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कविता

पिता की याद
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पिता की याद

मनीषा व्यास इंदौर म.प्र. ******************** दुनिया के गम को हंसकर झेल लेती हूं, सहेजकर रखी यादों को तस्वीर में समेट लेती हूं पिता की याद में अक्सर छिपकर रो लेती हूं । जिंदगी के लम्हों में यादों को ताज़ा करती हूं चेहरे की झुर्रियों में, सदियां खोज लेती हूं, पिता की याद में अक़्सर रो लेती हूं। घर पहुंचकर ठिठक जाती हूं, अचानक फिर तस्वीर देख लेती हूं। चौखट पर सर को झुकाकर नमन कर लेती हूं,,................. पिता की याद........ स्मृतियां क्षण-क्षण सामने आती हैं, फिर उनके हौसले को सलाम कर लेती हूं। कलम थमने सी लगती है शब्द फिर बटोर लेती हूं पिता की याद,..... गमगीन जिंदगी की उदासी भरी शाम और दर्द से भरी सुबह के आभास में पिता की कर्मठता, धैर्य ,विवेक और साहस फिर खोज लेती हूं। पुरुषार्थ की कर्म गीता पढ़ लेती हूंl पिता की याद में अक्सर छिपकर रो लेती हूं। परिचय :-  मनीषा व्यास (लेखिका संघ) शि...
गुरू मंत्र निराला
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गुरू मंत्र निराला

अंजली सांकृत्या जयपुर (राजस्थान) ******************** मेरे पथ का साथी हैं, पाखी मेरे हूनूर का... गुरु संग क़दम बढ़ाते चल, गुरु द्रोण की तस्वीर बन... मैं मुसाफ़िर, मँझधार में... मेरे उड़ान को भरते चल... क़िस्मत का खेल ना बन, कर्म का भाग्य बन।। मैं उदय हो जाऊँ सूरज सा, ऐसा उत्साह भरता चल... तूँ परछाईं बनाता चले, मै संग रास्ते चलता चलूँ।। गुरु हैं सफ़लता का मंत्र, थामे उसका हाथ चल।। मेरे ज़ुनून की आग को, पाक नज़रो ने तराशा हैं.. मैं हीरा तेरे कक्ष का, मंज़िल का साथी बन।। क़िस्मत की आँखे दिए, हवाओं को सन्न करता चल... गड़गड़ाहटों के दोर का, मेरा हिस्सा बनता चल... क़लम तूने सिखाई हैं, हवाओं में रूत आइ हैं.. छेड़खानिया मेरे सपनो से, शैतानिया बढ़ाई हैं।। तूँ संग मेरे जलता गया, मैं लोहे जेसे पिघलता गया।। मैं हथियार, तेरी धार का.. तेरा नाम जहांन में करता गया... तेरा नाम जहान में करता गया।। गुरू इत...
आत्म  मंथन
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आत्म मंथन

अनुराग बंसल जयपुर राजस्थान ******************** जब भी अकेला बैठता हूँ, शुन्य की गहराइयों मैं यह सोचने लग जाता हूँ। क्या खोया और क्या पाया समझ नहीं पाता हूँ।। जब भी अकेला बैठता हूँ, अतित की गहराइयों मैं डूबने लग जाता हूँ। क्या गलत किया और क्या सही का हिसाब नहीं लगा पाता हूँ।। जब भी अकेला बैठता हूँ , खुद से ही बाते करने लग जाता हूँ। क्यों हो रहा हैं ये का जवाब ढूंढ नहीं पाता हूँ।। जब भी अकेला बैठता हूँ, कुछ हसीन लम्हे याद आ जाते है, फिर दिल को ये समझाता हु, जो होना था हो गया, और आगे बढ़ने की कोशिश करने लग जाता हूँ।। . परिचय :- अनुराग बंसल निवासी : जयपुर राजस्थान शिक्षा : एम.टेक. (स्ट्रक्चर), बी.टेक (सिविल) घोषणा पत्र : प्रमाणित किया जाता है कि रचना पूर्णतः मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्...
जीत निश्चय है हमारी
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जीत निश्चय है हमारी

