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कविता

क्या बताऊं
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क्या बताऊं

विजय गुप्ता दुर्ग (छत्तीसगढ़) ******************** कलम करती सृजन कृपा दृष्टि मां से पाऊं दुष्कर हालातों में, क्या समझूं क्या बताऊं। मन पिंजरा विचित्र, चाहे कुछ भी भरना है जो मन के अंदर, काश बने वो झरना सोचो तुम खुद ही, क्या रखूं,क्या बहाऊं विपरीत समय में, कुछ तो दिमाग लगाऊं दुष्कर हालातों में क्या, समझूं क्या बताऊं। मोबाइल नितांत जरूरी, बन गया जो आत्मा राहों के दुरुपयोग में, बहुतों का हुआ खात्मा बिन मोबाइल के अब, देखो कितना बौराउं नए विचार की पैठ, मॉडल नया मंगाउँ दुष्कर हालातों में, क्या समझूं क्या बताऊं। नया युग चल रहा, साथ रहे सद्व्यवहार खाली रहकर व्यस्त, अब कैसे जीवन पार सुने नहीं समझे नहीं, कैसे खुद को जगाऊं आत्मनिर्भर बनने, कितना बोध कराऊँ दुष्कर हालातों में क्या, समझूं क्या बताऊं। बिना अक्ल व मेहनत, काम हो आराम का ज्ञान और मौका जहां, स्थान नहीं काम का श्रेष्ठ यदि मिलता हो, खु...
रक्षाबंधन
कविता

रक्षाबंधन

डॉ. पंकजवासिनी पटना (बिहार) ******************** रक्षाबंधन है आज! कई बार कह देते हैं लोग: "दो और लो" का पर्व इसे! लेकिन नहीं, मैं नहीं मानती यह!! आज तो "बहना" ने अपने हृदय की अनंत शुभेच्छाएं... उज्ज्वलतम स्नेहिल भावनाएँ... अनंत आशीष... दिव्य प्रार्थनाएँ... "भाई" के प्रति रेशम की पावन डोर में पिरो कर बांध डाली है उसकी कलाई पर ! अपने उत्कट स्नेह की अभिव्यक्ति की है उसने!! "परीक्षा" भी लेती है वह अपने "स्नेह" की!! जब पीहर सूना हो जाता है बाबुल की समर्थ दुलार से... और माँ की विकल प्रतीक्षा से...!! भाई का भी प्रण कुछ उपहारों के रूप में आया है बहना के समक्ष! उसकी हर परिस्थिति में रक्षा की... "बरगदी छत्रछाया" देने का आश्वासन बनकर! वह रक्षा करेगा उसकी: तमाम विपदाओं और प्रतिकूलताओं से... उबारेगा उसे तमाम दुर्बलताओं से... भरेगा अकूत, अटूट विश्वास उसके मन में: बनेगा हर सुख-दुख में उसका संबल और सह...
पत्थर और माटी
कविता

पत्थर और माटी

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************** पत्थर गिरा माटी पर माटी हो गई चूर पत्थर हुआ घमंड से भरपूर बोला अकड़ कर, देखा मेरा बल तुममें-मुझमें हैं कितना अंतर। माटी बोली सच कहा तुमनें पत्थर हैं बड़ा मुझमें और तुममें अंतर, मैं माटी तुम हो पत्थर, मैं देती जीवन जड़-चेतन कों, तुमसे मिलती केवल ठोकर, मैं खेतों में फसल ऊगाती, बागों में फू़ल महकाती, हरी-भरी धरती करती। पेड़-पौधे, फल-फूल, धरती का हर प्राणी, तुमसे होता आहत, रह जाते सब मन मारकर तुम देते केवल ठोकर, तुममें-मुझमें है अंतर मैं देती जीवन, तुम देते केवल ठोकर। परिचय :- शिवदत्त डोंगरे (भूतपूर्व सैनिक) पिता : देवदत डोंगरे जन्म : २० फरवरी निवासी : पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) घोषणा पत्र : प्रमाणित किया जाता है कि रचना पूर्णतः मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच पर अपन...
हे राम!
कविता

हे राम!

