूर, बस सदाक़त का सफ़ीना थामे रखना ग़र हैं बेसबब मोहब्बत वतन से तो अमन-ए-पैगाम बनाए रखना यह धरती हैं माँ का आँचल इसकी आन को संभाले रखना . परिचय :-  पुरु शर्मा निवास : बहादुरपुर, जिला - अशोकनगर (म.प्र.) कई समाचार पत्रों में लेख व कविताएँ प्रकाशित, निरंतर लेखन कार्य जारी। वर्तमान में भोपाल में स्नातक की पढाई में अध्ययनरत आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, हिंदी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख...
दस्तक
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दस्तक

धैर्यशील येवले इंदौर (म.प्र.) ******************** अदब से रहने का ये सिला मिला पाक दामन पे किचड़ उछाल रहे हैं। क्या मैं इतना मशहूर हो गया हूं मुझे बदनाम कर अपना नाम कर रहे हैं। मुद्दई वो गवाह वो मुंसिफ भी वो मुल्ज़िम करार दे मुझे इंसाफ कर रहे है। किसे करेगा फरियाद नाइंसाफी की सभी हुक्मरान गहरी नींद सो रहे है। किसी से उम्मीद न कर इमदाद की सभी अपना अपना रंजोगम ढो रहे है। सितमगर हो सके तो बचाले अपना घर बद्दुआ ओ के साये तेरे दर पे दस्तक दे रहे है। . परिचय :- नाम : धैर्यशील येवले जन्म : ३१ अगस्त १९६३ शिक्षा : एम कॉम सेवासदन महाविद्याल बुरहानपुर म. प्र. से सम्प्रति : १९८७ बैच के सीधी भर्ती के पुलिस उप निरीक्षक वर्तमान में पुलिस निरीक्षक के पद पर पीटीसी इंदौर में पदस्थ। सम्मान - हिंदी रक्षक मंच इंदौर (hindirakshak.com) द्वारा हिंदी रक्षक २०२० सम्मान आप...
उनसे जब टकराई आँखें
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उनसे जब टकराई आँखें

नवीन माथुर पंचोली अमझेरा धार म.प्र. ******************** उनसे जब टकराई आँखें। तब कितनी घबराई आँखें। देखे उनके आँसू थोड़े, अपनी भी डबराई आँखें। दुःख के लम्हों में लगती है, हो जैसे पथराई आँखें। थाह नहीं मिल पाया इनका, सागर सी गहराई आँखे। भीतर कितना हाल छुपाये, रहती जग बिसराई आँखें। पाकर सब कुछ खोया उसने, जिसने ख़ूब चुराई आँखें। . परिचय :- नाम - नवीन माथुर पंचोली निवास - अमझेरा धार मप्र सम्प्रति - शिक्षक प्रकाशन - देश की विभिन्न पत्रिकाओं में गजलों का नियमित प्रकाशन। तीन ग़ज़ल सन्ग्रह प्रकाशित। सम्मान - साहित्य गुंजन, शब्द प्रवाह। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, हिंदी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, हिंदी में टाईप करके हमें hindirakshak17@gmail.c...
दोहा गजल
ग़ज़ल, दोहा

दोहा गजल

रजनी गुप्ता "पूनम" लखनऊ ******************** धारण कर लो फिर गरल, शिवशंकर भगवान। धरती कर दो फिर धवल, शिवशंकर भगवान।। भस्मासुर के राज में, जीना था दुश्वार। जीवन कर दो फिर सरल, शिवशंकर भगवान। गाता जग गुणगान है, त्रयंबकं यह रूप। मानस कर दो फिर तरल, शिवशंकर भगवान।। चंद्र सुशोभित माथ पर, डम-डम-डमरू हाथ। तांडव कर दो फिर अमल, शिवशंकर भगवान।। गण-गणपति-गौरादि अरु, सजते भूत-भभूत। जागृत कर दो फिर अनल, शिवशंकर भगवान।। . परिचय : पूनम गुप्ता साहित्यिक नाम :- रजनी गुप्ता 'पूनम' पिता :- श्री रामचंद्र गुप्ता पति :- श्री संजय गुप्ता जन्मतिथि :- १६ जुलाई १९६७ शिक्षा :- एम.ए. बीएड व्यवसाय :- गृहणी प्रकाशन :- हिंदी रक्षक मंच इंदौर म.प्र. के  hindirakshak.com पर रचना प्रकाशन के साथ ही कतिपय पत्रिकाओं में कुछ रचनाओं का प्रकाशन हुआ है सम्मान :- समूहों द्वारा विजेता घोषित किया जाता रहा है। दो बार नागरिक अभ...
उजड़ी उजड़ी बस्ती
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उजड़ी उजड़ी बस्ती

