Thursday, April 3राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर आपका स्वागत है... अभी सम्पर्क करें ९८२७३६०३६०

पद्य

विष्णु, शंकर सनातन में
स्तुति

विष्णु, शंकर सनातन में

डॉ. किरन अवस्थी मिनियापोलिसम (अमेरिका) ******************** ऋग्वेद के अथर्वशीर्ष ने, पद्म पुराण, वाल्मीकि रामायण में आदित्यहृदयस्तोत्र ने सूर्य को विष्णु माना विष्णु का अर्थ ‘सर्वव्यापी‘ सूर्य है सर्वव्यापी ऊर्जा संपूर्ण ब्रह्मांड की रवि रश्मि है दात्री उससे प्रस्फुटित होती प्रकृति प्राणवायु की दाता प्रकृति। प्रकृति के मूल में सूर्य रूप में विष्णु विराजे कण-कण पर रवि की माया सहस्त्रनाम विष्णु ने पाया स्वयंभू विष्णु देते सबको आकार लेते स्वयं मनुज रूप में अवतार करने पृथ्वी और सज्जन का उद्धार।। शंकर शमन के कारक मूल स्थान उनका पर्वत, हिम का अंचल है सुखदायक जल का स्रोत, वहीं से गंगा शीतलता औ शांतिप्रदायक हिमगिरि कोशंकर माना गिरि और जल है कल्याणक इसीलिये शंकर को शिव माना सूर्य देव को विष्णु जाना।। एक‌ परमशक्ति का यही वितान ताप व शीतलता के‌ घट विष्णु और शंकर...
मैं तुमसे प्यार करता हूँ
कविता

मैं तुमसे प्यार करता हूँ

अशोक कुमार यादव मुंगेली (छत्तीसगढ़) ******************** तुम्हारे दिल में रहता हूँ। जानेमन तुम पे मरता हूँ।। सनम तुम जान हो मेरी, मैं तुमसे प्यार करता हूँ।। तेरे बिन रह नहीं सकता। जुदाई सह नहीं सकता।। तुम हर पल साथ हो मेरे, मैं तुझे भूल नहीं सकता।। ये दुनिया मधुबन लगती है। जीवन आनंदमय लगता है।। तुम बहार हो बगिया की, चहुँओर मनभावन लगता है।। खुशी और प्रेरणा हो तुम। सुख और चेतना हो तुम।। मुझे सफलता दिलाती हो, मेरी जीवन संगिनी हो तुम।। परिचय : अशोक कुमार यादव निवासी : मुंगेली, (छत्तीसगढ़) संप्राप्ति : शिक्षक एल. बी., जिलाध्यक्ष राष्ट्रीय कवि संगम इकाई। प्रकाशित पुस्तक : युगानुयुग सम्मान : मुख्यमंत्री शिक्षा गौरव अलंकरण 'शिक्षादूत' पुरस्कार से सम्मानित, उत्कृष्ट शिक्षक सम्मान, छत्तीसगढ़ हिन्दी रत्न सम्मान, अटल स्मृति सम्मान, बेस्ट टीचर अवॉर्ड। घोषणा पत्र : मैं यह प...
खुशबू बन बिखरना है
कविता

खुशबू बन बिखरना है

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** मर जाने के डर से नहीं मरना चाहते हो, तो आज ही मर जाओ, बड़ी जिंदगी चाहते हो तो अभी सुधर जाओ, सुधर कर भी गर मुर्दे ही रह गए, बिना प्रतिरोध सैलाब के धारे में बह मर गए, तो बता जी रहे थे वो कौन सी जिंदगी थी, न प्रतिकार न प्रतिशोध बकवास जीवन अब तक क्यों और किसके लिए सह गए, खंजर को हमारी जरूरत कभी नहीं होती, अगर लगाव होता तो वार करता ही क्यों? हल्के वार से भी शरीर नहीं रह पाता ज्यों का त्यों, मैं सुधर चुका हूं, अपनी जागृति वाली खुशबू संग कोने कोने में बिखर चुका हूं, कभी न कभी लोग साथ आएंगे, महक खोजते खोजते जब अपना भूत खोजेंगे तो निश्चित ही खुद खुशबू बिखरायेंगे, जिन्हें औरों की ड्योढ़ी पर निश दिन नाक रगड़नी है रगड़े, ऐसों को छोड़ो उनके हाल पर हर हाल में आगे बढ़ना है उनका जाल काटते बिना क...
हम सभी हैं मौज़ में
कविता

