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पद्य

तेज हवा का झोंका
कविता

तेज हवा का झोंका

सुरेखा सुनील दत्त शर्मा बेगम बाग (मेरठ) ********************** मोम के जैसा मन है उसका गर्म हवा के झोंके से पिघल गया होगा बड़ी चंचल थी कड़कती बिजली ओं की तरह तेज बारिश ने किसी के घर पर गिरा दिया होगा कभी वक्त के हाथों फिसल गया होगा नादान दिल ही तो है किसी और का हो गया होगा समंदर नहीं है नदी ही तो है किसी और नदी में समा गया होगा कब तक चलता वो कांटे भरे रास्तों पर कोई मखमली रास्ता मिल गया होगा बारिश के बाद सतरंगी जीवन उसका किसी इंद्रधनुष्य सा आसमान में समा गया होगा कोई तेज हवा का झोंका आ गया होगा हमसे दूर उड़ाकर ले गया होगा मोम के जैसा मन है उसका गर्म हवा के झोंके से पिघल गया होगा।। . परिचय :-  सुरेखा "सुनील "दत्त शर्मा साहित्यिक : उपनाम नेहा पंडित जन्मतिथि : ३१ अगस्त जन्म स्थान : मथुरा निवासी : बेगम बाग मेरठ साहित्य लेखन विधाएं : स्वतंत्र लेखन, कहानी, कविता, शायरी, उपन्यास प्रकाशित साहित्...
अभिलाषा मन की
कविता

अभिलाषा मन की

निर्मल कुमार पीरिया इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** तुम बनो परछाई मेरी, संग चले हम उम्र भर, या आईना ए रूह बनो, निहारु तुमको उम्र भर. श्याम घन, घटा ना होना, उमड़ घुमड़ कभी हैं आती, बन समीर निर्विघ्न तू बहना, साँसों में बसना उम्र भर.... कुमुद कमलनी सी खिलना, महकेगा जर्रा जर्रा, बन पाखी कलरव तुम करना, चहकेगा जर्रा जर्रा. बदली धुंध सा ना होना, नैन भृमित करती है जो, बन वाचाल सरिता तू बहना, खिल उठेगा जर्रा जर्रा... श्रद्धा हो कामायनी की तुम, महकी ग़ालिब ए नज्म भी या छलकी खय्याम ए रूबाई, बन साकी, बहकी मधुशाला भी. तुलसी की रतना ना होना, बने जोगी, पर अब जोग कहा, बन ख्याल, उर चली आना, ले कलम, गुने गीत "निर्मल" भी... . परिचय :- निर्मल कुमार पीरिया शिक्षा : बी.एस. एम्.ए सम्प्रति : मैनेजर कमर्शियल व्हीकल लि. निवासी : इंदौर, (म.प्र.) शपथ : मेरी कविताएँ और गजल पूर्णतः मौलिक, स्वरचित और अप्र...
याद आती है, मां
कविता

याद आती है, मां

हिमानी भट्ट इंदौर म.प्र. ******************** मुझे बहुत याद आती है, मां खूब स्नेह लुटाती गिले में सोकर हमें सूखे में सुलाती, कभी सामने ना दिखो तो बड़ी बेचैन हो जाती है, मां कितने भी बड़े हो जाएं बच्चे फिर भी बच्चों के लिए चिंतित रहती है, मां कुछ सामान लेने कुछ रुपया लेकर भेजती बाहर बार-बार टोकरती बेटा पैसा गिरा मत देना संभल कर जाना, आपको पता है वह समझता है, फिर भी इसमें मां का एक मासूम भाव झलकता है। दूसरी ओर बच्चा चिढ़कर बोलता है, अरे मां अब मैं बड़ा हो गया हूं, मां फटकार लगाकर कहती है, पता है कितना बड़ा हो गया है, कल ही तुझे कपड़े लाने के लिए पैसे दिए थे और तू चॉकलेट खाकर आ गया। प्यार दिखाने का अलग-अलग भाव है, मां का मां को वर्णन करना कठिन है, मां मुझे तुम जैसा बनना है, मुझे समंदर में से थोड़ी सी बूंद दे दो, आज मैं भी इस दोराहे पर खड़ी हूं। बस आज मां बनने में फर्क इतना है, ब...
पलायन का दर्द
कविता

