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कविता

होली है खुशियों का त्योहार
कविता

होली है खुशियों का त्योहार

किरण पोरवाल सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) ******************** सुख समृद्धि का हैं त्यौहार, आनंद उल्लास का पर्व महान, देखो खेतों में गेहूं उम्बी आई, खेतों में हरियाली छाई, कृषक खेतीहर है खुशहाल, होली है खुशियों का त्योहार। पेड़ों पर नई कोपले आई, आमों पर देखो मोढ़ है छाए, पशु पक्षी देखो चहकाये, टेसू पर भी आए फूल। प्रकृति देखो है खुशहाल, राधा कृष्ण की होली आज, बच्चे बूढ़े सभी खेलते, मन में आनंद देखो अपार। कोई रंग कोई अबीर गुलाल, खेले देखो मिलकर आज, कोई नाचे कोई झाझ बजावे, कोई भला कोई बुरा बताए, सबके मुंह पर एक ही बात, बुरा ना मानो होली आज। परिचय : किरण पोरवाल पति : विजय पोरवाल निवासी : सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) शिक्षा : बी.कॉम इन कॉमर्स व्यवसाय : बिजनेस वूमेन विशिष्ट उपलब्धियां : १. अंतर्राष्ट्रीय साहित्य मित्र मंडल जबलपुर से सम्मानित २. अंत...
होरी के सुरता
आंचलिक बोली, कविता

होरी के सुरता

प्रीतम कुमार साहू लिमतरा, धमतरी (छत्तीसगढ़) ******************** (छत्तीसगढ़ी कविता) आगे फागुन महीना संगी होरी के सुरता आवत हे गुदुम गुदुम ऩंगारा बाजय मन ह मोर गाँवत हे।। रंग गुलाल हाथ म धर के किसन खेलत हे होरी नाँचत गावँत अउ झुँमत हवय संग म राधा गोरी।। ललहु, हरियर अउ पिवरा स़ंग हाथ धरे पिचकारी मया पिरीत के रंग म रंगे जम्मों संगी संगवारी।। लइका, सियान, बुढ़वा जवान जम्मो डंडा नाँचत हे टोपी, चश्मा, मुखौटा पहिरे नंगत बाजा बजावत हे।। भाँग पिये मतवना खाय फागुन के गीत गाँवत हे करिया, बिलवा, ललहु दिखय, पहिचान नइ आवत हे।। परिचय :- प्रीतम कुमार साहू (शिक्षक) निवासी : ग्राम-लिमतरा, जिला-धमतरी (छत्तीसगढ़)। घोषणा पत्र : मेरे द्वारा यह प्रमाणित किया जाता है कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष...
नारी शक्ति का दिवस
कविता

नारी शक्ति का दिवस

प्रेम नारायण मेहरोत्रा जानकीपुरम (लखनऊ) ******************** नारी शक्ति का दिवस आज है, थोड़ा इनका वंदन कर लो। मान सभी को प्रिय लगता है, इनका सब अभिनन्दन कर लो। नारी शक्ति......... फूलों सा कोमल मन इनका, मोम सरिस ये पिघल है जाता। निर्मल मन जब इनको दिखता, वो ही इन्हें बहुत है भाता। पुष्प गुच्छ कर भेंट इन्हें, इनमें जसुदा मईया को जगा लो। नारी शक्ति........ दुर्गा, चंडी को मत देखो, वो इनका विकराल रूप है। ये है मंद पवन का झोंका, हम सब तो बस कड़ी धूप है। इनके मातृ रूप के संग तुम, अपना रिश्ता कायम कर लो। नारी शक्ति......... अन्नपूर्णा और सरस्वती , इनके रूप मधुर लगते हैं। पर कुदृष्टि डाले यदि कोई, दुर्गा, काली बन जगते हैं। अन्नपूर्णा रूप जगाकर, जो खिलाएं उसको सिर धर लो। नारी शक्ति......... परिचय :- प्रेम नारायण मेहरोत्रा निवास : जानकीपुरम (लखनऊ) घोषणा पत्र ...
होली के रंग
कविता