हम सभी हैं मौज़ में

डॉ. रमेशचंद्र मालवीय इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** आज हम सभी हैं मौज़ में क्योंकर जाएं हम फ़ौज़ में। सबको अपने-अपने सुख की चाह है सबकी अपनी मंज़िल, अपनी राह है देश पर मर मिटने वाले तो कोई और थे आज किसको अपने देश की परवाह है इंसान स्वयं अपनी खोज़ में आज हम सभी हैं मौज़ में। इस समय जो उठ रही है दूर आंधी न किसी ने रोकने की है पाल बांधी सभी अपने आपको समझ बैठे खुद़ा अब न कोई आएगा फिर से वो गांधी मानवता रो रही है रोज में आज हम सभी हैं मौज़ में। किस-किस से मांगने जाएंगे न्याय छल, कपट, धोखा, फरेब़, अन्याय न सुनी जाती पुकार किसी की यहां है ग़रीब़ी, मुफ़लिसी न कोई उपाय ईमान जा गिरा है हौज़ में आज हम सभी हैं मौज़ में। परिचय :- डॉ. रमेशचंद्र मालवीय निवासी : इंदौर (मध्य प्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। ...
द्रौपदी
कविता

द्रौपदी

किरण पोरवाल सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) ******************** पांच पति की द्रौपदी, छली गई वह नार, पासे पर फेंकी गई वह अबला हर बार, क्या पासा क्या दावा है स्त्री? उसका कोई अस्तित्व नहीं, जिस और उसे हांके कोई, गाय भैंस वह ढोर नहीं। एक संबंध के कारण झुकती है, आज अबला नहीं सबला नारी, कभी मायके कभी ससुराल में देखो, पासा बन बैठी है नारी। अपना व्यक्तित्व अपना है अहम, छल-कपट के कारण छली नारी, मन ही मन में वह विचार करें, क्या मेरा अस्तित्व नहीं कोई? क्यों दाव पर उसे लगाते हो, क्यों पासा उसे बनाते हो, अपनी इज्जत आबरू के कारण, तुम दुखी उसे कर जाते हो। एक आंख में आंसू उसके, एक आंख है नम है रही, औरों की राजनीति के कारण, अपनी इज्जत दाँव पर की। तुम समझो उसकी भावना को, नहीं किसी के पक्ष में वो, सबका साथ सबका है प्यार, बस यही उसी की झोली में है। मान अपमान सब सहन करें...
खुद बुलंद कर हौसला
मुक्तक

खुद बुलंद कर हौसला

राधेश्याम गोयल "श्याम" कोदरिया महू (म.प्र.) ******************** दुरियो को दूर कर दिल से मिटाले फासला, न घबरा गम की आंधियों से खुद बुलंद कर हौसला। दौर तो आते रहेंगे और टल भी जायेंगे, शोर तो होते रहेंगे जलजले जल जाएंगे। आज हिम्मत से तु अपनी फिर बनाले घोंसला...... चह चहा हट जो हुई है फिर से वो आजाएगी, चमन में पतझड़ भी होगा, फिर बहार आएगी। माली को मत दोष दे तू खुद ही करले फैसला........ वक्रता पहले भी समय की ऐसी ही देखी गई, मिटती इंसानों की बस्ती आबाद फिर से हो गई। घाव भर जाते समय से, गर हो मन में हौसला........ ये समय भी आया हे तो कुछ तो देकर जाएगा, दानवता को मानवता का पाठ भी पढ़ाएगा। सकारात्मक सोच रख तु मन में अपने जोशला........ धैर्य, धर्म को त्याग कर, धारणी रहा खंगाल, पाकर वेदों की पूंजी भी अब तक रहा कंगाल। समय तुम्हारे हाथ हे मानव, अब भी करले फैसला...... न घबरा ...
जीवनद्वंद
कविता

