एक कप समय
प्रीति धामा
दिल्ली
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एक कप का समय
बस एक गरमा गरम
प्याली का ख़्याल आया,
उस वक़्त क्या-क्या किया
ये सवाल आया।
जैसे ही चाय
प्याली में उड़ेली गई,
प्याली ने भी
लब खोल ठिठोली की,
आधी चाय फर्श पे,
तो आधी प्याली
सँभाली गई।
जब धीरे-धीरे
प्याली से
निकल रहीं थी भाँपें,
उन भाँपों में
बनने लगे,
कुछ अक्स,
कुछ सपने
और कुछ तस्वीरें,
जो लगने लगी थी प्यारी,
लेकिन निरीह थी
कल्पना सारी।
धीरे-धीरे
ठंडी हो रही थी चाय,
और उसे पीने की
जद्दोजहद में मैं,
सुध-बुध भूल
बुन रही कुछ सपने,
कुछ किस्से,
अब बस
आखिरी घूँट बाकी थी,
या यूं कहें
मेरी कल्पनायें जो
टूटने की आदी थी।
लो अब आ गया
बिल्कुल पास,
वो समय था,
लो हो गई
आखिरी घूँट भी
ख़त्म,
सोचने, बोलने की
बस रुकी वहीं
वो उधेड़बुन,
उस थोड़े से समय में,
ज्यादा कुछ हुआ नहीं,
हक़ीक़त ज्यों की त्यों रह गयी,
बस मेर...