होली के रंग

डॉ. भगवान सहाय मीना जयपुर, (राजस्थान) ******************** याद आते है, मुझे होली के रंग। मतलबी दुनिया में, इंसान हुए बेरंग। स्वार्थवश गूंगी हुई, भाई चारे की चंग। रंग बदलते लोगों से, अचरज में सब रंग। देख नशा इंसान का, ठगी गई है भंग। उतरे रंग को देखकर, गुलाल रह गई दंग। कंठ कंठ में बजते, कड़वे भावों के मृदंग। ऊसर सब की वाणी, प्रेम वात्सल्य में जंग। भौतिक सुखी अंतर्मन, ठूंठ सरीखे नंग। गांव मौहल्ले भी, लगते शहर से बदरंग। परिचय :- डॉ. भगवान सहाय मीना (वरिष्ठ अध्यापक राजस्थान सरकार) निवासी : बाड़ा पदम पुरा, जयपुर, राजस्थान घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, ...
गड़बड़ हे भई
आंचलिक बोली, कविता

गड़बड़ हे भई

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** (छत्तीसगढ़ी कविता) छाता ओढ़ के सुरुज ल ढांकय देखव ए अत्याचारी मन, जोर जुलुम के बेवस्था ल पकड़े हावय देखव समाजिक बीमारी मन, हजारों साल के धत धतंगा करके नई अघाए हें, संकट खतरा कहि कहि के गरीब गुरबा ल सताये हें, नाक कटाय के डर नई हे कोनो नाक इंखर तो पइसा हावय, अकेल्ला रहिथंव मोर कोनो नई हे सुखाय नहीं जऊन भंइसा हावय, कुकुर बिलाई छेरी बछरू कतको के नजर म देवता आये, शरम बेच लोटा धर मांगय बइठे ठाले तीन तेलइ के खाये, हांसी आथे पढ़े लिखे मन उपर तर्क वितर्क ले दुच्छा हावय, गहना धर के मुड़ी ल अपन अनपढ़ जोगी जगा हाथ देखावय, मया पिरित नही हे देस से जेला ओहर का सियानी करही, ए डारा ले ओ डारा तक बेंदरा कस धतंग धियानी धरही, कांदी खाये पेट के भरभर पगुरा के वोला पचाही जी, चिंता फिकर का करना हे चारा दूसर लाही जी। ...
बंद कर लिया दरवाजा दिल का
कविता

बंद कर लिया दरवाजा दिल का

प्रतिभा दुबे "आशी" ग्वालियर (मध्य प्रदेश) ******************** मिलते है सूरत चाहने वाले सीरत कहां कोई जान पाया दिखावा तो बड़ा सरल रहा मन का किया कहां पहचान पाया।। उम्र गुजरती गई तमाम यूँ ही, नहीं किरदार मिला समझने वाला मैं दूर होता गया सबसे धीरे-धीरे यहां कौन था कभी समझने वाला।। लोग मिलते है तमाशबीन बनकर एक मैं था मोहब्बत लुटाने वाला नहीं सीखा था खफा रहना किसी से, लोगों ने मेरा अस्तित्व ही मिटा डाला।। अब जो संभला हूं ..... बड़ी मुश्किल हुई मुझे चोटिल करने को कोशिशें तमाम रही लोग घाव देते हैं यहां अपना बनाकर ही मैं अपनों की झूठी दुनियां से निकल आया।। मैंने भी दरवाजा बंद कर लिया इस दिल का लोग ढूंढ ही लेंगे कोई सूरत को चाहने वाला मुझे फूल से ज्यादा कांटे पसंद रहे सदा से ही कोई तो हो साथ, झूठे लोगों से बचाने वाला।। ...
सशक्त
कविता