मनोरमा पंत महू जिला इंदौर म.प्र. ******************** हे राम! मर्यादा सिखाने क्यों अवतार लिया इस धरा पर? क्यों महामानव बने तुम, क्यों हर समय त्याग मूर्ति बने रहे ? क्यों विमाता की अनुचित माँग का नहीं किया प्रतिकार इक्ष्वाकु वंश की मर्यादा का, निरन्तर करते रहे निर्वाह अहिल्या मारिच, गरूड़ सबका उद्धार करते रहे, असुरो को मार मुनियों को जीवन दान देते रहे केवल लोक निंदा के कारण किया अपनी प्राण प्रिया का त्याग एक अँगुली उठने पर, सीता ने किया अग्नि दाह यह सब करते सहते तुम बन गये स्वयं पत्थर, जिसमें था एक रक्तरंजित मन तुम तो साधारण जन की तरह रो भी नहीं सकते थे, खुद की कोई इच्छा भी पूरी नहीं कर सकते थे हे राम! तभी तो बन सके तुम मर्यादा पुरूषोत्तम। परिचय :-  श्रीमती मनोरमा पंत सेवानिवृत : शिक्षिका, केन्द्रीय विद्यालय भोपाल निवासी : महू जिला इंदौर सदस्या : लेखिका संघ भोपाल जागरण, कर्मवी...
दोस्ती रिश्ता और दोस्त फरिश्ता
कविता

दोस्ती रिश्ता और दोस्त फरिश्ता

विशाल कुमार महतो राजापुर (गोपालगंज) ******************** मुशीबत की क्या औकात रहे, दोस्त खड़ा जब अपने साथ रहे, मुशीबत की क्या औकात रहे, दोस्त खड़ा जब अपने साथ रहे, बड़े नादान वो लोग जिन्हें, जिन्हें दोस्त में दुनिया दिखता नहीं, दोस्ती से बड़ी कोई रिश्ता नहीं औऱ दोस्त से बड़ा कोई फरिश्ता नहीं, जब दोस्त की दोस्ती, अपनी रंग दिखलाती हैं, हो जाये दोस्ती बेमिसाल, देख दुनिया दंग रह जाती हैं, एक सच्चे दोस्त की छाया, अपनी दोस्ती पे पड़ जाती हैं, तब ना जाने क्यों उन रिश्तों में, आत्मविश्वास बढ़ जाती है, दोस्ती हैं कलम-स्याही की, जो बिन स्याही कुछ लिखता नही दोस्ती से बड़ी कोई रिश्ता नहीं औऱ दोस्त से बड़ा कोई फरिश्ता नहीं, दोस्ती थी राम-सुग्रीव की, दोस्ती थी कृष्ण सुदामा की, युगों युगों तक बनी रही, क्या कहूं अब उस दोस्ताना की, करो दोस्ती, निभाओ दोस्ती, कभी बात न सुनो जमाना की, संग में सदा ही दोस्त रहे, कुछ खा...
ऊंची कुर्सी… नीचे काम
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ऊंची कुर्सी… नीचे काम

डॉ. कामता नाथ सिंह बेवल, रायबरेली ******************** बदल गया युग, बदल गये सब जीवन के आयाम। योगेश्वर! हम कब तक ढोयें कर्मयोग निष्काम।। युद्ध अधर्म-विरुद्ध‌‌‌ गये जीते, क्या धर्म-भरोसे, अश्वत्थामा,कर्ण गये मारे क्या पुण्य-करों से; कटे अंगूठे एकलव्य के कबतक करें प्रणाम?? अगर जुए में धर्मराज हारेंगे द्रुपद-सुता को, राम परीक्षा लेकर, वन भेजेंगे जनक-सुता को; तो समाज झेलेगा इसका निश्चित दुष्परिणाम।। यहां धर्म की नहीं, सिर्फ स्वारथ की सत्ता है, महाधूर्त पाखण्डी की ही अधिक महत्ता है; जितनी ऊंची कुर्सी जिसकी, उतने नीचे काम।। परिचय :- डॉ. कामता नाथ सिंह पिता : स्व. दुर्गा बख़्श सिंह निवासी : बेवल, रायबरेली घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करव...
“मैथिली” पथ प्रदर्शक
कविता