पलायन का दर्द

मंगलेश सोनी मनावर जिला धार (मध्यप्रदेश) ********************** पलायन का दर्द बड़ा दुखदायी होता है, कहर बरपाता है आसमान, रोम रोम रोता है। आंसू पसीने के रूप में बह निकलते है, छाले पैरों के फुटकर ये कह निकलते है।। लॉक डाऊन अच्छा है निर्णय देश के लिए, भूख मजबूरी है, किन्तु काफी नही विद्वेष के लिए।। लेकर बच्चों, बोझा निकल पड़े राहों पर, नही इल्जाम किसी नेता, बंदोबस्त, सरकारों पर।। नही तोड़ा कोई कानून, न कोई कांच तोड़ा है, ना ही पत्थरों से डॉक्टरों पुलिस का सर फोड़ा है।। मजबूरी है, लाचार है, पर देश के लिए जीते है, ये देश के बेटे है साहब, हर संकट हंसकर झेलते है।। सुनी पुकार जो जनसेवकों ने तो बसें चलने लगी, ट्रेन महानगरो से बीहड़ों की और दौड़ने लगी। राजनीति हो रही इस बेबसी पर भी, कोई मौका भेड़िए छोड़ना नही चाहते है। कोरोना फैलाने वालों को संरक्षण, बस सत्ता को कोसना चाहते है।। गरीब के आंसुओं का मोल किया, य...
धैर्य
कविता

धैर्य

मनोरमा जोशी इंदौर म.प्र. ******************** दुखः आवे सह लिया, बुद्धिमान का काम, ज्यों धरती सहती सभी, मेह शीत या घाम। विचलित करता है नहीं, जलनिधि को तूफान, शान्ति भंग करते नहीं, दुखः मे पुरूष महान। किसी परिस्थिति में कभी, मन संतुलन गंवाय, धैर्य न खोते विपंति में, महा पुरूष समुदाय। सब छूटे छोड़ दे, किन्तु न धर्य विचार, छोड़े कभी न विपंति में, ईश्वर का आधार। . परिचय :-  श्रीमती मनोरमा जोशी का निवास मध्यप्रदेश के इंदौर में है। आपका साहित्यिक उपनाम ‘मनु’ है। आपकी जन्मतिथि १९ दिसम्बर १९५३ और जन्मस्थान नरसिंहगढ़ है। शिक्षा - स्नातकोत्तर और संगीत है। कार्यक्षेत्र - सामाजिक क्षेत्र-इन्दौर शहर ही है। लेखन विधा में कविता और लेख लिखती हैं। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में आपकी लेखनी का प्रकाशन होता रहा है। राष्ट्रीय कीर्ति सम्मान सहित साहित्य शिरोमणि सम्मान, हिंदी रक्षक मंच इंदौर (hindira...
अजीब दुनिया
कविता

अजीब दुनिया

प्रीति शर्मा "असीम" सोलन हिमाचल प्रदेश ******************** बड़ी अजीब दुनिया है....तेरी समझ नहीं पाता हूँ। बन के धर्मात्मा, गीता उपदेश सुनाती हैं। भीतर से, अपने मतलब को, पूरा करने के लिए, शकुनि की तरह, चालबाजियों की, विसात सजाती हैं। दूसरे ही पल, बुरा नहीं करना, लम्बा भाषण दे जाती है। फिर कानों में, कानों से, कितनी बातें कह जाती है। झूठ और सच को बड़ी, सफाई से तराश लाती है। सच सुन नही पाती। झूठ के पुलिंदे उठा लाती है। फिर अपने पापों को, छुपाने के लिए गंगा नहा आती है। कितने नाटकीय सोपानों को, एक साथ कर जाती है। बुरा जमाना आ गया। यह राग तो गाती हैं। अपने भीतर के जहर को, कहाँ निकाल पाती है। प्रेम की बातें तो करती है। प्रेम से खाली ही रह जाती है। कितनी सुंदर दुनियाँ बनाई तूने। क्या अहसास छीन लिए...... जब लोगों से दुनियां सजाई तूने।। यह दुनियां तेरी...... कितने चेहरे लिए जीयें जाती है। बदल जात...
मजदुर
कविता