शाहरुख मोईन अररिया बिहार ******************** उजड़ी उजड़ी बस्ती बिखरे पत्थर देख रहा हूं। मैं भी ज़ालिम का लश्कर देख रहा हूं। सोच में हूं कब बदलेगा मुकद्दर गरीबों का, धनवानों के हाथों में जो मैं खंजर देख रहा हूं। भूख गरीबी में उनको बेघर देख रहा हूं, हीरे-मोती वाली धरती को मैं बंजर देख रहा हूं। फटे लिवास बेरोजगारों की कतारें ये कैसा मंज़र, सियासी चेहरों में मैं अजगर देख रहा हूं। नकली दुध, ज़हरीला खाना, कसाई डॉक्टर, बापु मैं भी तेरे तीनों बंदर देख रहा हूं। महंगाई की मार, भ्रष्टाचार की लाठी, हाल गरीबों के क्यों इतने बदतर देख रहा हूं। कांटी जो ज़ुबान उसने तो कलम कहां गूंगी है, शाहरुख़ तुझमें पौरस भी, तुझमें सिम्न्द्र देख रहा हूं। . परिचय :- शाहरुख मोईन अररिया बिहार आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, हि...
रात भर
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रात भर

प्रमोद त्यागी (शाफिर मुज़फ़्फ़री) (मुजफ्फरनगर) ******************** रात भर आपकी याद आती रही चाँदनी मेरे दिल को जलाती रही मानिन्दे शमाँ मैं भी जलता रहा लौ शमाँ की मुझे आजमाती रही उनकी आँखों की मय का असर देखिए ज़िंदगी उम्रभर लडखडाती रही साँसें उनके बिना मैं भी गिनता रहा एक आती रही एक जाती रही जिसपे मरते रहे हो के अंजान सी उनकी ज़ल्फें यूँ ही बल खाती रही बेवफा वो रहे फिर भी क्यूँ आजतक उनकी तस्वीर हमको रुलाती रही वो गये जब से "शाफिर" क्यूँ आँखें तेरी झूठ की आड में मुस्कुराती रही . परिचय :- प्रमोद त्यागी (शाफिर मुज़फ़्फ़री) ग्राम- सौंहजनी तगान जिला- मुजफ्फरनगर प्रदेश- उत्तरप्रदेश आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, हिंदी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, ले...
बासी रोटी
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बासी रोटी

प्रेम प्रकाश चौबे "प्रेम" विदिशा म.प्र. ******************** बासी रोटी, प्याज नौन से। उतरत नइं है, कहें कौन से? बहुएं सुनें न मोड़ी-मोड़ा, को सुन रओ है? रोएं जौन से। गईया खों अब, चरबन नइयां, पौवा पे, आ गई पौन से। हम ने खाये दूध निपनिया, हम पुसात जा, निरे धौंन से? घर-घर में मटयारे चूल्हे, कहो "प्रेम" का भलौ मौन से? . परिचय :-  प्रेम प्रकाश चौबे साहित्यिक उपनाम - "प्रेम" पिता का नाम - स्व. श्री बृज भूषण चौबे जन्म -  ४ अक्टूबर १९६४ जन्म स्थान - कुरवाई जिला विदिशा म.प्र. शिक्षा - एम.ए. (संस्कृत) बी.यु., भोपाल प्रकाशित पुस्तकें - १ - "पूछा बिटिया ने" आस्था प्रकाशन, भोपाल  २ - "ढाई आखर प्रेम के" रजनी  प्रकाशन, दिल्ली से अन्य प्रकाशन - अक्षर शिल्पी, झुनझुना, समग्र दृष्टि, बुंदेली बसन्त, अभिनव प्रयास, समाज कल्याण व मकरन्द आदि अनेक  पाक्षिक, मासिक, त्रैमासिक पत...
फिर तैयारी रख
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फिर तैयारी रख