जीवनद्वंद

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** जीवन पल... पल, जीवन...क्षण-क्षण जीवन मे जीवन की हलचल जब किलकारी गूजे आगन मे सुख पाया मा के आचल ने। काजल का टीका लगाकर मुस्कूराता जीवन पल भर मे बाबा को सम्मोहित करता पग मे पैंजनियां पहने ढगमग, डगमग चलता जीवन। तुतलाती भाषा मे बोले केवल समझे, जाने मा का जीवन सरस्वती के अंक मे बैठ संस्कार, संस्कृति का पाठ पढता जीवन। नई राह, नया उद्देश्य, दृढता जीवन की भरता उडान सोपानो पर जीवन की पग-पग सीढी पल-पल संधान यह कहानी जीवन की। उदेश्यो मे सफल हुआ जीवन सात बन्धनो मे बन्ध गया कर्तव्य मे ऐसा, जकडा जीवन उसे लगा सब कुछ आनन्द एक क्षण गौरय्या सा उडता जीवन। और फिर और सोपानों पर चढते-चढते निढाल हो गया जीवन कुछ अंतराल मे लाठी पर आया जीवन दृष्टि, गति, कर्ण साथ छोडते जीवन का और ... और एक दिन अन्तिम यात्र पर जीव...
हिंदी का गुणगान
कविता

हिंदी का गुणगान

डॉ. राजीव डोगरा "विमल" कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) ******************** हिंदी का मैं गान करता हूँ हिंदी का मैं सम्मान करता हूँ। कभी मीरा को सुनता हूँ कभी कबीर को सुनाता हूँ। कभी जायसी के रहस्य में खो जाता हूँ कभी केशव के काव्य प्रेत से टकराता हूँ। कभी नानक की गुरुबानी बोलता हूँ कभी चंदबरदाई की वीरगाथा गाता हूँ। कभी तुलसीदास की तरह राम नाम का गुणगान करता हूँ। कभी सूरदास की तरह कृष्ण की हठकेलिया सुनाता हूँ। कवि हूँ हर हाव में, हर भाव में हिंदी का गुणगान करता हूँ। परिचय :-  डॉ. राजीव डोगरा "विमल" निवासी - कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) सम्प्रति - भाषा अध्यापक गवर्नमेंट हाई स्कूल, ठाकुरद्वारा घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख,...
मनाये रामनवमी
कविता

मनाये रामनवमी

गगन खरे क्षितिज कोदरिया मंहू (मध्य प्रदेश) ******************** सनातन धर्म के लिए एक हो जाओ हिन्दू। जन मानस भारतीय संस्कृति सभ्यता लिए जागो। एकता में होता दम, जातिगत समीकरण को, समाप्त करें। भेद-भाव मिटाकर हिन्दू जनहितैषी सकारात्मक ऊर्जा लिए हुए। जन जागरण हो, तो नैतिक पतन न हो हमारा, राम की महीमा ईष्ट जो सभी के राम सनातन धर्म की रामनवमी आ रही है हमारी संस्कृति सभ्यता का प्रतीक रामनवमी आ रही हैं। भारत में हिन्दूत्व ही पहचान हमारी। हिन्दू विश्व में अपनों के लिए प्यार मोहब्बत के लिए जाना जाता हैं गगन हमारी अंखणता परमात्मा जो जन-जन के दिलों बसते श्रीराम जीन की आ रही हैं रामनवमी रामनवमी भारतीयता में बहती श्रीराम की रामनवमी। महापुरुष ने फरमाया, शिक्षा की रोशनी समाज को मिले, संविधान धर्म निरपेक्षता लिए। क्यों न जातिवाद को भूला कर भाईचारा बढाये। भारतीय...
जय शिवाजी
कविता