अमर सिंह राठौड़ राजसमन्द राजस्थान ******************** कोरोना वुहान से आया, लगता इसे प्राप्त वरदान। मानवता का है ये शत्रु, तोड़ देंगे इसका अभिमान। विश्व की भांति भारत को, इस जंग से लड़ना है। हर जंग में हुआ विजेता, ठान फिर से करना है। हमे है कोरोना से लड़ना, मानव तुम करो एकता। अनेकता में होती एकता, ये भारत की विशेषता। समाजिक दूरी रखना है, ये जीत हमे दिलवाएगी। आखिर ये बकरे की माँ, कब तक खैर मनाएगी। बीमार से न लड़ना हमे, कोरोना से लड़ लीजिये। जंग की दवा बस दुआ, योद्धा सम्मान कीजिये। मूल धर्म क्या है? अपना, जरा तुम यह सोचना। धर्म, जाति और पार्टीवाद, ये पड़ेगा अब छोड़ना। आत्मविश्वास व संकल्प से, जीत निश्चय है हमारी। इस भारत के गौरव का, गान करेगी दुनिया सारी। . परिचय :- अमर सिंह राठौड़ पिता : मोखम सिंह जी निवासी : कनावदा "राजसमन्द" राजस्थान शिक्षा : १२वी विद्यार्थी रा.उ.मा.वि.देवपुरा र...
हद कर दी आपने
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हद कर दी आपने

रमेशचंद्र शर्मा इंदौर मध्य प्रदेश ********************  सारा माल हजम, कुछ तो करो शरम, नोट लगे छापने, हद कर दी आपने ! खोटे तुम्हारे करम, माल उड़ाते गरम, कमा रखा था बाप ने, हद कर दी आपने ! कुछ तो पालो धरम, भ्रष्टाचारी घोर चरम, पीढ़ियां लगेगी धापने, हद कर दी आपने ! मत पालो अब वहम, पापी नारकी बेशरम, क्या डस लिया सांप ने, हद कर दी आपने ! प्रभु की मार बड़ी मरम, किसी दिन बिकेंगे हरम, फिर लगोगे यहीं कांपने, हद कर दी आपने ! हिस्सा खाते दूसरों का, पाप घड़ा भरा अपनों का, जल्दी कंडे लगोगे थापने, हद कर दी आपने ! बगुला भगत बनते हो, स्वांग मदारी धरते हो, माला लगते जापने, हद कर दी आपने ! परिचय : रमेशचंद्र शर्मा निवासी : इंदौर मध्य प्रदेश घोषणा पत्र : प्रमाणित किया जाता है कि रचना पूर्णतः मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकत...
एक रात यूँ ही
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एक रात यूँ ही

ओमप्रकाश सिंह चंपारण (बिहार) ******************** एक रात यूँ ही मै ठिठक कर सहम गया अस्मा की ओर हाथ बढ़ाकर लपक गया। निस्तब्ध शांत रात में क्या दीवाली माना रहे हो अपने घर मे तुम महा पटका उड़ा रहे हों। तोपो की जैसी गरज आवाज में तिमिर की प्रकाश में तुम महदीपवाली माना रहे हो बोलो बदलो तभी उत्तर में कुछ बूंदे टपकी। अचानक अंधकार की घानाआवरण सम्पूर्ण दिशा में फैल गयी। मालूम हुआ कि कम्पन से सम्पूर्ण दिशा ही हिल गयी। तिमिर की प्रकाश सभी मीठे दिख पड़े सभी स्वच्छ निरभ्र शांत। ईस्वर की तरफ से यह ओमकार ध्वनि होता है प्रार्थना रूपी साक्षात्कार होता है। वर्षा की रात सुहानी झींगुर की गुंजन दादुर की टर टर की आवाज में यह रात शोभायमान होती है परी रूपी बदलो की समूहों से वर्षा की बूंदो रूपी पुष्पो से मातृ भूमि की अभिषेक होती है जन जीवन मे फिर से नव गीत की संचार होती है। . परिचय :- ओमप्रकाश सिंह (शिक्षक म...
कृषक
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कृषक

