पिता की याद
मनीषा व्यास
इंदौर म.प्र.
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दुनिया के गम को
हंसकर झेल लेती हूं,
सहेजकर रखी यादों को
तस्वीर में समेट लेती हूं
पिता की याद में अक्सर
छिपकर रो लेती हूं ।
जिंदगी के लम्हों में
यादों को ताज़ा करती हूं
चेहरे की झुर्रियों में,
सदियां खोज लेती हूं,
पिता की याद में
अक़्सर रो लेती हूं।
घर पहुंचकर ठिठक
जाती हूं, अचानक फिर
तस्वीर देख लेती हूं।
चौखट पर सर को झुकाकर
नमन कर लेती हूं,,.................
पिता की याद........
स्मृतियां क्षण-क्षण सामने
आती हैं, फिर उनके हौसले को
सलाम कर लेती हूं।
कलम थमने सी लगती है
शब्द फिर बटोर लेती हूं
पिता की याद,.....
गमगीन जिंदगी की
उदासी भरी शाम और
दर्द से भरी सुबह के आभास में
पिता की कर्मठता,
धैर्य ,विवेक और साहस
फिर खोज लेती हूं।
पुरुषार्थ की कर्म गीता पढ़ लेती हूंl
पिता की याद में अक्सर
छिपकर रो लेती हूं।
परिचय :- मनीषा व्यास (लेखिका संघ)
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