जय शिवाजी

सरला मेहता इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** शाहजी भोंसले बाबा थे माँ थी महान जीजाबाई पुणे के शिवनेरी दुर्ग में अवतारे लाल शिवाजी थे माँ ने दी थी शिक्षा दीक्षा शस्त्र शास्त्र का ज्ञान मिला बुद्धिमानी निडरता पाई बहादुरी का थे दम भरते रामायण महाभारत पढ़ते सर्वधर्म समभाव वे रखते जातिभेद से नफ़रत करते सबको अपना ही समझते कद छोटा और छोटा घोड़ा पर भारत का नक्शा बदला छुरी कटार जैसे हथियार कपड़ो में छुपाकरके रखते गुफ़ा और कंदराओं से छापामारी खूब करते थे मुट्ठीभर सैनिक लिए वे पहाड़ी चूहों से दुबकते थे आदिल शाह ने चालाकी से शाह जी को किया नज़रबंद फ़िर भी आदिल तोड़ न पाया वीर शिवा का चक्रव्यूह बड़ी साहिबा बीजापुर ने अफ़ज़ल खान को भेजा था उसने जो गड्डा खोदा था वो ख़ुद ही जमीदोज हुआ शाइस्ता खान बराती बनकर औरंगजेब का संदेसा लाया तीन उंगलियाँ कटवा करके जान ब...
कौआ बदले चाल
गीत

कौआ बदले चाल

मीना भट्ट "सिद्धार्थ" जबलपुर (मध्य प्रदेश) ******************** ख़ूब जानता रमिया कैसे कौआ बदले चाल। अपने दल को छलते नेता, दल बदलू हो आज। फ़िक्र नहीं है कुछ जनता की, साधें अपना काज।। रंग बदलते हैं गिरगिट-सा, भरें तिजोरी माल। चलें थाम सत्ता का दामन, पैसों के हैं मीत। येन-केन हासिल हो ताकत, जाना है बस जीत चतुर शिकारी, उन्हें पता है, कहाँ छुपाना जाल। खोल पोल दूजों को लेते मोल दिखाकर माल।। गेंडे जैसी मोटी चिकनी, है इन सबकी खाल। बिना आग के इन्हें पता है, कैसे गलती दाल। परिचय :- मीना भट्ट "सिद्धार्थ" निवासी : जबलपुर (मध्य प्रदेश) पति : पुरुषोत्तम भट्ट माता : स्व. सुमित्रा पाठक पिता : स्व. हरि मोहन पाठक पुत्र : सौरभ भट्ट पुत्र वधू : डॉ. प्रीति भट्ट पौत्री : निहिरा, नैनिका सम्प्रति : सेवानिवृत्त जिला न्यायाधीश (मध्य प्रदेश), लोकायुक्त संभाग...
रणनीति
कविता

रणनीति

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** चुनाव में खड़े थे प्रत्याशी चार, जीतना है सबको नहीं चाहिए हार, चूंकि प्रतिद्वंद्वी थे तो मिलकर नहीं किये विचार, करना था एक दूजे पर प्रहार, पहले ने समर्थक वोटरों को गिना, कम पड़ रहे थे समर्थक तो कैसे जाएगा जीत छीना, योजना के तहत जाल बिछाया गया, फ्रेम में पांचवा प्रत्याशी लाया गया, जिसने द्वितीय उम्मीदवार के समर्थकों में अच्छा खासा पैसा बांट डाला, उनकी हिम्मत को काट डाला, दूसरे को पता नहीं कि रणनीति के तहत फोड़ा गया है बम, उसके सारे मतदाता खा पी नाच रहे झमाझम, पहले का अपना वोटर बच गया, दूसरे का वोटर पांचवे द्वारा कट गया, रणनीतियां ही करती है काम ईमानदार हो चाहे मूर्ख, हमेशा सफल रहते हैं चालबाज धूर्त। परिचय :-  राजेन्द्र लाहिरी निवासी : पामगढ़ (छत्तीसगढ़) घोषणा प...
होली
कविता