सशक्त

किरण पोरवाल सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) ******************** भारत की बेटी है न्यारी, हर क्षेत्र में परचम भारी, निडर साहसी शक्तिशाली, दुश्मन पर पड़ती वो भारी, अबला नहीं सबला है सारी, अब नहीं मोहताज किसी की, गोला बारूद हाथ में उसके, बड़े विमान हाथ में उसके, हर-पद पर वह राज है करती, लक्ष्मी ,इन्दरा, सुनीता द्रुपति, नारी! सशक्तिकरण की मिसाल है सारी, नारी को हथियार शक्ति दे, अस्त्र प्रशिक्षण घर घर कर दे, आत्मनिर्भर नारी को कर दे, सीता सी अबला नहीं रहे वह, रण चण्डी काली सी कर दे, कोई आँख दिखाना पाये, कोई छेड उसे ना पाये, तत्क्षण दण्डित हे वो कर दे, न्याय का चाबुक दे हाथो मे, निडर! बनकर रहे जगत मै, कोई पापी, अत्याचारी! ना हो, काँपे उसके बल पौरुष से, सर्वागीण विकास हो उसका, हर क्षेत्र मै परचम उसका, हर पुरुष साहस शक्ति दे, फिर कोई रावण पैदा ना हो, फिर कोई ...
नारी
कविता

नारी

बृजेश आनन्द राय जौनपुर (उत्तर प्रदेश) ******************** उम्र बढ़ती है तो क्या, बढ़ जाने दो! आयु घटती है तो क्या, घट जाने दो! 'काया', कुछ ढलती है तो क्या, ढल जाने दो! पर तुम न अपनी 'मन की मुग्धा' को मारो, न माया, ममता, मोह को बिसारो; न डकने दो कैशोर्या की ड्योढ़ी कभी भी 'उसे', फूल की डाली बीच से सदा निहारो! तन-मन का करो नित-श्रृंगार अपने... अपने 'प्रिय' को कभी दूर से... कभी-कभी पास से अक्सर पुकारो! महकती रहो बहारों सी सदा... इक फूल की मुस्कान सदा होठों पे धारो! न सोचो मान करने को आजीवन, सदा बोल में संयम-सम्हालो! न सूखें 'आँख के आँसू' कभी उसके लिए ... ये मोती हैं तेरे अनमोल सदा उसके लिए... करो स्वागत सदा पलकों से- वन्दनवार सजाओ!! परिचय :-  बृजेश आनन्द राय निवासी : जौनपुर (उत्तर प्रदेश) सम्मान : राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर म.प्र.द्वारा ...
होली की हुडदंग
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होली की हुडदंग

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** होली हुडदंग, प्रकृति का मान्दल बाजे, मन्जिरे बाजे बाजे ढोल और ताशे होली आई रंग लाई गांऐ हुलियारे। देखो गगन ने केशरिया रंग बिखेरा हरित पर्ण लाये हरित वर्ण मोगरा, चम्पा, चमेली लाई श्वेत रंग देखो गुलमोहर ने लाल रंग छिडका पथ, पग, पगडंडी पर पीलापन फूलों ने धुम मचाई। पुष्पों के राजा गुलाब ने गुलाबी पंखुरी बिखराई। श्याम वर्ण मेध लाये श्याम रंग का उपहार फूलों संग गुनगुन गाते श्याम रंग के भँवरे गाते होली गीत। हर सिंगार सजाये केसरिया गजरा मोगरा, तुलसी गुलाब जल से जल हो गया सुगन्धित जो गजमुख से निकलकर प्रकृति को करता रोमान्चित ऐसी होली खेली कान्हा ने प्रकृति संग राधा भीगी परिचय :- इंदौर निवासी मालती खलतकर आयु ६८ वर्ष है आपने हिंदी समाजशास्श्र में एम ए एल एलबी किया है आप हिंदी में कविता कहानी लेख गजल आदि लिखती...
गंभीर और सुलझे जन
कविता