मनोरमा जोशी इंदौर म.प्र. ******************** धरती माता के आँचल में, हरियाली जो बोते। अमन चमन की, खुशियाली को, श्रम का बोझा ढोते। वो किसान होते। शीत धाम आंधी वर्षा में हँसते कदम बढा़ते। खेत और खलिहानों के हीं गुण गोरव ये गाते। पले धूल मिट्टी में जन्मे इस में ही मिल जाते। अर्द्ध नग्न तन भूखे रत हैं किन्तु नहीं कुम्लाते। अन्न देश को जुटा रहें हैं ये किसान कहलाते। लगे जूझनें संघर्षों से, वे विश्राम न पाते। माँ समेट लेती गोदी में ये तो श्रम के है दीवाने। नमन उन्हें मे करती, उनकी व्यथा कोन जाने। परिचय :-  श्रीमती मनोरमा जोशी का निवास मध्यप्रदेश के इंदौर में है। आपका साहित्यिक उपनाम ‘मनु’ है। आपकी जन्मतिथि १९ दिसम्बर १९५३ और जन्मस्थान नरसिंहगढ़ है। शिक्षा - स्नातकोत्तर और संगीत है। कार्यक्षेत्र - सामाजिक क्षेत्र-इन्दौर शहर ही है। लेखन विधा में कविता और लेख लिखती हैं। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओ...
मजदूरों की आंखें
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मजदूरों की आंखें

पायल ‌पान्डेय कांदिवली, पूर्व- मुंबई ******************** इन मजदूरों की आंखें नम हैं, ज़रा, पूछों इनसे, इन्हें क्या ग़म है? नेत्रों से अश्रु धारा बही जा रही है, लग रहा है, जीवन जैसे वीरान वन‌ है। मीलों दूर चल रहें हैं, अधर जैसे एक मुस्कान के लिए तरस रहे हैं, इक आस में छोड़ कर अपना घर-बार, सुकून कि तलाश में ये इतना भटक रहे हैं। पैरों में थकन बेशुमार है, ह्रदय में पीड़ा अपार है, ये कैसा समय आया है, दर दर की ठोकरें खाने के लिए, ये मजदूर बेबस और लाचार हैं। सरकारी राहतों की योजना भी, अब इनके मन की व्यथा नहीं मिटाती, जल की शीतलता भी, अब इनकी प्यास नहीं बुझा पाती। लाचारी का इतना बेबस आलम है की, शरीर की काया भी अब इनका साथ छोड़ती जाती! मंजिल तो अभी दूर है, फिर भी अपने कर्मों में प्रयत्नरत इनका तन है! कभी तो बदलेगी यह स्थिति भी, इसी आस में बीतता, अब इनका जीवन है। इन मजदूरों की आंखें नम हैं, ...
कोख की आवाज़
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कोख की आवाज़

अनुराधा बंसल गुप्ता जयपुर, राजस्थान ******************** आज माँ में तेरी कोख में आयी हूँ देखा है ना तूने मुझे, देख तुझसा ही निर्मल चेहरा लिए आयी हूँ माँ आज तूने छुआ मुझे तेरे इस चूँभन में संसार की हर ख़ुशी के बड़कर सुख पाया हैं मेने.. इस संसार का दीदार तो किया नहीं फिर भी तुझमें इस संसार को पाया हैं मेने देख माँ आज हाथ बने है कल लकीरें भी जल्द बनेगी फिर मेरे हाथो में तू हमेशा हमेशा संग रहेगी .. माँ तू यू चुप क्यू है बोल ना ये खोफ़नाक आदमी कोन है ?? जो बार तुझे बेबस करके मुझसे दूर ले जाने की कोशिश करता है माँ बनाकर ख़ुद को बेबस नहीं छोड़ेगी न तू मुझे हर पल तो मेरा अटूट अहसास तूने अपनी साँसो में पाया है.... बोल ना मेरी ग़लती है क्या ? क्यू देना चाहता है ये ज़माना सज़ा? तू भी तो इक बेटी है तेरी भी तो इक माँ थी फिर क्यू ये सज़ा मुझे मिली ? क्यू मेरी चीख़ तुझे सुनायी ना दी ? क्यू तू बेबस लाच...
हिमालय से आती आवाज
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हिमालय से आती आवाज