होली

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** संस्कृति की धरोहर है होली, संस्कारों की विरासत होली, प्रकृति का शृंगार है होली, जीवन का उपहार है होली, हम सबका गर्व है होली!! हर जीवन में रंग है भरती, चेहरों पर मुस्कान सजाती, स्नेह सौहार्द की धारा है होली रंगों की बौछार है होली !! शीत ऋतु की हो रही विदाई ग्रीष्म ऋतु की आहट आई, ज़न-जीवन मे उल्लास है भरती भूले बिसरों की याद है होली! प्रकृति की अनमोल धरोहर, हर रंग के जीव जानवर, इनपर भी हम प्यार लुटाए, प्रेम रंग से इन्हें सजाएं, मिलजुल कर त्यौहार मनाएं, आई होली आई होली!! परिचय :- श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी पति : श्री राकेश कुमार चतुर्वेदी जन्म : २७ जुलाई १९६५ वाराणसी शिक्षा : एम. ए., एम.फिल – समाजशास्त्र, पी.जी.डिप्लोमा (मानवाधिकार) निवासी : लखनऊ (उत्तर प्रदेश) सम्मान : राष्ट...
जिंदगी जीने की कला
कविता

जिंदगी जीने की कला

डॉ. प्रताप मोहन "भारतीय" ओमेक्स पार्क- वुड-बद्दी ******************** ईश्वर से सबको जिंदगी मिली है। किसी को कम किसीको ज्यादा मिली है। ******** जिंदगी सबके पास है पर सबको जीना नहीं आता। हर व्यक्ति खोने और पाने की चिंता में है जिंदगी गुजरता । ******* कुछ लोग जिंदगी गुजारते है। कुछ लोग जिंदगी काटते हैं। ******* जिंदगी मिली है तो जिंदगी का मजा लीजिये। जिंदगी जीने की कला सीख लीजिए। ******* सुख और दुख तो जिंदगी का हिस्सा है। यह सभी की जिंदगी का किस्सा है। ******* खुद भी खुश रहें दूसरों की भी खुशी का रखें ध्यान। तभी आप बन पायेंगे सबसे अलग इंसान। ******* सभी से प्यार और मोहब्बत करें। अपनी जिंदगी को खुशियों से भरे। ******* जिसको आ गयी जिंदगी जीने की कला। वही कर सकता है स्वयं और दूसरों का भला। ******* परिचय : डॉ. प्रताप मोहन "भारतीय" निवासी : चिनार-२...
बेकार लड़का
कविता

बेकार लड़का

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* बेकार लड़का माँ से नहीं डरता पिता से नहीं डरता और न ही मौत से बेकारी के दिनों में उसका सारा डर मर गया। सिगरेट के दाम से लेकर दोस्तों के चेहरों तक बहुत कुछ बदल गया दीवार से उतरे हुए पुराने कैलण्डर की तारीखें चली गईं अखबार की रद्दी के साथ थूकने के अलावा क्या बचा है बेकार लड़के के पास जबकि दिन बहुत छोटे हो गए हैं और ठंडी हवा गालों में चुभती है। बाज़ार की चिल्ल-पों धूल भरी गलियों के सूनेपन और अपनी पीठ पर टिकी कस्बे की आँखों से बचता देर रात पहुंचता है वह घर नींद में बड़बड़ाते पिता न जाने कब सुन लेते हैं किवाड़ों पर दी गई थाप पिता की दिनचर्या में शामिल हो गई है दरवाजे की हलचल सिर झुकाकर उसका सामने से गुजर जाना कुछ शब्दों के हेरफेर से जमाने का बिगड़ना और अरे मेरे भगवान कह फिर सो जाना...
न जाओ… रुक जाओ…
कविता