गंभीर और सुलझे जन

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** देखो कैसा मुमालिक ये, फर्ज को भुला बैठा है बन बैठा जज या पीठाधीश, काम क्या खुद का भूल गया कहते जो खुद को खबरनवीस, दो गुटों में बैठे हैं, एक दूजे से ऐंठे हैं, आधा सच बताता वो, आधा सच बताता ये, आधा झूठ परोसता वो, आधा झूठ परोसता ये, बैठे गोद धनकुबेरों के जन मन गन को लूट खसोटता ये, भ्रामकता में गूंगे बहरे जन, नहीं सच को खोजे इनका मन, तवायफों के दीदार को बैठे मुजरे में सब उलझे हैं, कुछ मत कहना इनको यारों जन गंभीर बहुत और सुलझे हैं। परिचय :-  राजेन्द्र लाहिरी निवासी : पामगढ़ (छत्तीसगढ़) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने पर...
टूटे दिल के टुकडे
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टूटे दिल के टुकडे

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** रौनक भरे शहर में धुआं-धुंआ सा क्यूँ है इंसानों की भीड़ में हर शख्स अकेला सा क्यूँ हैं! एहसास यहां सोये हुए से क्यूँ हैं आदमी बुत और दिल पत्थर से क्यूँ है! इस भीड़ के कोलाहल में हर कोई वजूद सा ढूंढता है, मानो टूटे दिल का कोई टुकड़ा ढूंढता हो! अधूरी सी कहानी है टूटे दिल की गीली पलकों पर नमी आंसुओं की! रूह में घुलता खालीपन सा क्यूँ है हर दिल मे सूनापन सा क्यूँ है! प्यार मोहब्बत यहां दम तोड़ देते हैं इंसानी दिल टूट के बिखर जाते हैं! सोचा ना था जिंदगी में कभी ऐसे फंसाने होंगे टूटे दिल के टुकड़े भी समेटने होंगे !! भटकता है मन अजीब सुनसान राहों पर इधर-उधर, काश मिल जाए कोई दिल मुस्कराहट से तर-बतर!! परिचय :- श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी पति : श्री राकेश कुमार चतुर्वेदी...
वेद और विज्ञान
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वेद और विज्ञान

डॉ. प्रताप मोहन "भारतीय" ओमेक्स पार्क- वुड-बद्दी ******************** विज्ञान की जो खोज हमारे सामने आई है। वो पहले से ही हमारे वेदों में समाई है। ******* हम गलत पढ़ते हैं कि विमान राईट ब्रदर्स ने था बनाया । क्योंकि रामायण काल में हमने पुष्पक विमान को है पाया। ******** हमारे वेदों में सारा विज्ञान समाया है। वेदों का ही सारा ज्ञान विज्ञान में आया है। ******* अर्थवेद में चिकित्सा ज्ञान समाया है। सारे आयुर्वेद को हमने इसमें पाया है। ******** हमारे चारों वेदों में शिल्प, विज्ञान और इंजीनियरिंग समाई है यहां से जानकारी अन्य देशों ने चुराई है। ******** बीजगणित हो या अंकगणित वनस्पतिशस्त्र हो या जीवशास्त्र भौतिक या रसायन विज्ञान वेदों में समाया है सारा ज्ञान। ******** परिचय : डॉ. प्रताप मोहन "भारतीय" निवासी : चिनार-२ ओमेक्स पार्क- वुड-बद्दी घोषणा : मैं यह शपथ ...
शोर
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शोर

संजय वर्मा "दॄष्टि" मनावर (धार) ******************** चिड़िया अपने घोसलों के लिए तिनके बीन कर लाई उसे फिक्र है अपने अंडों से निकले बच्चों के लिए सुरक्षित आवास देने की। उसने उड़ कर देख ली हैवानियत की दुनिया जहां मासूमियत को रौंदा जाता जिसकी रुदन की चीखों से चिड़िया के बच्चें डर गए पूछते माँ क्या इंसान इतना हैवान होगया। हमारे घोंसले में एक फाटक लगा देना हमसे मासूमियत की चीखें नहीं सुननी हैवानियत की गुहार कैसे करे जब हम उड़ने लगेंगे तब हम सब पक्षी शोर मचाएंगे जिससे लोगो का ध्यान हमारे शोर पर जाएगा लोगों को इस शोर से जागेंगे भले ही इंसान कानो में रुई ठोस के पड़े हो उसे जगना ही पड़ेगा क्योंकि हर घर मे चिड़िया सी बेटियां है। परिचय : संजय वर्मा "दॄष्टि" पिता : श्री शांतीलालजी वर्मा जन्म तिथि : २ मई १९६२ (उज्जैन) शिक्षा : आय टी आय निवासी : मनावर, धार (मध...
बहुत खुश है हम
कविता