“मैथिली” पथ प्रदर्शक

विजय गुप्ता दुर्ग (छत्तीसगढ़) ******************** दशा दिशा समाज सुधार जगत की बहुधा टूटी बिखरी है हर बार भूतल को ही स्वर्ग सदृश्य बनाने 'मैथिली' स्वप्न भूल चुके हैं यार मत भूलो इस देश समाज का तब तलक ना होगा पूर्ण उद्धार जलन स्वार्थ विवादों का पूर्ण अंत जड़ सहित मिटाना अबकी बार। दायित्वों का कैसा उपभोग किया अधिकारों का मनमाना उपयोग किया सामाजिक पद और रिश्तों को कटुता कलंक के पन्नों का रोग दिया पदों की गरिमा का हासिल क्या था जो पाया वो भी डूबा मझधार जलन स्वार्थ विवादों का पूर्ण अंत जड़ सहित मिटाना अबकी बार। सप्तम स्वर में स्व महिमा गुणगान लेकिन नेतृत्व क्षमता का अधकचरा ज्ञान लकीर घटाने की ओछी फितरत ने दिखलाई समाज को झूठी शान खोए संस्कारों को अब गली-गली पुनः रोपण कर खूब बढ़ाएं पैदावार जलन स्वार्थ विवादों का पूर्ण अंत जड़ सहित मिटाना अबकी बार। रौशन चिराग सम प्रतिभाशाली बच्चा समाज आधार औ...
बहिन भाई का संबंध
कविता

बहिन भाई का संबंध

संजय जैन मुंबई ******************** छोटी बड़ी बहिनों का, हमे मिलता रहे प्यार। क्योकि मेरी बहिना ही, है मेरी मातपिता यार। जो मांगा वो लेकर दिया, अपने आपको सीमित किया। पर मांग मेरी पूरी किया, और मेरे को खुश करती रही। मेरी गलतियों को छुपाती रही, और खुद डाट खाती रही। पर मुझे हमेशा बचती रही, ऐसी होती है बहिना। उन सब का उपकार में, कभी चुका सकता नहीं। अपनी बहिनों को मैं, कभी भूला सकता नहीं। रहेंगी यादे सदा उनकी, मेरे दिल के अंदर। जो कुछ भी हूँ आज में, बना बदौलत उनकी ही। ये कर्ज हमारे ऊपर उनका जिसको उतार सकता नही। मैं अपनी बहिन को जिंदा, रहते भूल सकता नही। रक्षा बंधन पर बहिना से, मिलना तो एक बहाना है। वो तो मेरी हर धड़कन में, बसती क्योंकि बहिन हमारी है। इसलिए टूट सकता नही, भाई बहिन का ये बंधन। इसलिये भूल सकता नही, रक्षा बंधन रक्षा बंधन।। उपरोक्त मेरी कविता सभी भाइयों की ओर से बहिनों के लिए समर्पित...
राखी का त्यौहार
कविता

राखी का त्यौहार

माधुरी व्यास "नवपमा" इंदौर (म.प्र.) ******************** घिर आये बदरा है, झूम उठा ये मनवा हैं, रिमझिम बरसी फुहार है, आया राखी का त्यौहार है। बीरा ने खुशियों की बारिश की है, भावज की पायलिया छनक उठी है, उमंगों से भरा आया घर और द्वार है। आया राखी का त्यौहार है। भाई-बहनों के न्यारे रिश्ते है, माता के आँचल में आज सिमटे है, प्रेम बंधन में बंधे सब आज है। आया राखी का त्यौहार है। बहना ने भैया से अरज ये की है, प्रेम से अखियाँ की डिबिया भरी है, खूब लुटाया, बाबा ने लाड़ है। आया राखी का त्यौहार है। छोटी सी रेशम की ये डोरी है, इसमे ही रिश्तों कि आस बंधी है, अनोखा ये बंधन, न्यारा ये प्यार है। आया राखी का त्यौहार है। कोरोना ने कैसी ये पीड़ा दी है, मन में यादों की झड़ियाँ लगी हैं, यादों की लड़ियों में बीता दिन आज है। आया राखी का त्यौहार है। घिर आये बदरा है, झूम उठा ये मनवा है, रिमझिम बरसी फुहार है, आय...
मैं हूँ सुदामा तो मैं ही कृष्ण हूँ
कविता