न जाओ… रुक जाओ…

बृजेश आनन्द राय जौनपुर (उत्तर प्रदेश) ******************** न जाओ, रुक जाओ...! तुम रुक गई तो 'जीवन' यूँ ही नहीं बीत पाएगा... बल्कि, ये अपना एक-एक पल आत्मा द्वारा मन व प्राणों संग अत्यंत सुकून से जी जाएगा ! प्रतिदिन सुबह होगी चाहे साँझ होगी, पर ये दुनिया न एक पल को भी बाँझ होगी! तुम्हारी आँखों से होकर हर बसन्त और सावन हरियाला हरसेंगे! तुम्हारे होठों पर से हो आने को कभी फाल्गुन तथा कभी चैता करषेंगे! तुम्हारे माथे से छिरकेगी जेठ-अषाढ़ी- नमकीनी- बारिश... तुम्हारे केशो में कभी हेमन्त तथा शिशिर के तुहिन-पाँव वर्तुल होंगे! और चेहरे से फिसलेगी फिर-फिर शारद- कार्तिकी पूनो यात्रा। परिचय :-  बृजेश आनन्द राय निवासी : जौनपुर (उत्तर प्रदेश) सम्मान : राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर म.प्र.द्वारा शिक्षा शिरोमणि सम्मान २०२३ से सम्मानित घोषणा पत्र : मैं यह प्र...
मेरा बचपन
कविता

मेरा बचपन

डॉ. राजीव डोगरा "विमल" कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) ******************** भुला बिसरा बचपन याद आता है अबोहर की गलियों में खेला हुआ बचपन याद आता है। नई आबादी का दुर्गा मां का सुंदर मंदिर याद आता है। गंगानगर रोड का पर माँ काली का अद्भुत दरबार याद आता है। कॉलेज रोड पर खिलखिलाता यौवन याद आता है। लगड़ी की टिक्की का खटा मीठा स्वाद याद आता है। शहर की गलियों में साथ घूमता वफादार दोस्त याद आता है। मुझे मेरा बचपन ही नहीं मेरा शहर अबोहर याद आता है। परिचय :-  डॉ. राजीव डोगरा "विमल" निवासी - कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) सम्प्रति - भाषा अध्यापक गवर्नमेंट हाई स्कूल, ठाकुरद्वारा घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्...
वे पुरानी औरतें
कविता

वे पुरानी औरतें

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* जाने कहाँ मर-खप गई वे पुरानी औरतें जो छुपाए रखती थी नवजात को सवा महीने तक घर की चार दीवारी में। नहीं पड़ने देती थी परछाई किसी की रखती थी नून राई बांध कर जच्चा के सिरहाने बेल से बींधती थी चारपाई रखती थी सिरहाने पानी का लोटा सेर अनाज दरवाजे पर सुलगाती थी हारी दिन-रात। कोई मिलने भी आता तो झड़वाती थी आग पर कपड़े और बैठाती थी थोड़ा दूर जच्चा-बच्चा से फूकती थी राई, आजवाइन, गुगल सांझ होते ही नहीं निकलती देती थी घर से गैर बखत किसी को। घिसती थी जायफल हरड़ बच्चे के पेट की तासीर माप कर पिलाती थी घुट्टी और जच्चा को देती थी घी आजवाइन में गूंथ कर रोटियाँ। छ दिन तक रखती थी दादा की धोती में लपेटकर बच्चे को फिर छठी मनाती थी बनाती थी काजल बांधती थी गले में राई लाल धागे से. पहना...
जीवन रुका नहीं करता
कविता