डॉ. पुष्प कुमार राय बांका बिहार ******************** उठो, वीर सैनिकों सुनो, भारत मां की पुकार आज हिमालय से आती आवाज। गौर करो, युद्ध की मानो हो आगाज रखना मां के दूध का लाज हिमालय से आती आवाज। कह दो, वीरों दुश्मनों से बात ये तुम आज इक्कीसवीं सदी का है भारत आज हिमालय से आती आवाज। याद करो, वीरों बासठ का वह चीनी खाज हर भारतीय बदला लेंगे आज हिमालय से आती आवाज। प्रण कर, वीरों तू बारंबार आज लहू से रंगीन हो ना हिम आज हिमालय से आती आवाज। बढ़े चलो मुड़कर देखो पीछे ना आज होगी तेरे सिर पर ही विजयी ताज हिमालय से आती आवाज। उठो वीरों उत्साहित है जननी लाखों आज करने भव्य श्रृंगार तेरी आज हिमालय से आती आवाज। मत भूलो, वीरों शहीदों की भूमि ये विशाल निकल पड़ो तिरंगा लेकर आज हिमालय से आती आवाज। घबराओ मत वीरों हमको है तेरी शौर्य पर नाज फूंक दो पाञ्चजन्य शंख तुम आज हिमालय से आती आवाज। हे वीरों रौंद डालो...
इंतजार
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इंतजार

सुरेखा सुनील दत्त शर्मा बेगम बाग (मेरठ) ********************** मेरे इश्क के समंदर को फिर बेचैन कर गया कोई, ठहरे हुए जज्बात में फिर हलचल कर गया कोई, पत्थर मारा था उठाकर फिर किसी ने समंदर में, मेरे इश्क के शांत समंदर में फिर हिलोरे दे गया कोई। मौत को आकर देखो इस हद तक जी गया कोई, कि जीने से पहले अपने आप को हरसू कर गया कोई, उदास आंखों में फिर समंदर का सैलाब उमड़ा है , मौत से पहले ही लहरों सा आकर समंदर में पैगाम दे गया कोई। आज आंखों को बेइंतहा इंतजार दे गया कोई, आंखों से अश्कों को इस कदर बहता छोड़ गया कोई, क्या समझाऊं दिल को उसके इंतजार की वजह, दिल में उठते तूफान में फिर कसक जगा गया कोई। वक्त के पिंजरे को खोल कर सांसो का परिंदा उड़ा गया कोई, दिल में उठते तूफान को हर पल थाम गया कोई, सिमट जाती है एक-एक करके ख्वाहिशें सारी दिल में, जिंदगी की कशमकश से दूर श्मशान में इंतजार कर रहा है कोई। दर्द बढ़...
योग
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योग

हंसराज गुप्ता जयपुर (राजस्थान) ******************** पतंजली का चित्तवृत्ति निरोध, योगेश्वर कृष्ण का समत्व बोध. नित्य सब लोग, करेंगे योग. होंगे बलवान सुखी नीरोग, युक्ति युक्त सोयें, खेलें खायें, ईश गुण गायें, ना कहीं विरोध... पतंजली का चित्तवृत्ति निरोध, योगेश्वर कृष्ण का समत्व बोध. सत्कर्म, ज्ञान, समर्पित भक्ति, प्राणायाम व्यायाम की शक्ति, प्राकृत न्याय, हों सभी सहाय, करें स्वाध्याय, परमात्मबोध.... पतंजली का चित्तवृत्ति निरोध, योगेश्वर कृष्ण का समत्व बोध. सभी निर्दोष, मन में संतोष, हर हाथ काम, पूरा परितोष. तितिक्षा तप दान, निधि धान विधान, रहे सबका ध्यान, वैश्विक अवबोध... पतंजली का चित्तवृत्ति निरोध, योगेश्वर कृष्ण का समत्व बोध. शुद्ध जल जीवन, पवन उपवन, साफ आकाश, आनन्द हवन. सिंचित सोंधी माटी, आँचल बाल गुलाटी, चमन भवन चौपाटी, हरी हर पौध.... पतंजली का चित्तवृ...
बेरोजगार नवजवान
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बेरोजगार नवजवान

