क्या बताऊं
विजय गुप्ता
दुर्ग (छत्तीसगढ़)
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कलम करती सृजन कृपा दृष्टि मां से पाऊं
दुष्कर हालातों में, क्या समझूं क्या बताऊं।
मन पिंजरा विचित्र, चाहे कुछ भी भरना
है जो मन के अंदर, काश बने वो झरना
सोचो तुम खुद ही, क्या रखूं,क्या बहाऊं
विपरीत समय में, कुछ तो दिमाग लगाऊं
दुष्कर हालातों में क्या, समझूं क्या बताऊं।
मोबाइल नितांत जरूरी, बन गया जो आत्मा
राहों के दुरुपयोग में, बहुतों का हुआ खात्मा
बिन मोबाइल के अब, देखो कितना बौराउं
नए विचार की पैठ, मॉडल नया मंगाउँ
दुष्कर हालातों में, क्या समझूं क्या बताऊं।
नया युग चल रहा, साथ रहे सद्व्यवहार
खाली रहकर व्यस्त, अब कैसे जीवन पार
सुने नहीं समझे नहीं, कैसे खुद को जगाऊं
आत्मनिर्भर बनने, कितना बोध कराऊँ
दुष्कर हालातों में क्या, समझूं क्या बताऊं।
बिना अक्ल व मेहनत, काम हो आराम का
ज्ञान और मौका जहां, स्थान नहीं काम का
श्रेष्ठ यदि मिलता हो, खु...