मैं हूँ सुदामा तो मैं ही कृष्ण हूँ

अभिषेक शुक्ला सीतापुर (उत्तर प्रदेश) ******************** मैं हूँ सुदामा तो मैं ही कृष्ण हूँ मेरा मित्र सखा तो मैं ही स्वयं हूँ, मैं हूँ सुदामा तो मैं ही कृष्ण हूँ। मैं ही सुख-दुख का संयोग हूँ, मैं हूँ मिलन तो मैं ही वियोग हूँ। मैं माँ की ममता-सा शान्त हूँ, मैं ही द्रोपदी का अटूट विश्वास हूँ। मैं प्रलय का अन्तिम अहंकार हूँ, मैं ही भूत, भविष्य और वर्तमान हूँ। मैं नित्य ही प्रभु का वन्दन करता हूँ, परिश्रम से स्वेद को चंदन करता हूँ। विपरीत परिस्थितियों में हिम्मत रखता हूँ, जुनून से अपने उनका सामना करता हूँ। जब कभी कुण्ठा अत्यधिक व्याप्त होती है, अन्तर्मन में सुदामा से मुलाकात होती है। स्वयं ही स्वयं से स्वयं का आकलन करता हूँ, स्वयं सुदामा बन कृष्ण का अभिनंदन करता हूँ। अपनी परिस्थितियों का मैं ही कर्णधार हूँ, मैं हूँ पुष्प तो मैं ही तीक्ष्ण तलवार हूँ। मेरा मित्र सखा तो मै...
राखी
कविता

राखी

राज कुमार साव पूर्व बर्धमान (पश्चिम बंगाल) ******************** राखी का त्यौहार है आया भाई-बहन के चेहरों पर खुशियां है लाया पीतल की थाली में राखी, चंदन, दीपक, कुमकुम,हल्दी, चावल के दाने और मिठाईयां लेकर बहन ने भाई के माथे पर तिलक लगाकर कलाई में राखी है बंधवाया। बहन ने अपने भाई से रक्षा करने का वचन है दिलवाया। परिचय :- राज कुमार साव निवासी : पूर्व बर्धमान पश्चिम बंगाल घोषणा पत्र : प्रमाणित किया जाता है कि रचना पूर्णतः मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, हिंदी में टाईप करके हमें hindirakshak17@gmail.com पर अणु डाक (मेल) कीजिये, अणु डाक करने के बाद हमे हमारे नंबर ९८२७३ ६०३६० पर ...
बरसि के मास
कविता

बरसि के मास

तेज कुमार सिंह परिहार सरिया जिला सतना म.प्र ******************** बरसि के मास सामन सामन के पूरनमासी भाई बहिन के प्यार कै आय या तिउहार राखी भाई के मान आय बहिन के अरमान आय इंद्र के जीतय के इंद्रानी तप त्याग आय भारत के नही दुनिया के त्योहार आय पामन बंधन राखी सुर सत्ता में सोधन राखी अपने मन म राखी रच्छा के प्रन राखी पै या साल राखी कोरोना म कइसन राखी घर म है कैदि राखी राखी म न आई राखी राखी के आँख पानी कइसन के कहइ जुमानी कलाई सून बिनै राखी बस रखी म नेक राखी परू साल जो भलाई राखी मिली भेटि कै मनाऊँब राखी परिचय :- तेज कुमार सिंह परिहार पिता : स्व. श्री चंद्रपाल सिंह निवासी : सरिया जिला सतना म.प्र. शिक्षा : एम ए हिंदी जन्म तिथि : ०२ जनवरी १९६९ जन्मस्थान : पटकापुर जिला उन्नाव उ.प्र. घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।. ...
स्वतंत्रता
कविता