मनोरंजन कुमार श्रीवास्तव बिजनौर, लखनऊ ******************** आती हुई कार से एक नवजवान टकरा गया टांग टूटी, हाथ टूटा फिर भी मुस्कराते देख कार वाला चकरा गया, अस्पताल ले जाने के लिए उसे जैसे ही उठाया नवजवान धीरे से बोला- 'कृपया' मुझे अस्पताल ना ले जाईये दुर्घटना से विकलांग हो गया तो मेरी भी तकदीर खुल सकती है, सालो की बेरोजगारी से आरक्षण की बीमारी से मुझे भी आजादी मिल सकती है नौकरी नहीं अब कम-से-कम भीख तो मिल सकती है। . परिचय :-  मनोरंजन कुमार श्रीवास्तव निवासी : बिजनौर, लखनऊ, उत्तर प्रदेश प्रमाणित किया जाता है कि रचना पूर्णतः मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, हिंदी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, हिंदी में टाईप...
नैनो में
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नैनो में

आशीष कुमार पाण्डेय कानपुर उत्तर प्रदेश ******************** वो पलकों को छपकते ही, आँखों में बस जाती है। जब थाल में दिये लेकर, वों घर के बाहर आती है, उसके सौन्दर्य का, क्या वर्णन करू मै, वो हँसी खाव्ब सी लगती है, कभी-कभी तो वो मुझको, किसी कवि की कल्पना लगती है, वो जुल्फो का गालो पर आना, फिर हाथो से उसे हटाना, मेरा हैप्पी दीवाली, उसका सेम टू यू कह कर जाना, उसे देखने के लिए, बहार बैठे गुनगुनाना, उसका मुझको देख कार हसना, मेरा उसको बार-बार तकना, वो रोज मेरे गली से ही जाती है, वो पलकों को छपकते ही, आँखों में बस जाती है परिचय :-  आशीष कुमार पाण्डेय निवासी : कानपुर उत्तर प्रदेश प्रमाणित किया जाता है कि रचना पूर्णतः मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, हिंदी रक्षक मंच पर अपनी कव...
चांदी का गांव, सोने की सड़क
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चांदी का गांव, सोने की सड़क

लाल बच्चन पासवान, करचौलिया, मुजफ्फरपुर ******************** चांदी का गांव, सोने की सड़क, चलेगा मनुज अकेला बेधड़क। नदी को नापा बना लिया पुल लकड़ी लोहा पत्थर का पुल, धूम्रगाड़ी पर चढ़ नाव गया भूल तीव्र चाल से ठहराव गया भूल, मंजिल से पूर्व खाई देख अकबक। पड़ोसी से ज्यादा परदेशी साथी जानवर होते थे जीवन का साथी, मुर्गा कुत्ता गदहा घोड़ा ऊंट हाथी हाथी मेरा साथी या साथी मेरा हाथी, सबको भगाकर घर किया चकाचक। बारूद भरी दुनिया में बारूद खायेगा जिसे जन्तु नकारे, वो खुद खायेगा, शेष जीव भगाकर चैन कहां पायेगा जैसा करेगा, वैसा ही पायेगा, स्वर्ग-सी धरती बनेगी नरक। परिचय :-  लाल बच्चन पासवान, शिक्षक सम्प्रति : शिक्षक निवासी : करचौलिया, मीनापुर, मुजफ्फरपुर प्रमाणित किया जाता है कि रचना पूर्णतः मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक मंच पर अपने प...
पकरे कान आज से
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पकरे कान आज से

प्रेम प्रकाश चौबे "प्रेम" विदिशा म.प्र. ******************** भइया, पकरे कान आज से। दूरई अच्छे जा समाज से। जीबो नइं मरबोई तै है, "बिस पानी" और "जहर नाज" से। सत्तर बरस गए, पै अब भी, दूरी बई की बई, सुराज से। बड़े सेठ जे सांची मानो, पल रए "हमरे खून" ब्याज से। "प्रेम" रोज की चें चें, किल किल, भले अकेले जा लिहाज से। . परिचय :-  प्रेम प्रकाश चौबे साहित्यिक उपनाम - "प्रेम" पिता का नाम - स्व. श्री बृज भूषण चौबे जन्म -  ४ अक्टूबर १९६४ जन्म स्थान - कुरवाई जिला विदिशा म.प्र. शिक्षा - एम.ए. (संस्कृत) बी.यु., भोपाल प्रकाशित पुस्तकें - १ - "पूछा बिटिया ने" आस्था प्रकाशन, भोपाल  २ - "ढाई आखर प्रेम के" रजनी  प्रकाशन, दिल्ली से अन्य प्रकाशन - अक्षर शिल्पी, झुनझुना, समग्र दृष्टि, बुंदेली बसन्त, अभिनव प्रयास, समाज कल्याण व मकरन्द आदि अनेक  पाक्षिक, मासिक, त्रैमासिक पत्रिका...
इंकलाब जिंदाबाद…
कविता