बहुत खुश है हम

प्रीतम कुमार साहू लिमतरा, धमतरी (छत्तीसगढ़) ******************** पास आकर बैठो तो बताएंगे अपना गम दूर से पूछोगे तो कहेंगे बहुत खुश है हम..!! चार पैसे कमाने गांव से शहर आ गए, अपने ही घर से मानो बेघर हो गए हम..!! घर की तलाश में घर छोड़ आए है हम, गांव गली घर से रिश्ता तोड़ आए हम..!! लोगों की नजरों में अब अनजान बन गए अपने ही घर में हम मेहमान बन गए..!! चार पैसे कमाने दर-दर भटकते रहे हम कभी ख़ुशी कभी गम का घूंट पीते रहे हम..!! शहरों तक नहीं आती  मिट्टी की खुशबू, गाँव की मिट्टी से बहुत दूर आ गए हम..!! न गाँव के रहे अब ना शहर के रहे हम अपने बिना शहरों में भटकते रह गए हम..!! होंठों पे मुस्कान पर अब आँखे है क्यों नम पास आकर बैठो तो बताएंगे अपना गम..!! परिचय :- प्रीतम कुमार साहू (शिक्षक) निवासी : ग्राम-लिमतरा, जिला-धमतरी (छत्तीसगढ़)। घोषणा पत्र : मेरे ...
धुआँ-धुआँ-सी नारी ज़िन्दगी
कविता

धुआँ-धुआँ-सी नारी ज़िन्दगी

प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे मंडला, (मध्य प्रदेश) ******************** सिहर उठता हूं नारी-उत्पीड़न देखकर। दहल उठता हूं नारी प्रति शोषण देखकर।। कहीं दहेज है/कहीं घरेलू हिंसा है कहीं बलात्कार है, धुँआ-धुँआ-सी नारी ज़िन्दगी। कहीं जघन्यता के समाचार हैं कहीं छेड़खानी से भरे अख़बार हैं सिहर उठता हूं निर्भया के दर्द को लेखकर। सिहर उठता हूं नारी-दुर्दशा को देखकर।। कैसा आलम है, कैसा मौसम है चारों ओर है बस दरिंदगी। धुआँ-धुआँ-सी नारी ज़िन्दगी।। कोलकाता अस्पताल की भयावहता हृदयविदारक हालात चीखती-चिल्लाती एक नारी तंत्र के मुँह पर तमाचा व्यवस्था की हक़ीक़त का ख़ुलासा भारी शोरशराबा, आंदोलन हाथ की आई शून्य धुआँ धुआँ-सी नारी ज़िन्दगी। कहते हैं देवी, पर वह पीड़ित है। पूजते हैं हम, पर वह शोषित है।। उसकी काया बनी भोग का सामान है। गिरता जा रहा है, सम्मान है।। बढ़ती जा रही है देखो ज़...
हवाओं का हेंगा चला
कविता

हवाओं का हेंगा चला

बृजेश आनन्द राय जौनपुर (उत्तर प्रदेश) ******************** हवाओं का हेंगा चला चैत के मौसम में! फसलों को नींद आई चैत के मौसम में!! कुम्हलाए हुए मन को अब कौन जगाए? सोती हुई फसलों को- कैसे कर उठाए! खेती के भाग सोए बासन्ती-समागम में!! चला गया वात-चक्र पवन अब भी शीतल है! रह-रहके प्रात:-रात गिरता किया नभ-जल है! सोने जैसे गेहूँ का - रूप सना पंकम में! नीले-नीले मौसम में पहाड़ों की याद आई दिन-भर घिरे बादल में शिलांग जैसी छवि छाई पर कृषकों के नींद उड़ी मैदानी मौसम में! कुमायूँ की सड़कों पे बुल्ले उछल रहें चट्टानों से तेज-धार झरने निकल रहें हरा-स्वप्न डूब गया नदियों के झमझम में! हवाओं का हेंगा चला चैत के मौसम में! फसलों को नींद आई चैत के मौसम में!! परिचय :-  बृजेश आनन्द राय निवासी : जौनपुर (उत्तर प्रदेश) सम्मान : राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंद...
नारिया
कविता