मजदुर

मनीषा व्यास इंदौर म.प्र. ******************** ब्रह्म मुहूर्त में नींद से जागता है। चिलचिलाती धूप में भी कर्म करता रहता है। घड़ी भर आराम की उसे नहीं परवाह। वह तो मंदिरों के आकार गढ़ता है। ईंट और पत्थरों में जूझता है। बड़ी-बड़ी अट्टालिकाओं को बनाता है। उसे नहीं होती कभी अपनी परवाह। वह तो मस्ज़िद और गिरजाघर बनाता है। मेहनत कर खून पसीना बहाता है। रूखी सूखी खाकर तुरंत तृप्त हो जाता है। सुख से हंसने की उसे कहां परवाह । वह तो पत्थर में भी झरने बहाता है। धूप, बारिश, ठंड में कहां ठहरता है। खेतों की लहराती फसलों में झूमता है। अपनी काया की उसे कहां परवाह। वह तो मिट्टी में सोना और चांदी उगाता है।   परिचय :-  मनीषा व्यास (लेखिका संघ) शिक्षा :- एम. फ़िल. (हिन्दी), एम. ए. (हिंदी), विशारद (कंठ संगीत) रुचि :- कविता, लेख, लघुकथा लेखन, पंजाबी पत्रिका सृजन का अनुवाद, रस-रहस्य, बिम्ब (शोध पत्र), माल...
मां बस मां ही होती है
गीत

मां बस मां ही होती है

धीरेन्द्र कुमार जोशी कोदरिया, महू जिला इंदौर म.प्र. ******************** मेरे संग संग हमेशा ही दुआएं मां की होती हैं। वो मेरी राह से कांटे हटाकर फ़ूल बोती है। वो देती है हमें जीवन स्वयं के अंश को देकर। वो दुनिया में हमें लाती है कितने कष्ट सह सह कर। समेटे प्यार आंचल में वो ममता ही लुटाती है। जहां रोशन बनाती है वह तिल तिल दीप सा जलकर। हमारी जिंदगी में वह सपन के बीज बोती है। स्वयं शोलों पर चलकर प्यार की फसलें उगाती है। वो एक एक जोड़कर तिनका सुहाना घर सजाती है। बलायें दूर हो जाती फकत उसकी दुआओं से, अभावों से भरी दुनिया को जन्नत सा बनाती है। कोई वैसा नहीं होता, मां बस मां ही होती है। सदा मां की नज़र में प्रेम की रसधार बहती है। लुटा कर चैन हमको वो दुखों का भार सहती है। सदा उसका ह्रदय बच्चों के खातिर ही धड़कता है, वह बच्चों के लिए जीवन भी अपना वार सकती है। मैं हंसता हूं वो हंसती ह...
आज़ादी की कीमत
कविता

आज़ादी की कीमत

विमल राव भोपाल म.प्र ******************** आजादी की कीमत कों क्या खूब चुकाया वीरों नें। सीने पर गोली खाई थी भारत माँ के रणधीरो नें॥ क्रांति दूत ऊन फ़ौलादो नें ऐसी आग लगाई थी। भारत के कोने-कोने से निकल स्वतंत्रता आई थी॥ कतरा-कतरा रक्त बहा कर भारत माँ के चरणों में। उनकों देकर सीख गए वो जो बंटें हुए थे वर्णों में॥ झूल गए फाँसी पर किन्तु कभी कदम ना डोले थे। मरते-मरते बाँके प्यारे वो वन्दे मातरम बोले थे॥ नत मस्तक होकर हम उनकों नित - नित शीश झुकाते हैं। आजादी की कीमत पर जो अपनें शीश चढ़ाते हैं॥ . परिचय :- विमल राव "भोपाल" पिता - श्री प्रेमनारायण राव लेखक, एवं संगीतकार हैं इन्ही से प्रेरणा लेकर लिखना प्रारम्भ किया। निवास - भोजपाल की नगरी (भोपाल म.प्र) कवि, लेखक, सामाजिक कार्यकर्ता एवं प्रदेश सचिव - अ.भा.वंशावली संरक्षण एवं संवर्द्धन संस्थान म.प्र, रचनाएँ : हम हिन्दुस्तानी, नई...
चने का झाड़
हास्य