स्वतंत्रता

डाँ. बबिता सिंह हाजीपुर वैशाली (बिहार) ******************** स्वतंत्रता प्रभात की खिलते हैं खलिहानों में वेदों से ले पुराणों में ऋषियों के आह्वान में प्रिय स्वतंत्र देश है गंगा पखारती जहाँ धरा ये विश्वेश है। क्षितिज गगन हरित है वन, सिद्धि औ यश का संचरण पवन-पवन कहे सदा स्वतंत्र मन प्यारा वतन इतिहास है यह कह रहा स्वतंत्रता जय मान की धरा ये विश्वेश है। तीर्थों का तीर्थ देश है कोटि आदर्श भेस है स्वतंत्रता के कंठ से कर रहे जय नाद हैं समता के संवाद का ना कोई व्यवधान है धरा ये विश्वेश है। परिचय :- डाँ. बबिता सिंह निवासी : हाजीपुर वैशाली (बिहार) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के ...
मित्रता की परिभाषा
कविता

मित्रता की परिभाषा

रुचिता नीमा इंदौर म.प्र. ******************** मित्र एक शब्द है जाना पहचाना सा.... दिल के क़रीब कोई अपना सा.... जिससे नहीं हो कोई भी सम्बन्ध.... पर हो दिल के गहरे बंधन। जो बिन कहे सब समझ जाएं जिसे देख दर्द भी सिमट जाए.... जहाँ उम्र भी ठहर जाए.... जिसे देखकर ही आ जाये सुकून और सब तनाव हो जाये गुम.... तो वह है मित्र जब मुश्किलों से हो रहा हो सामना.... और लगे कि अब किसी को है थामना तब जो हाथ बढ़ाये वह है मित्र.... निःस्वार्थ, निश्छल, और सब सीमाओं से परे जहाँ बाकी न रह जाये कोई आशा.... बस यही है मित्रता की परिभाषा परिचय :-  रुचिता नीमा जन्म २ जुलाई १९८२ आप एक कुशल ग्रहणी हैं, कविता लेखन व सोशल वर्क में आपकी गहरी रूचि है आपने जूलॉजी में एम.एस.सी., मइक्रोबॉयोलॉजी में बी.एस.सी. व इग्नू से बी.एड. किया है आप इंदौर निवासी हैं। घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौ...
उनकी यादें
कविता

उनकी यादें

रवि कुमार बोकारो, (झारखण्ड) ******************** आँखों के बीच समुंदर मे मौसम ने की बदमाशी है। सोते ही नही हम रातों को केसी ये तन्हाई हैं।। यादों के बीच समुंदर में तैर रहा हुँ मै। उनकी याद की 'यादो' से अब गैर हुआ हुँ मै।। माँ की ममता भुल गया में भुल गया राखी त्यौहार। जबसे पाया हे तुमको, मै भुल गया सारा संसार।। ना दोस्त रहें ना प्यार रहा ना रहा मेरा घर-संसार। तस्वीरो में केद होके, बस रह गई उनकी यादें हजार।। परिचय :- रवि कुमार निवासी - नावाड़ीह, बोकारो, (झारखण्ड) घोषणा पत्र : यह प्रमाणित किया जाता है कि रचना पूर्णतः मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, हिंदी में टाईप करके हमें hindir...
भाई-बहन
कविता

भाई-बहन

उषा शर्मा "मन" बाड़ा पदमपुरा (जयपुर) ******************** भाई-बहन का प्रेम से भरा, ऐसा त्योहार है रक्षाबंधन। रक्षा का सूत्र कलाई पर सजा, ललाट पर लगा ये रोली-चंदन। राखी है एक अद्भुत बंधन, जिसकी ना हो शब्दों में अभिव्यक्ति। भाई-बहन की असीम डोर, बांध रही रक्षा की यह पंक्ति। हर बहन को मिल जाती सारी खुशी, जब भाई की कलाई पर राखी बांधती। साथ ही भगवान से भाई की खुशी संग, लाखों दुआएं व खुशियां मांग लाती। आशीष-उमंग से भरा बहन का, भाई के प्रति ऐसा है प्रेम। जीवन का कैसा भी मोड़ हो, बहन-भाई का रिश्ता ना होगा कभी कम। परिचय :- उषा शर्मा "मन" शिक्षा : एम.ए. व बी.एड़. निवासी : बाड़ा पदमपुरा, तह.चाकसू (जयपुर) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते है...
माँ
कविता