डाॅ. हीरा इन्दौरी इंदौर म.प्र. ******************** परवाना सरकारी रख। राग सभी दरबारी रख।। दाल रखी तरकारी रख। रोटी गरम करारी रख।। आग जले चाहे दिल में। होठों पर फुलवारी रख।। जैसे मिसरी घोली हो। बोली मीठी प्यारी रख।। करजा लेने दैने की। दूर अलग बीमारी रख।। नंगा नाचे सङकों पर। कुछ तो परदादारी रख।। बात सही तेरी लेकिन। कुछ तो बात हमारी रख।। गीत गजल पढना है तो। "हीरा" फिर तैयारी रख।। . परिचय :-  डाॅ. राधेश्याम गोयल, प्रचलित नाम डाॅ. "हीरा" इन्दौरी  जन्म दिनांक : २९ - ८ - १९४८ शिक्षा : आयुर्वेद स्नातक साहित्य लेखन : सन १९७० से गीत, हास्य, व्यंग्य, गजल, दोहे लघु कथा, समाचार पत्रों मे स्वतंत्र लेखन तथा विभिन्न पत्रिकाओं में रचनाओं का पचास वर्षों से प्रकाशन अखिल भारतीय कविसम्मेलन, मुशायरों में शिरकत कर रचना पाठ, आकाशवाणी तथा दूरदर्शन पर रचना पाठ विभिन्न साहित्यिक सामाजिक संस्थाओं द्वारा सम्...
अंजुमन छोड दे
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अंजुमन छोड दे

प्रमोद त्यागी (शाफिर मुज़फ़्फ़री) (मुजफ्फरनगर) ******************** इस नये हिंद की अंजुमन छोड दे अब तु अपना पुराना चलन छोड दे सिर्फ मिट्टी नहीं हर गुल है अज़ीज़ ख़ुशबू बन के महक या चमन छोड दे टुकड़े टुकड़े बिखर जायेंगे जिस्म के बंद मुठ्ठी के चैनों-अमन छोड दे नाज़ है जिन परों पे उखड जायेंगे ख़ैर है अब इसी में गगन छोड दे दोस्ती में दगा की जो आदत तेरी तु जो करता रहा आदतन छोड़ दे इश्क करना तुझे ना हो मुमकिन अगर फिर ये झूठी मुहब्बत का फन छोड़ दे सब कुर्बान है इस वतन के लिए "शाफिर" के लिए बस कफन छोड़ दे . परिचय :- प्रमोद त्यागी (शाफिर मुज़फ़्फ़री) ग्राम- सौंहजनी तगान जिला- मुजफ्फरनगर प्रदेश- उत्तरप्रदेश आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, हिंदी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताए...
कोई हमारा न हो सका
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कोई हमारा न हो सका