चने का झाड़

अर्चना अनुपम जबलपुर मध्यप्रदेश ******************** समर्पित-अनायास ही तनिक-अधिक उन्नति पाकर मनः स्थिति में उपजित परोक्ष निर्मूल अभिमान को।   मैं चने का झाड़ हूँ नहीं कोई ताड़ हूँ। बावजूद इसके मेरी घनघोर छाया क्योंकि फैली दुनिया में बेपनाह माया हर किसी को सुलभ कराता भरपूर 'लाड़ हूँ' मैं 'चने का झाड़' हूँ। कुछ तो उपलब्धि पाता है, यूँ ही नहीं हर कोई मुझमें बैठ अन्य को धता बताता है । "चढ़ गए चने के झाड़ में" ये तंज मुस्कुराकर झेल जाता है। मिली ज़रा सी शोहरत इज्ज़त दौलत तब उसका ना कोई अपना ना ख़ूनी ना जिगरी रिश्ता काम आता है। सिर्फ़ एक 'चने का झाड़' ही तो दुलरता है। ऐंसा मैं नहीं मानता पर दुनियां में ही तो कहा जाता है। ज़नाब, तब तो कंधे पर बैठाकर घुमाने वाले, मां-बाप भी छूट जाते हैं। (व्यंग्य का तड़का) मेरी मजबूत टहनियों में लटककर ही तो आदमी और मजबूती पाते हैं। उत्तरोत्तर उन्नति की मिसाल हूँ, ब...
शब्द कलश
कविता

शब्द कलश

अर्पणा तिवारी इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** शब्द कलश भी रिक्त हुए है, भावों की गंगा बहती है। हृदय कुंज के झुरमुट में मां, अमराई सी रहती है। शब्द अनूठा अनुपम ऐसा, परमेश्वर ने उपहार दिया। जहां स्वयं न पहुंचे भगवन, सृष्टि को आधार दिया। ममता पर जो लिखना चाहा, कलम भला कब थमती है। हृदय कुंज के झुरमुट में मां, अमराई सी रहती है। सहकर पीड़ा भारी जो, जीवन का पुष्प खिलाती है। जाग जाग कर रातों में जो, लोरी मधुर सुनाती है। पूजाघर में जलते दीपक सी, जो घर को आलोकित करती है। तुलसी दल सी पावन है जो मन को सुरभित करती है। क्या लिख जाऊं क्या छोड़ूं मै, मंथन की लहरे चलती है। हृदय कुंज के झुरमुट में मां, अमराई सी रहती है। जीवन के तपते रेगिस्तानों में आंचल की ठंडी छाह मिली। कठिन डगर पर कैसे गिरती, मुझको मां की बांह मिली। मंजिल मंजिल पार करूं मैं, शूल स्वयं ही हट जाते है। जब मेरे गालों पर आकर, ...
शब्द करे सलाम
कविता

शब्द करे सलाम

राम प्यारा गौड़ वडा, नण्ड सोलन (हिमाचल प्रदेश) ******************** अन्तर्मन से बहिर्गमन को.... आतुर हैं शब्द.... हर शब्द में है उमंग, झलक रही दिव्य तरंग। दिल से निकला हर शब्द, उन योद्धाओं को करे सलाम.... कोरोना के विरुद्ध जो लड़ रहे लाम। लगा अपनी जान की बाजी.... पीड़ितों की जान बचाई। ईश्वर तुल्य बन गए डाॅक्टर.... देवी स्वरुपा नर्सें कहलाईं.... अविस्मरणीय योगदान पुलिस कर्मियों का.... जिन्होंने सौहार्द पूर्ण सहायता पहुंचाई। समाजसेवियों का देख उत्साह.... हुई प्रशस्त मानवता की राह। जन-जन के सहयोग के आगे, कोरोना भी सरपट भागे अंतर्मन से प्रस्फुटित हर शब्द का.... सबको है संदेश, नर सेवा- नारायण सेवा, मिटे क्लेश, मिले समृद्धि का मेवा। इसीलिए शब्द बारम्बार, कोरोना के विरुद्ध ...., लड़ने वालों को करे सलाम।।   परिचय :-  राम प्यारा गौड़ निवासी : गांव वडा, नण्ड तह. रामशहर जिला सोलन (सोलन हिमाच...
मां
कविता