इंकलाब जिंदाबाद…

बिपिन कुमार चौधरी कटिहार, (बिहार) ******************** संप्रभुता का आया गंभीर संकट, उचित नहीं राजनीतिक नाटक, मां भारती कर रही पुकार, विश्वासघाती चीनियों का हो संहार, नेपाल सिर्फ एक मोहरा है, षड्यंत्र बहुत ही गहरा है, बेशक सीमा पर वीर जवानों का पहरा है, देश के अंदर कुछ चेहरों पर कई चेहरा है, बासठ का ज़ख्म हमें भूलना नहीं चाहिए, वाजपेईजी के जिम्मेदार विपक्ष का अनुकरण करना चाहिए, राजनीतिक प्रतिद्वंदिता चलती रहेगी, हमारी एकता और राष्ट्र की अखंडता अक्षुण्ण रहना चाहिए, देश के कोने कोने से आ रही एक आवाज, बता दो दुश्मनों को उसकी औकाद, हर धर्म से ऊपर हमारा राष्ट्रवाद, आओ सब मिलकर बोलें, इंकलाब जिंदाबाद... . परिचय :- बिपिन कुमार चौधरी (शिक्षक) निवासी : कटिहार, बिहार आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, हिंदी रक्ष...
क्या करें हम
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क्या करें हम

डॉ. कामता नाथ सिंह बेवल, रायबरेली ******************** दहकती है पीर की ज्वाला यहां हर दम, बताओ क्या करें हम।। सर्जना के पंख पर उड़ते मकानों की खिड़कियों से झांकते सपने सयाने, किन्तु कुत्सित मानसिकता के अंधेरों की स्याह परछाईं लगी उनको डराने; चीरते हैं तीर अपने तरकशों के दिल, बताओ क्या करें हम? दहकती है पीर की ज्वाला यहां हर दम बताओ क्या करें हम।। सर्व नाशी सोच की हठ जम गई जैसे- पत्थरों पर काइयों की मूक परतें, आत्महत्या के लिए तैयार बैठी हैं पीढ़ियों की ज़िद लिए दो टूक शर्तें; जब धड़कता ही नहीं सीने में इनके दिल, बताओ क्या करें हम। दहकती है पीर की ज्वाला यहां हर दम, बताओ क्या करें हम।। किस तरह जीना हमें है, कौन करता है प्यार, इतना जानवर भी जानते हैं, आस्तीनों के मगर ये सांप पी कर दूध, सिर्फ डसना और डसना जानते हैं; तोड़कर बिषदन्त इनके सिर कुचलने के अलावा फिर, बताओ क्या करें हम...
हाँ मैं भी अब लिखने लगी
कविता

हाँ मैं भी अब लिखने लगी

रश्मि श्रीवास्तव “सुकून” पदमनाभपुर दुर्ग (छत्तीसगढ़) ******************** मैं गुमसुम सी धीर गंभीर सी उन्मुक्त होकर खुलने लगी मुख्यधारा से अब जुडने लगी हाँ मैं भी अब लिखने लगी। कहीं डर और शंका मन में लिए कहीं हीन भावना से जकड़े हुए खुद को बेहतरीन कहने लगी हाँ मैं भी अब लिखने लगी। जिंदगी के कुछ पहलू थे अनछूए कुछ सवाल ऐसे थे अनसुलझे उन सवालों में ही हल ढूँढने लगी हाँ मैं भी अब लिखने लगी। दर्द ऐसा किसी से कहा ना गया कहीं चुप रह गई कहीं कराया गया अब हाल-ए-दिल अपना कहने लगी हाँ मैं भी अब लिखने लगी। जंजीरों ने पाँव जकड़ रखे थे हर कदम पर सवाल खड़े कर रखे थे अब कदम दर कदम मैं बढ़ने लगी हाँ मैं भी अब लिखने लगी। कभी दौर ऐसा भी आया था जहां खुद को मैंने अकेला पाया था अब हौसलों के कारवां बनाने लगी हाँ मैं भी अब लिखने लगी। बिना गलतियों के सज़ा पायी है जमानत मुझे रब ने दिलाई है अब इंसाफ के लिये लड़ने लगी हाँ म...
क्या ज़माना आ गया है
कविता