शरद जोशी "शलभ" धार (म.प्र.) ******************** हमको कभी किसी का सहारा न हो सका।। दरिया ए इश्क में कई गोते लगा लिए अपने क़रीब कोई किनारा न हो सका।। मिलने की कोशिशें भी कई उनसे की मगर उनकी नज़र का कोई इशारा न हो सका कितना उनसे प्यार उन्हें कैसे हम कहें उनसे ज़ियादा कोई प्यारा न हो सका।। दिल में हमारे हर लम्हा उनका मुक़ाम है उनसा मुक़ीम कोई दुबारा न हो सका ग़र नहीं तो ज़िन्दगी जीना मुहाल है। उनके बिना"शलभ"का गुज़ारा न हो सका।। . परिचय :- धार (म.प्र.) निवासी शरद जोशी "शलभ" कवि एवंं गीतकार हैं। विधा- कविता, गीत, ग़ज़ल। आप विभिन्न साहित्यिक संस्थाओं द्वारा वाणी भूषण, साहित्य सौरभ, साहित्य शिरोमणि, साहित्य गौरव सम्मान से सम्मानित हैं। म.प्र. लेखक संघ धार, इन्दौर साहित्य सागर इन्दौर, भोज शोध संस्थान धार आजीवन सदस्य हैं। आप सेवानिवृत्त शिक्षक हैं, अखिल भारतीय साहित्य परिषद धार (म.प्र.) के जिला अध्...
उनसे कह दो
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उनसे कह दो

प्रमोद त्यागी (शाफिर मुज़फ़्फ़री) (मुजफ्फरनगर) ******************** उनसे कह दो फिर दिलकश बाहर लाया हूँँ लुट गया था जो उनका करार लाया हूँँ उनको देख लूँ बस इतनी सी तमन्ना लेकर जिंदगी से मैं कुछ लम्हे उधार लाया हूँँ उदास क्यों हो क्या जख्म देने बाकी है कदम बढ़ाओ खंजर लो आबदार लाया हूँँ यकीं नहीं तो बस एक नजर काफी है अपनी गुमनामी का एक इश्तिहार लाया हूँँ नुमाइश क्या करूं छोड़ो भी छिपे रहने दो हजारों जख्म है उनमें से बस दो-चार लाया हूँँ मयकदे में जो आया तो तन्हाँ नहीं आया साथ मैं और भी इश्क के बीमार लाया हूँँ इबादत कर रहा हूं मानकर उनको खुदा "शाफिर" तिजारत वो करें उनके लिए बाजार लाया हूँँ . परिचय :- प्रमोद त्यागी (शाफिर मुज़फ़्फ़री) ग्राम- सौंहजनी तगान जिला- मुजफ्फरनगर प्रदेश- उत्तरप्रदेश आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित क...
दर्द-ए-ग़म
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दर्द-ए-ग़म

डॉ. बीना सिंह "रागी" दुर्ग छत्तीसगढ़ ******************** जब भी दर्द-ए-ग़म मिला हम सोचते रहे कब कैसे और कब मिला हम सोचते रहे शायद उम्मीद ए वफ़ा लगा रखी थी हमने मिली बेवफाई तो वजह हम खोजते रहे राज ए मोहब्बत जो ना बता सके उसे ख्वाबों में उससे बाराहा हम बोलते रहे रूख ए मौसम साखे गुल सा बदन मेरा यू अर्रजे नियाजी इश्क को हम रोकते रहे इश्क मोहब्बत माना एक छलावा है बीना गुनहगार समझ खुद को ही हम कोसते रहे. परिचय :- डॉ. बीना सिंह "रागी" निवास : दुर्ग छत्तीसगढ़ कार्य : चिकित्सा रुचि : लेखन कथा लघु कथा गीत ग़ज़ल तात्कालिक परिस्थिति पर वार्ता चर्चा परिचर्चा लोगों से भाईचारा रखना सामाजिक कार्य में सहयोग देना वृद्धाश्रम अनाथ आश्रम में निशुल्क सेवा विकलांग जोड़ियों का विवाह कराना उपलब्धि : विभिन्न संस्थाओं द्वारा राष्ट्रीय अंतर्राष्ट्रीय सम्मान द्वारा सम्मानित टीवी ...
रिश्ता मेरा
ग़ज़ल