माँ

मुकेश गाडरी घाटी राजसमंद (राजस्थान) ******************** माँ तु फूल की डाल है वो, जो कभी ना मुजराने दिया मुझे। सर्वप्रथम मुख देखा है मैंने तेरा, तूने ही जन्म दिया है जो मुझे। गिर ना जाओ माँ कहीं में, चलना सिखाया है तूने मुझे। तू ही गुरु तू ही अन्नपूर्णा है माँ........ तूने खुशियां दी मुझे वो माँ, कभी तेरे आंचल से दूर गया नहीं मैं। जब रोता में माँ हँसाने का प्रयास करती तू, आज बारी मेरी तो कैसे दूर छोड़ जाऊं मैं। आशीर्वाद दे माँ तू मुझे अब, सपने सच करने चलता हूं मैं। तू ही लक्ष्मी तू ही वंदना हे माँ....... परिचय :- मुकेश गाडरी शिक्षा : १२वीं वाणिज्य निवासी : घाटी (राजसमंद) राजस्थान घोषणा पत्र : प्रमाणित किया जाता है कि रचना स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प...
रक्षाबंधन
कविता

रक्षाबंधन

जसवंत लाल खटीक देवगढ़ (राजस्थान) ******************** राखी का त्यौहार आया, संग में खुशियां हजार लाया। भाई-बहन का सच्चा प्यार, प्रेम के धागे में पूरा समाया।। बहन अपने पीहर आयी, घर में फिर से रौनक छायी। बाबुल के बगिया की चिड़िया, फिर से घर में बहार लायी।। सबके चेहरे खिले-खिले, हंस-हंस कर सब बात़े करते। सब बचपन को याद करके, फिर से जीने की आस करते।। माथे पर तिलक लगा कर, कलाई पर राखी बांधती है। जीवन भर प्यार के संग-संग, बहन रक्षा का वचन मांगती है।। कहती है मेरे प्यारे भैया, तुम राखी की लाज रख देना। मां- बाप की सेवा करना, और उनको दुःख तुम मत देना।। शराब का सेवन मत करना, गाड़ी हेलमेट पहन चलाना। घर पर राह तकते बीवी-बच्चे, उन पर खूब प्यार लुटाना।। बहन तो इतना ही चाहती, अपने घर का मान बढाती। बहन बड़े प्यार से भाई की, कलाई पर राखी सजाती।। बहन बेटी जिस घर में होती, उस घर में सदा खुशियां आती...
धूप छांव आते हैं
कविता

धूप छांव आते हैं

रमेशचंद्र शर्मा इंदौर मध्य प्रदेश ******************** धूप छांव आते हैं ! पूरा असर दिखाते हैं !.. धूप छांव मुट्ठी रेत उठाई हैं, प्यास भी बुझाई हैं, मृगतृष्णा नचाती हैं, भ्रम जाल बिछाती हैं, सूरज बनकर दावानल कभी दिन-रात जलाते हैं !... धूप छांव समय चक्र चलता है, मानव मन छलता है, सुख दुख का डेरा है, राग द्वेष का घेरा है, काल नियंता सबको नियंत्रित धूरी घुमाते हैं !... धूप छांव अनिश्चय सब फैला है, दो दिनों का मेला है, छल छिद्र भरे पड़े हैं, हानि लाभ अटे पड़े हैं, जिजीविषा के फेरे में सब अपना दांव लगाते हैं !... धूप छांव कर्म प्रधान माना है, धर्म महान जाना है, पुण्य सदा साथ चलेंगे, बाकी सारे हाथ मलेंगे, पाप संताप के झमेले में सब सपना नया सजाते हैं !... धूप छांव परिचय : रमेशचंद्र शर्मा निवासी : इंदौर मध्य प्रदेश घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। ...
अभी तो बहुत हौसला है
कविता