जीवन रुका नहीं करता

प्रमेशदीप मानिकपुरी भोथीडीह, धमतरी (छतीसगढ़) ******************** जिंदगी का काफिला तो जारी रहेगा हम रहे ना रहे सिलसिला जारी रहेगा एक के न होने से कोई फर्क नहीं पड़ता एक के न होने से जीवन रुका नहीं करता जीवन तो बस चलती का ही नाम है यह शरीर तो हाड़ मांस का मकान है मकान ढहने से सृजन रुका नहीं करता एक के न होने से जीवन रुका नहीं करता नियति का फल सबको मिलता ही है आज नहीं तो निश्चित कल मिलता है नियति किसी पर भी अन्याय नहीं करता एक के न होने से जीवन रुका नहीं करता कब क्या होगा यह तो वक्त ही बताएगा जीवन न जाने क्या-क्या गुल खिलाएगा बिना संघर्ष जीवन भी निखार नहीं करता एक के न होने से जीवन रुका नहीं करता हम भ्रम पाल के बैठे हमसे जगत है मिथ्या भ्रम की हमसे ही सब कुछ है हमारे झूठे भ्रम से जगत चला नहीं करता एक के न होने से जीवन रुका नहीं करता कौन-कौन है अपना कौन है पराया ...
राजा हरिशचन्द्र की काशी
कविता

राजा हरिशचन्द्र की काशी

अंजनी कुमार चतुर्वेदी "श्रीकांत" निवाड़ी (मध्य प्रदेश) ******************** विश्वनाथ काशी में बिराजे, धाम बनारस प्यारा। दिखता घाट-घाट पर सुंदर, अनुपम सुखद नजारा। विश्वनाथ गलियों के अंदर, बिराजे भोले बाबा। हिंदू संस्कृति में पावन, जनमानस का दावा। विश्वेश्वर भगवान यहाँ हैं, अनुपम छटा निराली। ज्योतिर्मय जगमग मंदिर में, लगता यथा दिवाली। गंगा में स्नान बनाकर, जो दर्शन है पाता। भक्त वही सायुज्य मोक्ष को, काशी में पा जाता। काशी में, जा तुलसीदास ने, पावन ज्ञान जगाया। रामचरितमानस लिख डाली, जग में सुयश कमाया। पावन गंगा जी के तट पर, मंदिर बना मनोहर। विश्वनाथ के दर्शन पाकर, प्रमुदित हृदय सरोवर। राजा हरिश्चंद्र की काशी, सबकी मोक्ष प्रदाता। पार्वती के साथ यहाँ हैं, बाबा स्वयं विधाता। जो काशी में देह त्यागता, परमधाम पा जाता। मिल जाता है मोक्ष मनुज को, लौट न...
इंतजार
कविता

इंतजार

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** माँ के हाथ की लकीरों में क्यूँ सिर्फ होता है "इंतजार" माँ बनने का इंतजार, बच्चे के स्कूल जाने, उनके वापस आने का इंतजार बड़े होकर घर से बाहर निकलना उनके वापसी का इंतजार अपने हाथों से पका ममता के स्वाद से भरा भोजन खिलाने का इंतजार, बच्चों के प्यार, रूसने, मान जाने का इंतजार बूढे होते थक चुके माँ के शरीर को, प्यार से गले लगाने का इंतजार बंद कमरे के कोने मे दुबकी निढाल माँ को किसी कदमों की आहट का इंतजार, दर्द से कराहती काया को किसी के दुलार का इंतजार, कमजोर बूढे होते शरीर को मजबूत लाठी का इंतजार अखिर कब तक करे माँ इंतजार क्या उसका भाग्य है "इंतजार??? माँ की झिल्लीयां पुरानी हो जाती है पर उसका प्यार कभी पुराना और बूढ़ा नहीं होता माँ की उम्मीद की इमारत को धराशायी मत होने दो, म...
आधुनिकता
कविता