नारिया

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** सतयुग, द्वापर, त्रेता या कलियुग नारी सदैव डटी रही अपनै धैर्य पर अहिल्या, अनुसुइया, अरुन्धती ने अपने तप से इतिहास रचा कौशल्या, कुन्ती, सीता सह्कारिक पुत्र संग महाभारत, रामायण रचा। लक्ष्मी, पार्वती, सीता चन्डी बन रण मे उतरी मीरा, मुक्ता बनी भक्ति की पराकाष्ठा सन्त सखु, गौरा ने गाई जीवन की कटु सत्य गाथा। दुर्गा, झांसी की रानी की तलवारे कहती आज उनकी कहानी पद्मिनी का जौहर क्यो भूलें मां होकर भी कठोर बनी जीजाबाई, पन्ना धाई अहिल्याबाई। और आज की नारी भी कहती है मै अबला नही सबला हूँ उची उड़ान भर हिमालय, अन्तरिक्ष मे पंहुच गई पंहुच गई समर रण मे शान्ति दूत बनी देश, विदेशों में रहकर भारत का तिरंगा लहराती। मां सरस्वती का वरदान इनको चित्रांकन, लेखन पर लेखनी चलती। दया, दान, उदारता, समर्पण का संकल्प लेकर ...
एक वक्त के बाद
कविता

एक वक्त के बाद

शशि चन्दन "निर्झर" इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** किस्से-कहानी बदल जातें हैं एक वक्त के बाद। नन्हें-नन्हें पौधे वृक्ष हो जातें हैं एक वक्त के बाद। तमाम अरमान गुजरते तो हैं आंखों की गलियों से.. फिर मोती से कौरों पे ठहर जाते हैं, एक वक्त के बाद।। सुनो नया-नया सा एहसास पाकर, गैर भी क़रीब आ जाते, तासीर मुताबिक़ अपने पराए हो जाते हैं एक वक्त के बाद।। रहमत खुदा की, अमानत अपने वतन की सहेजे तो सही... पर जानें कैसे अहम के डंके बजने लगते, एक वक्त के बाद।। पंक में खिलते पंकजराज, रंग बिरंगे हाथों में जचती हिना लाल, कि राजा रंक फकीर सबकी, होती एक ही गति, एक वक्त बाद।। सुन "शशि" धरती अम्बर नाप ले जितना नाप सके, कि ये माटी की काया माटी हो जाती एक वक्त के बाद।। परिचय :- इंदौर (मध्य प्रदेश) की निवासी अपने शब्दों की निर्झर बरखा करने वाली शशि ...
मृत्यु शय्या
कविता

मृत्यु शय्या

डॉ. प्रताप मोहन "भारतीय" ओमेक्स पार्क- वुड-बद्दी ******************** जन्म और मृत्यु शाश्वत सत्य है। नहीं कोई इसका विकल्प है। ******* एक दिन सभी को मृत्यु शय्या पर सोना है। चाहे आप हो या डॉक्टर सभी का यह हाल होना है। ******** जिसने जन्म लिया है उसकी मृत्यु निशचित होगी। किसी की आज तो किसकी कल होगी। ******* मृत्यु से आज तक कोई जीत नहीं पाया है। जिसने भी लिया है जन्म अवश्य मृत्यु को पाया है। ******* मृत्यु शय्या पर पहुंचने से पहिले जिंदगी जीना सीख लीजिए। कुछ अच्छे कर्म करें कभी किसी को कष्ट न दीजिए। ****** जब आपने अच्छे कर्म किये होंगे तभी यह बात होवेगी। जन्म लेने पर आप रोये थे। मृत्यु होने पर दुनियां आपके लिये रोयेगी। ******* मृत्यु शय्या हमारी अंतिम शय्या है। जिस से हम उठ नहीं पाते है। मिट्टी से जन्म लिया है और मिट्टी में ही मिल जाते है।...
हो जाओ तैयार साथियों
कविता