क्या ज़माना आ गया है

दामोदर विरमाल महू - इंदौर (मध्यप्रदेश) ******************** शकल भले ही अच्छी न हो उनकी, सेल्फी लेकर मन को खुश करते है वो। कोई देखे न देखे उन्हें प्यार की नज़रों से, एक तरफा ही अजीब प्यार करते है वो। अगर पूछ लिया उनसे की चाहते क्या हो? फिर तो इज़हार करने से भी डरते है वो। आग लगी रहती है, शोले भड़कते रहते है, अपनी होते हुए भी दूसरी पे मरते है वो। कई दिलजले है इस जमाने मे यारों, बुढ़ापे में भी जवानी का दम भरते है वो। जो बने फिरते है ज़माने में खड़कसिंह, घर मे ही अपनी बीवी से डरते है वो। क्या ज़माना आ गया है ये क्या हो रहा है? गुनाह करते है और फिर मुकरते है वो। . परिचय :- ३१ वर्षीय दामोदर विरमाल पचोर जिला राजगढ़ के निवासी होकर इंदौर में निवास करते है। मध्यप्रदेश में ख्याति प्राप्त हिंदी साहित्य के कवि स्वर्गीय डॉ. श्री बद्रीप्रसाद जी विरमाल इनके नानाजी थे। हिंदी रक्षक मंच इंदौर (hindiraks...
आंगन में उठता अशोक
कविता

आंगन में उठता अशोक

सतीश राठी इंदौर मध्य प्रदेश ********** आंगन में उठता अशोक नहीं कर पाता है जीवन को शोक मुक्त आते रहते हैं सुख और दुख के बादल कभी बरसने के लिए कभी  तपाने के लिए रोप देता है अपने आंगन में जाने कब उम्मीदों के बीज, पिता उगती हुई हरियाली के बीच भागता हुआ पिता लेने लगता है सेवानिवृत्त होने के बाद सुकून की सांस सोती रहती है जब सारी दुनिया जीवन जागता रहता है तब भी और धड़कता है शायद आसपास के पेड़ पौधों में या फुदकती हुई गिलहरी में कभी किसी की आंखों में भी चमकता है जीवन आंखें  मूंदने के बाद किसे याद रहती है चले जाने वाले पिता की सृजन छाया। परिचय :-  सतीश राठी जन्म : २३ फरवरी १९५६ इंदौर शिक्षा : एम काम, एल.एल.बी लेखन : लघुकथा, कविता, हाइकु, तांका, व्यंग्य, कहानी, निबंध आदि विधाओं में समान रूप से निरंतर लेखन। देशभर की विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में सतत प्रकाशन। सम्पादन : क्षितिज संस्था इंदौर के लिए...
जनक
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जनक

वैष्णो खत्री 'वेदिका' अधारताल, जबलपुर (म.प्र.) ******************** जन्म लिया जब धरा पे तुमने, जननी ने जग दिखलाया। ऊँगली थाम नेह से तुमको, जनक ने चलना सिखाया। वे भूखे पेट सोए होंगे, पेट तुम्हारा भरने को। रात-रात भर जागे होंगे, सपने पूरे करने को। देव तुल्य हैं चरणों में उनके, सचमुच स्वर्ग समाया। ऊँगली थाम नेह से, तुमको जनक ने चलना सिखलाया। कड़वे शब्दों के न करना, दिल पर उनके वार कभी। और न करना जीवन में है, उन पर अत्याचार कभी। क्योंकि वे तो सदा चाहते, सुखी रहे उनका जाया। ऊँगली थाम नेह से, तुमको जनक ने चलना सिखलाया। यदि बन श्रवण उनकी की सेवा तुम कर जाओगे। ईश्वर की भी कृपा रहेगी, सुखमय जीवन पाओगे। रही सदा है मात-पिता की, शुभ आशीषों की छाया। ऊँगली थाम नेह से, तुमको जनक ने चलना सिखलाया। बड़े हुए तो शुभ विवाह के, बन्धन में बन्ध जाओगे। कुछ वर्षों में तुम भी तो है, जननी-जनक कहलाओगे। ...
सफ़र
कविता