आधुनिकता

किरण पोरवाल सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) ******************** चकाचौंध की दुनिया में बस भागम भाग है जीवन में, नहीं आत्मीयता नहीं है प्रेम, बस दिखावे है इस दुनिया में जंगल हो या हो बस्ती, नहीं पहचानते औरों को हम, हम और हमारे दो बस यही सिमटती दुनिया है। रिश्ते नाते सब दूर हुए, अब दोस्त यार है जीवन में, पैसे की अहमियत रह गयी अब, छलावा रह गया इस दुनिया में है। औरों के लिए जीते हैं ये, नहीं बहन भाई मौसी क्या है, त्योहारों पर घूमने जाना, रिश्ते नाते दबे मिट्टी में है। मर्यादा लाज धूमिल है हुई, शर्माते बूढ़े ठाड़े हैं, लज्जा से आंखें नम है हुई, आधुनिकता की इस दौड़ में है। "क्यों कृष्ण आए अब तो है यहां? किसकी साड़ी है बढ़ाने को, सब जींस पैंट में द्रोपती है, किसका यहां चीर बढ़ाने को" लूट रही रोज पैसों पर ये, नहीं कुल वंश का ख्याल रहा, मर्यादा पाली जिसने ...
ऑगन
कविता

ऑगन

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** घर का ऑगन प्यारा-प्यारा प्यारा-प्यारा न्यारा, न्यारा इस ऑगन में चिडिया चहके क्यारी-क्यारी फूल सजे गुन-गुन ध्वनी से इन पर मङराता भवरा लगे प्यारा। ऑगन मे सजी रंगोली स्वागत करती अतिथी का रवि किरणो से स्वर्णिम हौता ऑगन का कोना-कोना। इस ऑगन मे नाचे बिटिया बान्धे पायल पैरो मे रूण् झुन रूण् झुन ध्वनि गूंजती मा, बाबा के कानो मे। आगन में अमराई बौराती खटास भरी पवन झकौरो में। इस ऑगन मे बैठ बङे घर की शोभा है बढाते अतीत की यादो में गुम हो कभी खुशी कभी गम के आंसू छलक जाते। देखा है इस आँगन ने सुख-दुख का रैला कभी बिदाई बिटिया की कभी महापर्पाण का बोझा कभी विवाद कभी भाई मारत कभी-कभी देखा है कंही इस आँगन का बंटवारा। यह आँगन है सब देखता है जब संध्या समय तुलसी क्यारे में जलता है दीपक प्यारा आँगन को सजाने के लिए अत...
मेरा मुर्शिद
कविता

मेरा मुर्शिद

डॉ. राजीव डोगरा "विमल" कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) ******************** मेरी महफिल में अगर तुम आओ तो सारे शहर के गम ले आओ उन गमों को मेरे मुर्शद की एक मुस्कुराहट से घायल कर जाओ। मेरी महफिल में अगर तुम आओ तो सारे शहर के दर्द भरे अश्क़ ले आओ उन अश्कों को मेरे मुर्शद की एक निगाह से कायल कर जाओ। मेरी महफिल में अगर तुम आओ तो सारे शहर के जख़्म ले आओ उन जख्मों को मेरे मुर्शद के एक नाम से भरकर चले जाओ। परिचय :-  डॉ. राजीव डोगरा "विमल" निवासी - कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) सम्प्रति - भाषा अध्यापक गवर्नमेंट हाई स्कूल, ठाकुरद्वारा घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र क...
प्रेम
कविता

प्रेम

विकास कुमार शर्मा गंगापुर सिटी (राजस्थान) ******************** प्रेम- १ शक्कर की तरह घुलना और मिठास दूसरों को देना है प्रेम। शिव की तरह विष पीना और मुस्कुराना है प्रेम। प्रेम- २ मेले में कुछ ना खरीदना तवे पर जलती हुई उंगलियों को याद करना और हामिद के द्वारा अपनी अम्मा के लिए चिमटा खरीदना है प्रेम। काबुली वाले के सूखे मेवे और मिनी का प्रतीक्षा रत रहना है प्रेम। प्रेम- ३ भक्ति भाव में डूबी हुई प्रेम दीवानी मीरा का इकतारा, कृष्ण की मुरली गोपियों की दही की हांडी और राधा का उलाहना है प्रेम। परिचय :- विकास कुमार शर्मा निवासी : गंगापुर सिटी (राजस्थान) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के साथ प्रकाशित करव...