प्रतिध्वनि
मुनव्वर अली ताज
उज्जैन म.प्र.
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मैं वो नहीं हूँ
जो मैं हूँ
मैं हूँ इक झूठ
एक दिवास्वप्न
फिर भी, आपको मुझ में
कुछ अच्छा दिखाई देता है,
तो, वो है
मेरा आडम्बर
और आपकी नज़रों का फरेब
फिर छला किसने
और छला गया कौन
हो सकेगा न फैसला कोई
क्योंकि,
आदमी का आदमी
दर्पण नहीं है
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लेखक का परिचय :- मुनव्वर अली ताज उज्जैन
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