सफ़र

अमरीश कुमार उपाध्याय रीवा म.प्र. ******************** जो मकान किराए के है, दरो दरख़्त की परवाह नही करते, समंदर से भी गहरी दीवारें है, एक जैसी नहीं रहती, नदियों सा अपना लेते है किनारों को, ऐसे मकान दिलो पर राज करते है, बना किराए का मकान, हम सफ़र साथ नहीं रखते, घरोदा भी नहीं बनते, वो जमीन पर निगाह नहीं रखते, हौसलों की उड़ान कम नहीं रखते, वे बेपरवाह पंछी है, बादलों के नीचे उड़ान नहीं करते, जो मकान किराए के है, दरो दरख़्त की परवाह नही करते......। . परिचय :- अमरीश कुमार उपाध्याय निवासी - रीवा म.प्र. पिता - श्री सुरेन्द्र प्रसाद उपाध्याय माता - श्रीमती चंद्रशीला उपाध्याय शिक्षा - एम. ए. हिंदी साहित्य, डी. सी. ए. कम्प्यूटर, पी.एच. डी. अध्ययनरत आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, हिंदी रक्षक मंच पर...
मेरी मां
कविता

मेरी मां

मनीषा शर्मा इंदौर म.प्र. ******************** बदल देती सारे बिगड़े हालात है मेरी मां थोड़ी सीधी साधी थोड़ी चालाक है मेरी मां रखती है हिसाब किताब घर का वह सारा पर भूल जाती है गिनती जब रोटी परोसती है मेरी मां थोड़ी सीधी-साधी थोड़ी चालाक है मेरी मां डांटती है खूब झगड़ती भी है मुझसे पर रूठ जाऊं तो मनाती प्यार से है मेरी मां थोड़ी सीधी-साधी थोड़ी चालाक है मेरी मां चाहक उठता है घर का हर एक कोना जब चूड़ी पायल छनकाती है मेरी मां थोड़ी सीधी-साधी थोड़ी चालाक है मेरी मां बिन उसके बेजान है सारा घर परिवार मेरे इस छोटे से घर की जान है मेरी मां थोड़ी सीधी-साधी थोड़ी चालाक है मेरी मां अस्त व्यस्त है साड़ी और बिखरे से है बाल फिर भी दुनिया में सबसे खूबसूरत है मेरी मां थोड़ी सीधी-साधी थोड़ी चालाक है मेरी मां अन्न के दाने दाने में स्वाद भर देती कभी दुर्गा तो कभी अन्नपूर्णा बन जाती है मेरी मां थो...
तर्क वितर्क
कविता

तर्क वितर्क

विमल राव भोपाल म.प्र ******************** सूचनाओं के अभावो का प्रभाव देखिए। मूर्खता के तर्क का स्वर्णिम सुझाव देखिए॥ ना कोई प्रत्यक्ष हैं और ना कोई प्रमाण हैं। पर अड़ीग हैं आत्म मत पर, हौसले तों देखिए॥ वेद अध्यन और शिक्षा का अभाव हैं जहाँ। बांटते हैं ज्ञान सबकों, दुर्दशाएँ देखिए॥ पद प्रतिष्ठा के लिये, परिवार कों ले संग में। धेर्य खोते निर्बलों की, मंद बुद्धि देखिए॥ देखिए उनका समन्वय, तोड़ता हैं कांरवा। और अपना ध्येय खोता, लक्ष्य भी तों देखिए॥ रुष्ट होते बाल हट से, ये बड़ी विडम्बना हैं। उम्र का अनुभव नही हैं, याचनाये देखिए॥ स्वप्न हैं सम्मान का, तों योग्यता भी चाहिये। पर विषय भटका रहें हैं, संगती तों देखिए॥ . परिचय :- विमल राव "भोपाल" पिता - श्री प्रेमनारायण राव लेखक, एवं संगीतकार हैं इन्ही से प्रेरणा लेकर लिखना प्रारम्भ किया। निवास - भोजपाल की नगरी (भोपाल म.प्र) कवि, लेखक, सामाजिक ...