अभी तो बहुत हौसला है

दीवान सिंह भुगवाड़े बड़वानी (मध्यप्रदेश) ******************** अभी तो बहुत हौसला है मुझमें, बेजान नहीं हूँ मै, इस मतलबी दुनिया से अनजान नहीं हूँ मै। कोई कुछ भी कहे परवाह करता नहीं हूँ मैं, इस बेदर्द जमाने से भी डरता नहीं हूँ मै। पढूंगा-लिखूंगा नवाब भी बनूँगा मै, माता-पिता का नाम रौशन करूंगा मै। मंजिलो का मुसाफ़िर हूं मै, ख़बर कामयाबी की भी सुनाऊंगा मै। वक्त को मै बदलकर दिखाऊंगा, आसमान में भी परचम लहराउंगा। राहें आसान नहीं है मेरी, जानता हूं मै, नामुमकिन कुछ भी नहीं, यह मानता हूं मै। ठोकरें खाकर गिरता हूं मै, गिरकर उठता सम्भलता हूं मै। मुसीबतें कितनी भी हो, घबराता नहीं हूं मै धोखा अपने ही देते हैं, बस उनसेे डरता हूँ मै। कोसू किस्मत को, इतना मै बुजदिल नहीं हूं कमजोर जरूर हूं, मगर मै कायर नहीं हूं। थककर बैठ जाऊं बीच सफ़र में, इतना भी नालायक नही हूं मै। नाम मेरा भी होगा दुनिया में, बेनाम मर जाऊं...
राखी पे क्यों नही आये भईया
कविता

राखी पे क्यों नही आये भईया

विशाल कुमार महतो राजापुर (गोपालगंज) ******************** यह कविता समर्पित है। देश के दो लाल (जवान) शहिद किशन लाल, और शहीद देव कुमार, जी को रक्षाबंधन के ठीक कुछ ही दिन पहले शहादत को समर्पित हो गए। इन्हें शत शत नमन है। 🙏🙏 दिलों में दीप खुशियों की जलाए बैठी थी,,, आएगा मेरा भईया आस लगाए बैठी थी,, पागल सी बनके बहना लोग से पूछे बार बार,, राखी पे क्यों ना आये, मेरे भईया अबकी बार।। फूलों की थाली हाथों में सजाएं बैठी थी,, चंदन, मिठाई, राखी सब लियाए बैठी थी,, बहन का भी अब सब्र का बांध टूट रहा था,, आँखों की आंसू बनके दरिया फुट रहा था,, क्यों भूल गया है तू अब माँ-बाबुल का दुलार राखी पे क्यों ना आये, मेरे भईया अबकी बार।। आँगन बैठी रोये बहना भाई के लिए श्रद्धा से राखी लाई हूँ कलाई के लिए सुनो ना भईया मुझे तुम इतना सताओ ना कर लूंगी थोड़ा इंतजार जल्दी से आओ ना ना चाहिए हमें मोतियों की माला और हार,, राखी ...
कथासम्राट प्रेमचंद
कविता

कथासम्राट प्रेमचंद

डॉ. पंकजवासिनी पटना (बिहार) ******************** कथासम्राट मुंशी प्रेमचंद की जयंती पर उन्हें कोटिशः नमन! हे आर्यावर्त के सूर्य! तुम्हें क्या दीया दिखाऊँ!! हे मानवता के दिव्य उज्ज्वल रूप! बलिहारी जाऊँ। दीन - हीन-पीड़ितों के हित लहराय तुझ हिय में प्रखर : कैसी अप्रतिम उत्कट सहानुभूति का अगाध सागर! सादा जीवन जीया औ सदा ही रखे उच्च विचार! अपनी कथनी करनी से दिखाय सदा उच्च संस्कार!! साहस, संघर्ष, पौरुष के साकार रूप रहे सदा तुम! सदा ही किये चुनौतियों और मुश्किलों का सामना तुम!! जीवन के पथ पर अनवरत चलते अनथक राही तुम! सतत् प्रेरणा के शुभ स्रोत बने परम उत्साही तुम!! बालकाल से ही जीया अभावों का दूभर जीवन! खेलने-खाने की उम्र से ही करन लगे चिंतन-मनन!! मांँ की ममता से भी वंचित, हा महज आठ की वय में! झेला विमाता का दुर्व्यवहार औ पिता का धिक्कार!! कैशोर वय में ही आ पड़ा तेरे कोमल कंधों पर : पूरे परि...
अस्तित्व
कविता