मां

मित्रा शर्मा महू - इंदौर ******************** जन्नत की खुशियों की चाहत रखते रखते, भूल गए कि हमारी जन्नत हमारी मां थी। जीवन के आपा धापी में दौड़ते दौड़ते, यह नहीं समझ पाए कि आखिर मां क्या थी। तुम रखती थी कलेजे से लगाकर मुझे, बिना सौदा किए प्यार बरसाती थी तुम मुझे। बहुत रुला लिया ए जिंदगी तूने, मां की आंखों से ओझल क्या हुए थे। परवाह करने वाले की कमी नहीं थी राहों में, मतलब के फ़रिश्ते थे जैसे नाग लिपटते बाहों में। तेरे हर दुआ कबूल हो जाती शायद, मेरे तकदीर को चुनौती देती हो तुम शायद। क्यों भुल जाते है तेरे अहसानों को, जिंदगी के सफलता के पीछे के तेरे अफसानों को। शर्म क्यों आती यह कहने में, हम मां के साथ रहते है यह जताने में। तेरे आंचल की छांव पर पल बढ़कर खड़ा हुं, खड़ा हूं मां, बस तेरे बिना लड़खड़ा जाता हूं। खुद गीले में सो कर तूने गरमाहट दी थी, मेरी हर मुश्किल तूने आसान की थी। रह रह कर आ...
आख़िर ऐसा क्यों करते हो
कविता

आख़िर ऐसा क्यों करते हो

प्रो. आर.एन. सिंह ‘साहिल’ जौनपुर (उ.प्र.) ******************** परहित से दूरी रखते हो ईर्ष्या नफ़रत में जलते हों भूल गए जीवन का आशय आख़िर ऐसा क्यों करते हों? मेहनत पर जिसके पलते हो छल उनके ही संग करते हो ईश्वर का भी भय न तुमको पर पीड़ा पर तुम हंसते हो? मज़हब को मत नशा बनाओ ख़ुद को ख़ुद इंसान बनाओ मर्म बिना समझे जीवन का आपस में लड़ते मरते हो? अहंकार का रोग बढ़ा है लोगों के सिर भूत चढ़ा है अहं खा गया लंका नगरी क्या उससे शिक्षा लेते हो? किश्ती को मँझधार डुबोना दिल मे तीखे शूल चुभोना ग़म देना फ़ितरत में तेरे पर ख़ुद को 'साहिल' कहते हो . परिचय :- प्रोफ़ेसर आर.एन. सिंह ‘साहिल’ निवासी : जौनपुर उत्तर प्रदेश सम्प्रति : मनोविज्ञान विभाग काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी, उत्तर प्रदेश रुचि : पुस्तक लेखन, सम्पादन, कविता, ग़ज़ल, १०० शोध पत्र प्रकाशित, मनोविज्ञान पर १२ पुस्तकें प्रकाशि...
रंगों से रंगी दुनिया
गीत

रंगों से रंगी दुनिया

संजय वर्मा "दॄष्टि" मनावर (धार) ******************** मैने देखी ही नहीं रंगों से रंगी दुनिया को मेरी आँखें ही नहीं ख्वाबों के रंग सजाने को। कोंन आएगा, आखों मे समाएगा रंगों के रूप को जब दिखायेगा रंगों पे इठलाने वालों डगर मुझे दिखावो जरा चल संकू मै भी अपने पग से रोशनी मुझे दिलाओं जरा ये हकीकत है कि, क्यों दुनिया है खफा मुझसे मैने देखी ही नहीं ........................... याद आएगा, दिलों मे समाएगा मन के मित को पास पायेगा आँखों से देखने वालों नयन मुझे दिलाओं जरा देख संकू मै भी भेदकर इन्द्रधनुष के तीर दिलाओं जरा ये हकीकत है कि क्यों दुनिया है खफा मुझसे मैने देखी ही नहीं .............................. जान जाएगा, वो दिन आएगा आँखों से बोल के कोई समझाएगा रंगों को खेलने वालों रोशनी मुझे दिलावों जरा देख संकू मै भी खुशियों को आखों मे रोशनी दे जाओ जरा ये हकीकत है कि क्यों दुनिया है खफा मुझसे मैने...
मेरी माँ
कविता