हो जाओ तैयार साथियों

प्रीतम कुमार साहू लिमतरा, धमतरी (छत्तीसगढ़) ******************** हो जाओ तैयार साथियों अब परीक्षा की बारी है लक्ष्य भेद कर दिखलाओ कौन किस पर भारी है !! मुश्किलों से लड़कर तुम्हें लक्ष्य मार्ग पर बढ़ना है छोड़ आलस का दामन रगो में साहस भरना है !! कर्म से किस्मत लिखने की अब तुम्हारी बारी है हो जाओ तैयार साथियों अब परीक्षा की बारी है !! सफलता नहीं मिल जो किस्मत पर भरोसा करते है मंजिल उन्हें मिलती जो दिन-रात मेहनत करते है !! मेहनत करने वालों पर ही सफलता बलिहारी है हो जाओ तैयार साथियों अब परीक्षा की बारी है !! परिचय :- प्रीतम कुमार साहू (शिक्षक) निवासी : ग्राम-लिमतरा, जिला-धमतरी (छत्तीसगढ़)। घोषणा पत्र : मेरे द्वारा यह प्रमाणित किया जाता है कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष...
मैं तुमसे प्यार करता हूँ
कविता

मैं तुमसे प्यार करता हूँ

अशोक कुमार यादव मुंगेली (छत्तीसगढ़) ******************** तुम्हारे दिल में रहता हूँ। जानेमन तुम पे मरता हूँ।। सनम तुम जान हो मेरी, मैं तुमसे प्यार करता हूँ।। तेरे बिन रह नहीं सकता। जुदाई सह नहीं सकता।। तुम हर पल साथ हो मेरे, मैं तुझे भूल नहीं सकता।। ये दुनिया मधुबन लगती है। जीवन आनंदमय लगता है।। तुम बहार हो बगिया की, चहुँओर मनभावन लगता है।। खुशी और प्रेरणा हो तुम। सुख और चेतना हो तुम।। मुझे सफलता दिलाती हो, मेरी जीवन संगिनी हो तुम।। परिचय : अशोक कुमार यादव निवासी : मुंगेली, (छत्तीसगढ़) संप्राप्ति : शिक्षक एल. बी., जिलाध्यक्ष राष्ट्रीय कवि संगम इकाई। प्रकाशित पुस्तक : युगानुयुग सम्मान : मुख्यमंत्री शिक्षा गौरव अलंकरण 'शिक्षादूत' पुरस्कार से सम्मानित, उत्कृष्ट शिक्षक सम्मान, छत्तीसगढ़ हिन्दी रत्न सम्मान, अटल स्मृति सम्मान, बेस्ट टीचर अवॉर्ड। घोषणा पत्र : मैं यह प...
खुशबू बन बिखरना है
कविता

खुशबू बन बिखरना है

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** मर जाने के डर से नहीं मरना चाहते हो, तो आज ही मर जाओ, बड़ी जिंदगी चाहते हो तो अभी सुधर जाओ, सुधर कर भी गर मुर्दे ही रह गए, बिना प्रतिरोध सैलाब के धारे में बह मर गए, तो बता जी रहे थे वो कौन सी जिंदगी थी, न प्रतिकार न प्रतिशोध बकवास जीवन अब तक क्यों और किसके लिए सह गए, खंजर को हमारी जरूरत कभी नहीं होती, अगर लगाव होता तो वार करता ही क्यों? हल्के वार से भी शरीर नहीं रह पाता ज्यों का त्यों, मैं सुधर चुका हूं, अपनी जागृति वाली खुशबू संग कोने कोने में बिखर चुका हूं, कभी न कभी लोग साथ आएंगे, महक खोजते खोजते जब अपना भूत खोजेंगे तो निश्चित ही खुद खुशबू बिखरायेंगे, जिन्हें औरों की ड्योढ़ी पर निश दिन नाक रगड़नी है रगड़े, ऐसों को छोड़ो उनके हाल पर हर हाल में आगे बढ़ना है उनका जाल काटते बिना क...
हम सभी हैं मौज़ में
कविता