अस्तित्व

रश्मि श्रीवास्तव “सुकून” पदमनाभपुर दुर्ग (छत्तीसगढ़) ******************** बरसात की अंधेरी रातों में जब भी गूंजती खामोशियो को पानी की बूँदें तोडती है ऐसा लगता है जैसे रोशनी में शायद पानी अपना अस्तित्व खो देता डरती हूँ मैं भी खो न जाए कही अस्तित्व मेरा आधुनिकता के उस रोशनी में तोड़ न दे मेरी खामोशी को पाश्चात्य देशो का ये शोर और एक दिन मै भी अपने अस्तित्व को पाने के लिए रोशनी और शोर शराबे से दूर शांत एकांत अँधेरी रातों को तलाशते फिरूँ परिचय : रश्मि श्रीवास्तव “सुकून” निवासी : मुक्तनगर, पदमनाभपुर दुर्ग (छत्तीसगढ़) घोषणा : मैं यह शपथ पूर्वक घोषणा करती हूँ कि उपरोक्त रचना पूर्णतः मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीयहिंदी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कव...
मन का परिवेश
कविता

मन का परिवेश

बबली राठौर पृथ्वीपुर टीकमगढ़ (म.प्र.) ******************** हमनें तो वक़्त से जाना और सीखा जीना आँखों के अश्कों को कौन अपना समझता कब कौन दुख में हमारे शामिल होता ये मन का परिवेश है जो इन्सानियत को पढ़ता यह जीवन तो और सुख अपनों से मिलता पर कभी-कभी वो अपना भी पराया दिखाता जब होतीं हैं मुश्किलों की घड़ियाँ जिन्दगी की ये मन का परिवेश है जो उनके दिल को पढ़ता जीवन में ऐसे कई मोड़ आते हैं सब के लिए कहीं धूप होती है जीवन में तो कभी छाँव लिए और कठिन परीक्षा का दौर पास जो कर लेता है इन्सां ये मन का परिवेश है जो जिन्दगी के रंग को पढ़ता ये दर्द, गम कब कहाँ किसे नहीं डसते हैं जख्मों के घाव आदमी भरने की चेष्टा करते हैं फिर भी नहीं वो पीर भूल पाते हैं हद की ये मन का परिवेश है जो ढाए जुल्म को पढ़ता परिचय :- बबली राठौर निवासी - पृथ्वीपुर टीकमगढ़ म.प्र. घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार...
आया रक्षा बंधन
कविता

आया रक्षा बंधन

रूपेश कुमार (चैनपुर बिहार) ******************** आया जी आया रक्षा बंधन का त्यौहार, भाई-बहनों का का प्यार का त्यौहार, जीवन के जन्मों-जन्मों का साथ देती, बहना भाई के जीवन को रक्षा करती, संसार के हर दुखों से भाई की भलाई करती, जन्म से लेकर मृत्यु तक जीवन की रक्षा करती हैं, हर संकट मे हौसला बढ़ाती भाई को, प्यार दुलार भाई पर लुटाती हमेशा, जीने की हजारों-हजार साल तक कामना करती, भाई की हर दुखों को हर लेती, उनकीं सुखी रहने की कामना करती, अपना अमृत सागर सुख चैन लुटाती, बहना-भाई की एक शान होती है, जीवन मे हर परिस्थियों से भाई को बचाती है, ममता की चादर ओढाती है, ममता की मूरत से सजाती है ! परिचय :- रूपेश कुमार छात्र एव युवा साहित्यकार शिक्षा - स्नाकोतर भौतिकी, इसाई धर्म (डीपलोमा), ए.डी.सी.ए (कम्युटर), बी.एड (महात्मा ज्योतिबा फुले रोहिलखंड यूनिवर्सिटी बरेली यूपी) वर्तमान-प्रतियोगिता परीक्...