मेरी माँ

मीना सामंत एम.बी. रोड (न्यू दिल्ली) ******************** अपनी जन्म दात्री माँ को कायनात के हर एक रंग में उतरते देखा है,, गाँव की पहाडियों पे दिन का सूरज रात चांदनी की तरह गुजरते देखा है। हमारी खुशियों की खातिर ब्रम्ह मुहूर्त में पीपल को जल चढ़ाते देखा है, वो स्कूल तो नहीं गई थी कभी मगर जीवन का पाठ बच्चों को पढ़ाते देखा है। लय, तुक, ताल, सा, रे, गा, मा, का ज्ञान नहीं था बिलकुल भी मेरी जननी को, बोझिल जिंदगी के आंगन में मैंने उसे थिरकते संग सुर में सुर से गाते देखा है। माँ मेरी थी सैनिक की जीवन संगिनी रंजो गम सभी उसे छिपाते देखा है, पल्लू में ढककर दर्द सभी जीवन के आंखों से माँ को मुस्काते देखा है। तिनका-तिनका सहेज कर नीड़ बना के सफेद, लाल मिट्टी से दीवार लीपते देखा है, जंगल, खेत, खलिहान संग गृहस्थी की बगिया को पसीने से सींचते देखा है। . परिचय :- मीना सामंत एम.बी. रोड (न्य...
जाने है ये सफ़र कैसा
ग़ज़ल, गीत

जाने है ये सफ़र कैसा

विवेक रंजन 'विवेक' रीवा (म.प्र.) ******************** सूनी माँग सी राहों जैसा जाने है ये सफ़र कैसा, हर बस्ती वीरान मिली, नहीं खुशी का शहर देखा। नींद कुचलकर सुबह हुई और शाम ने भी पहलू बदले, कितनों की ही मौत हुई शमशान मगर बेखबर देखा। जहाँ पर खींचते हैं लोग जब तब लक्ष्मण रेखा, उसी दुनिया में हमने ज़िन्दगी को दर बदर देखा। रहते थे जो शीशमहल में घर उन्होंने बदल लिया, जब जब झाँका सीने में वहाँ फ़क़त पत्थर देखा। 'विवेक' झील के दरपन में लिखी प्रेम की इबारतें, मन कस्तूरी महक उठा जब उनको भर नज़र देखा। . परिचय :- विवेक रंजन "विवेक" जन्म -१६ मई १९६३ जबलपुर शिक्षा- एम.एस-सी.रसायन शास्त्र लेखन - १९७९ से अनवरत.... दैनिक समय तथा दैनिक जागरण में रचनायें प्रकाशित होती रही हैं। अभी हाल ही में इनका पहला उपन्यास "गुलमोहर की छाँव" प्रकाशित हुआ है। सम्प्रति - सीमेंट क्वालिटी कंट्रोल कनसलटेंट के रूप में ...
मां
कविता

मां

गीतांजलि ठाकुर सोलन (हिमाचल) ******************** मुश्किल राहों में सफर आसान लगता है। ये मेरी मां की दुआओं का असर लगता है। मेरी हर मुश्किल को यूं ही पहचान लेती हो, ये मुझे कोई और नहीं भगवान का रूप लगता है माँ तू रूठ जाए तो सब सूना सा लगता है, तेरी एक मुस्कान से घर स्वर्ग सा लगता है। मुश्किल राहों में सफर आसान लगता है। ये मेरी मां की दुआओं का असर लगता है। हमें किसी और के प्यार की क्या जरूरत हमें तेरा प्यार ही जन्नत लगता है। मतलब की दुनिया तो सिर्फ मतलब के लिए प्यार करती है, मां तेरे प्यार मे कोई मतलब नहीं होता, इसलिए तो हमें तु इतनी प्यारी लगती है। मुश्किल में सफर आसान लगता है। यह मेरी मां की दुआओं का असर लगता है....।। . परिचय :-गीतांजलि ठाकुर निवासी : बहा जिला सोलन तह. नालागढ़ हिमाचल आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्...
माँ
कविता

माँ

जनार्दन शर्मा इंदौर (म.प्र.) ******************** राम लिखा कीसी ने, कीसी ने गीता लिखा किसी ने बाईबल, तो गुरुग्रंथ और क़ुरान लिखा, जब बात हुई पूरी दुनियाँ को, एक शब्द में लिखने की तब मैंने हे"माँ" तेरा ही नाम लिखा, माँ तेरा ही नाम लिखा,,,, कैसे कहूँ कि माँ तुम्हारी याद नहीं आती चोट मुझे लगती थी, आंखें तेरी भर जाती मेरे घर न आने तक, तेरी साँसे गले में ही अटकी सी रह जाती थी। कैसे कहूँ कि माँ तेरी याद नहीं आती, कैसे कहूँ कि माँ तेरी याद नहीं रुलाती आज भी ठोकर लगतीहैं, तो ओ,माँ,,, कहकर मुझे तेरा ही अहसास दिलाती है, कैसे कहूँ माँ मुझे तेरी याद नही आती। तुमने ही जन्म देकर, इस दुनियामें लाया। जीवन यह मां, मैने तुमसे उपहार मेंपाया। मेरे जीवन का, हर पाठ मुझे तू ही पढ़ाती कैसे कह दूं माँ मुझे तेरी याद नही आती। शायद इसलिए सब कहते है... कि माँ कबीर की साखी जैसी तुलसी की चौपाई-सी माँ मीरा की पदाव...
माँ
कविता