हम सभी हैं मौज़ में

डॉ. रमेशचंद्र मालवीय इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** आज हम सभी हैं मौज़ में क्योंकर जाएं हम फ़ौज़ में। सबको अपने-अपने सुख की चाह है सबकी अपनी मंज़िल, अपनी राह है देश पर मर मिटने वाले तो कोई और थे आज किसको अपने देश की परवाह है इंसान स्वयं अपनी खोज़ में आज हम सभी हैं मौज़ में। इस समय जो उठ रही है दूर आंधी न किसी ने रोकने की है पाल बांधी सभी अपने आपको समझ बैठे खुद़ा अब न कोई आएगा फिर से वो गांधी मानवता रो रही है रोज में आज हम सभी हैं मौज़ में। किस-किस से मांगने जाएंगे न्याय छल, कपट, धोखा, फरेब़, अन्याय न सुनी जाती पुकार किसी की यहां है ग़रीब़ी, मुफ़लिसी न कोई उपाय ईमान जा गिरा है हौज़ में आज हम सभी हैं मौज़ में। परिचय :- डॉ. रमेशचंद्र मालवीय निवासी : इंदौर (मध्य प्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। ...
द्रौपदी
कविता

द्रौपदी

किरण पोरवाल सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) ******************** पांच पति की द्रौपदी, छली गई वह नार, पासे पर फेंकी गई वह अबला हर बार, क्या पासा क्या दावा है स्त्री? उसका कोई अस्तित्व नहीं, जिस और उसे हांके कोई, गाय भैंस वह ढोर नहीं। एक संबंध के कारण झुकती है, आज अबला नहीं सबला नारी, कभी मायके कभी ससुराल में देखो, पासा बन बैठी है नारी। अपना व्यक्तित्व अपना है अहम, छल-कपट के कारण छली नारी, मन ही मन में वह विचार करें, क्या मेरा अस्तित्व नहीं कोई? क्यों दाव पर उसे लगाते हो, क्यों पासा उसे बनाते हो, अपनी इज्जत आबरू के कारण, तुम दुखी उसे कर जाते हो। एक आंख में आंसू उसके, एक आंख है नम है रही, औरों की राजनीति के कारण, अपनी इज्जत दाँव पर की। तुम समझो उसकी भावना को, नहीं किसी के पक्ष में वो, सबका साथ सबका है प्यार, बस यही उसी की झोली में है। मान अपमान सब सहन करें...
जीवनद्वंद
कविता

जीवनद्वंद

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** जीवन पल... पल, जीवन...क्षण-क्षण जीवन मे जीवन की हलचल जब किलकारी गूजे आगन मे सुख पाया मा के आचल ने। काजल का टीका लगाकर मुस्कूराता जीवन पल भर मे बाबा को सम्मोहित करता पग मे पैंजनियां पहने ढगमग, डगमग चलता जीवन। तुतलाती भाषा मे बोले केवल समझे, जाने मा का जीवन सरस्वती के अंक मे बैठ संस्कार, संस्कृति का पाठ पढता जीवन। नई राह, नया उद्देश्य, दृढता जीवन की भरता उडान सोपानो पर जीवन की पग-पग सीढी पल-पल संधान यह कहानी जीवन की। उदेश्यो मे सफल हुआ जीवन सात बन्धनो मे बन्ध गया कर्तव्य मे ऐसा, जकडा जीवन उसे लगा सब कुछ आनन्द एक क्षण गौरय्या सा उडता जीवन। और फिर और सोपानों पर चढते-चढते निढाल हो गया जीवन कुछ अंतराल मे लाठी पर आया जीवन दृष्टि, गति, कर्ण साथ छोडते जीवन का और ... और एक दिन अन्तिम यात्र पर जीव...