रिश्ता मेरा

विवेक सावरीकर मृदुल (कानपुर) ****************** यहां के हर बाशिंदे से है रिश्ता मेरा मैं नहीं जानता एनआरसी क्या है सफर भर अपना शहर साथ रखो फिर मुंबईया औ बनारसी क्या है? दिल को समझा दो प्यार की बोली हिंदी, अंग्रेजी, उर्दू , फारसी क्या है? झूमो, नाचो कि अब तक जिंदा हो जिंदगी रक्खी उधार-सी क्या है ? जम्हूरियत बाँटने पर हो आमादा ये जुनूनी आरजू बेकार-सी क्या है . परिचय :-  विवेक सावरीकर मृदुल जन्म :१९६५ (कानपुर) शिक्षा : एम.कॉम, एम.सी.जे.रूसी भाषा में एडवांस डिप्लोमा हिंदी काव्यसंग्रह : सृजनपथ २०१४ में प्रकाशित, मराठी काव्य संग्रह लयवलये, उपलब्धियां : वरिष्ठ मराठी कवि के रूप में दुबई में आयोजित मराठी साहित्य सम्मेलन में मध्यप्रदेश का प्रतिनिधित्व, वरिष्ठ कला समीक्षक, रंगकर्मी, टीवी प्रस्तोता, अभिनेता के रूप में सतत कार्य, हिंदी और मराठी दोनों भाषाओं में समान रूप से लेखन। संप्रति : माख...
विरह का रोग
ग़ज़ल, दोहा

विरह का रोग

रजनी गुप्ता "पूनम" लखनऊ ******************** मुझको देखो आज फिर, लगा विरह का रोग। पिय बिन सूना साज फिर, लगा विरह का रोग। जोगन बनकर फिर रही, गाऊँ विरहागीत, भूल गई सब काज फिर, लगा विरह का रोग। बिसरी जग की रीत सब, खुद से हूँ अनजान। छुपा रही सब राज फिर, लगा विरह का रोग। प्रियतम जब से दूर हैं, बिखरा सब शृंगार। हृदय पड़ी है गाज फिर, लगा विरह का रोग। 'रजनी' तेरी याद में, तड़प रही दिन-रात। भूल गई सब लाज फिर, लगा विरह का रोग।। . परिचय : नाम :- पूनम गुप्ता साहित्यिक नाम :- रजनी गुप्ता 'पूनम' पिता :- श्री रामचंद्र गुप्ता पति :- श्री संजय गुप्ता जन्मतिथि :- १६जुलाई १९६७ शिक्षा :- एम.ए. बीएड व्यवसाय :- गृहणी प्रकाशन :- हिंदी रक्षक मंच इंदौर म.प्र. के  hindirakshak.com पर रचना प्रकाशन के साथ ही कतिपय पत्रिकाओं में कुछ रचनाओं का प्रकाशन हुआ है सम्मान :- समूहों द्वारा विजेता घोषित किया जाता रहा है। ...
काँटों ने महक
ग़ज़ल

काँटों ने महक

प्रमोद त्यागी (शाफिर मुज़फ़्फ़री) (मुजफ्फरनगर) ******************** काँटों ने महक दर्द ने आराम दिया है बोसा जो उसनें आज खुलेआम दिया है आगोश में शर्मा के वो आयें हैं इस कदर जैसे की किसी फर्ज़ को अंजाम दिया है अहसान दर्द का है जो हासिल हूए हमें मर जाते ख़ुशी से इन्होंने थाम लिया है साजिश है कोई या मेरे अब दिन बदल गये दुश्मन ने आज भर के मुझे जाम दिया है पैमाना जो ख़ाली मेरे लब से लगा रहा दुनिया ने इसे मयकशी का नाम दिया है उसनें जो निभाई है मुहब्बत में तिजारत हमनें भी उसको दाम सुबह शाम दिया है तुफान बहुत तेज है "शाफिर" जरा संभल हल्दी सी इक आहट ने ये पैगाम दिया है . परिचय :- प्रमोद त्यागी (शाफिर मुज़फ़्फ़री) ग्राम- सौंहजनी तगान जिला- मुजफ्फरनगर प्रदेश- उत्तरप्रदेश आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, हिंदी रक्षक मं...