माँ

रंजना फतेपुरकर इंदौर (म.प्र.) ******************** माँ, देखा है हर सुबह तुम्हें तुलसी के चौरे पर मस्तक झुकाए हुए जब भी हथेलियां उठीं दुआओं के लिए तुम्हारी पलकों पर हमारे ही सपने सजे होते हैं जब भी आँचल फैलाया मन्नतों के लिए तुम्हारे होंठों पर हमारी ही खुशियों के फूल खिले होते हैं जब जिंदगी अंधेरों में घिरने लगती है खामिशियों से भरी रातें मंझधार में डुबोने लगती हैं माँ, तुम रोशन करती हो अंधेरों को चाँद का दीपक जलाए हुए माँ, देखा है हर सुबह तुम्हें तुलसी के चौरे पर मस्तक झुकाए हुए . परिचय :- नाम : रंजना फतेपुरकर शिक्षा : एम ए हिंदी साहित्य जन्म : २९ दिसंबर निवास : इंदौर (म.प्र.) प्रकाशित पुस्तकें ११ हिंदी रक्षक मंच इंदौर (hindirakshak.com) द्वारा हिन्दी रक्षक २०२० राष्ट्रीय सम्मान सहित ४७ सम्मान पुरस्कार ३५ दूरदर्शन, आकाशवाणी इंदौर, चायना रेडियो, बीजिंग से रचनाएं प्रसारित दे...
वृद्धाश्रम नही होता
कविता

वृद्धाश्रम नही होता

आशीष तिवारी "निर्मल" रीवा मध्यप्रदेश ******************** सबसे पहले माँ के श्री चरणों में अपना शीश झुकाता हूँ, उसके ही आशीषों से मैं थोड़ा बहुत जो लिख पाता हूँ। मेरे खातिर प्रथम देव है माँ मेरी, प्रथम गुरु है माँ मेरी नौ माह कोख में रख, मुझे दुनिया में ले आई है माँ मेरी। धर्म ग्रंथ और वेद पुराणों ने भी माँ की महिमा गाई है, माँ की ममता अनमोल धरोहर, माँ बच्चों की परछाई है। माँ पर कितना लिख पाऊँ मैं माँ ने मुझे आकार दिया है दुनिया में लेकर आई माँ सपनों से सुंदर संसार दिया है। तपिश में याद आती माँ के आंचल के शीतल छाया की, माँ मानवती है, माँ अरुणा है, माँ शिल्पी है इस काया की। खुद की भी परवाह नहीं, बच्चों के लिए समर्पित होती है ईश्वर ने भी है माना, माँ दुनिया की सर्वश्रेष्ठ कृति होती है। दुख सभी सहकर माँ बच्चों का जीवन सुखद बनाती है सिलबट्टे में पिस-पिस कर मानो हिना रंग दे जाती है। ...
मेरे लिए माँ
कविता

मेरे लिए माँ

पवन मकवाना (हिन्दी रक्षक)  इन्दौर (मध्य प्रदेश) ******************** मेरे लिए माँ सदा अनूठी ही रही माँ तो बस माँ होती है यह बात सदा झूठी ही रही कहते हैं माँ के साये से बड़ा कुछ और नहीं इस संदर्भ में किस्मत मेरी फूटी थी, फूटी ही रही प्रतीक्षा थी मिलेगा माँ का प्यार मुझे पर माँ जो मुझसे रूठी थी रूठी ही रही मेरे लिए माँ सदा अनूठी ही रही.... . परिचय : पवन मकवाना जन्म : ६ नवम्बर १९६९ निवासी : इंदौर मध्य प्रदेश सम्प्रति : संस्थापक- हिन्दी रक्षक मंच सम्पादक : hindirakshak.Com हिन्दीरक्षकडॉटकाम सम्पादक : divyotthan.Com (DNN) सचिव : दिव्योत्थान एजुकेशन एन्ड वेलफेयर सोसाइटी सम्प्रति : स्वतंत्र पत्रकार व व्यावसाइक छाया चित्रकार घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय ...
है कण्टक से पूर्ण प्रेम पथ
गीत

है कण्टक से पूर्ण प्रेम पथ

रशीद अहमद शेख 'रशीद' इंदौर म.प्र. ******************** सावधान रहना है प्रेमी प्रेम-यात्रा नियम कड़े। है कंटक से पूर्ण प्रेम पथ ज़रा संभल कर पाँव पड़े पथ पर पाहन पड़े नुकीले धधक रहे अंगारे हैं। तिमिर अमा का दिशा-दिशा में, ओझल चाँद-सितारे हैं। गहरी दुविधा की सरिता है, कठिनाई के अचल खड़े। है कण्टक से पूर्ण प्रेम पथ, ज़रा संभल कर पाँव पड़े। मन विचलित तन में पीड़ा है, ज्वर से तापित अंग सभी। अंधकार आँखों के सम्मुख, धुंधले-धुंधले रंग सभी। पग घायल, छाले फूटे हैं, अवरोधक हैं बड़े-बड़े। है कण्टक से पूर्ण प्रेम पथ, ज़रा संभल कर पाँव पड़े। नयनों में है फिर भी आशा, अद्भुत है विश्वास बसा। संकल्पित हैं तन-मन दोनों, व्रत है कोई पर्वत-सा। जगत साक्षी है चरणों ने, कितने ही इतिहास घड़े। है कण्टक से पूर्ण प्रेम पथ, ज़रा संभल कर पाँव पड़े . परिचय -  रशीद अहमद शेख 'रशीद' साहित्यिक उपनाम ~ ‘रशीद’ जन्मति...
मां
कविता

मां

राम शर्मा "परिंदा" मनावर (धार) ******************** बहन-बेटी और वही सास है मां हर रिश्ते का अहसास है हर रिश्ता हो सकता है गौण मां का रिश्ता बहुत खास है करले परिक्रमा मां की मानव मां में हर देवता का वास है उजाले से कर मां की तुलना मां अंधियारे में भी प्रकाश है मां के बिना सूना-सूना जहां मां हर त्यौहार का उल्लास है मां दरिया है प्रेम का परिंदा मां के बिना अधूरी प्यास है परिचय :- राम शर्मा "परिंदा" (रामेश्वर शर्मा) पिता स्व. जगदीश शर्मा आपका मूल निवास ग्राम अछोदा पुनर्वास तहसील मनावर है। आपने एम.कॉम बी एड किया है वर्तमान में आप शिक्षक हैं आपके तीन काव्य संग्रह १- परिंदा, २- उड़ान, ३- पाठशाला प्रकाशित हो चुके हैं और विभिन्न समाचार पत्रों में आपकी रचनाओं का प्रकाशन होता रहता है, दूरदर्शन पर काव्य पाठ के साथ-साथ आप मंचीय कवि सम्मेलन में संचालन भी करते हैं। आपके साहित्य चुनने का ...
श्रम-साधक को विश्राम कहा
कविता

श्रम-साधक को विश्राम कहा

गोरधन भटनागर खारडा जिला-पाली (राजस्थान) ******************** श्रम-साधक को विश्राम नहीं। कैसे ये विश्राम करें, क्षण-भर भी आराम न करें। लक्ष्य नहीं खुद अपना, बस कङी धुप में तपना। अनवरत,ही ये चल रहे, औरन के खातिर ये धुप में तपना रहे। सब कुछ अपना समझ कर, ये द्रुतगति से चल रहें। नयी किरण और नया जोश, रंग खुशी के भर रहें। साधक को विश्राम कहा, जो श्रम के पथ पर चल पङे। दिन समझे न रात, हर बार ये काम करें। श्रम साधकों को विश्राम कहा, जो श्रम के पथ पर चल पङे। श्रम इनका अविराम हैं, बस कर्म ही सुनिश्चित हैं। . परिचय :- नाम : गोरधन भटनागर निवासी : खारडा जिला-पाली (राजस्थान) जन्म तारीख : १५/०९/१९९७ पिता : खेतारामजी माता : सीता देवी स्नातक : जय नारायण व्यास यूनिवर्सिटी जोधपुर आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करव...