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कविता

प्यासा परिंदा
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प्यासा परिंदा

सौरभ समर महराजगंज (उत्तर प्रदेश) ******************** यह सोच भटका हुआ मंजिल परख जायगा कही ना कहीं तो हर सड़क जायगा सबको पता है उसका ठिकाना घोसला ही होगा परिंदा आसमा छूते छूते जब थक जायगा चिंगारी दरकार नही मोहब्बत ए आतिश को महज एक दीदार से ये शोला भड़क जायगा बेअदब है ये लोग नजरे नही झुकायेंगे बदन से जो दुप्पटा सरक जायगा किसी बेघर को घर मे सुलाकर कर के देखो घर का कोना कोना महक जायगा और छज्जे पर रख देना आब का प्याला कोई प्यासा परिंदा चहक जायगा परिचय :- सौरभ समर निवासी : महराजगंज (उत्तर प्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीयहिंदी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवान...
अफवाह
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अफवाह

अमोघ अग्रवाल गढ़ाकोटा, सागर (मध्य प्रदेश) ******************** कान जो सदा घिरे होते थे सुंदर-सुंदर बालियों से, झुमकों से। काली-काली, घनी-घनी, लटों से, घटाओं से, छुपे होते थे। आज वह, इस तरह घिरे हैं, अफवाहों से, कि बोल उठते हैं, चीख़ उठते है, मुझे फट जाने हो, कट कर कहीं, गिर जाने दो... परिचय :- अमोघ अग्रवाल साहित्यिक नाम : "इंतज़ार" पिता : स्व. बी. के. अग्रवाल माता : श्रीमती आशा अग्रवाल जन्म : ०५ सितंबर १९९१ निवासी : गढ़ाकोटा, सागर (मध्य प्रदेश) शिक्षा : बी.ई. कार्यरत : निजी व्यवसाय लेखन : शांत, करुण, श्रृंगार रस, कविता, कहानी, हाइकू, टांका और अन्य सम्मान : "शतकवीर" सम्मान, "काव्य कृष्ण" सम्मान, निरंतर १२ घंटे काव्य में सम्मान, राष्ट्र कवि गुरु सत्त नारायण सत्तन जी द्वारा दो बार सम्मानित। रंजनकलश इंदौर ईकाई मीडिया प्रभारी, कई पत्र पत्रिकाओं में रचना प्रकाशित।...
तुम्ही बताओ
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तुम्ही बताओ

आशीष तिवारी "निर्मल" रीवा मध्यप्रदेश ******************** उसकी बंदिश में कब तक रहता तुम्ही बताओ, मैं उसके जुल्म कब तक सहता तुम्ही बताओ! जहर पीता रहा मैं अब तक खामोशी से यारों, आखिर कब तक कुछ ना कहता तुम्ही बताओ! जो छलती रही सदा अपना कह-कह के मुझको, मैं एक बार उसको क्यों ना छलता तुम्ही बताओ! मेरी उन्नति से भी वो जलती रही अंदर ही अंदर, फिर मैं ही उससे क्यों ना जलता तुम्ही बताओ! सफर में साथ छोड़ के वो बदल दी हमसफ़र, अपने वादों से मैं क्यों ना बदलता तुम्ही बताओ! गुजर गया अनमोल समय बेमतलब के रिश्ते में, बर्बाद हुआ समय क्यों ना खलता तुम्ही बताओ! परिचय :- आशीष तिवारी निर्मल का जन्म मध्य प्रदेश के रीवा जिले के लालगांव कस्बे में सितंबर १९९० में हुआ। बचपन से ही ठहाके लगवा देने की सरल शैली व हिंदी और लोकभाषा बघेली पर लेखन करने की प्रबल इच्छाशक्ति ने आपको अल्प समय में ही कवि सम्मेलन मंच, आकाशव...
बीत गये कितने दिन
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बीत गये कितने दिन

डॉ. कामता नाथ सिंह बेवल, रायबरेली ******************** बीत गये जाने कितने दिन, बिन खुद से बतियाये बोले।। मन में कुछ आना, कुछ कहना, फिर अपने में दहते रहना, वृश्चिक-दंश कभी अपनों, अपने जैसों का सहते रहना, रोम-रोम रिस-रिसकर सबके जीवन में अमृतरस घोले।। बीत गये जाने कितने दिन, बिन खुद से बतियाये, बोले ।। एक पांखुरी खिलने से झरने तक कितनों को क्या देती, कितने पुण्य बांटती फिरती है संगम की पावन रेती, गुणा गणित या जोड़ घटाना फ़ुरसत कहां कि नापे तोले।। बीत गये जाने कितने दिन, बिन खुद से बतियाये, बोले।। जब-तब नेह भरी आंखों से, कितने सपने झर जाते हैं, जिम्मेदारी की लू से अंखुवाये सपने मर जाते हैं, बिना समय की मर्जी कब अपनी मर्जी से हीले डोले।। बीत गये जाने कितने दिन, बिन खुद से बतियाये, बोले।। परिचय :- डॉ. कामता नाथ सिंह पिता : स्व. दुर्गा बख़्श सिंह निवासी : बेवल, रायबरेली घोषणा पत्...
तिरस्कार से आहत मन
कविता

तिरस्कार से आहत मन

विवेक रंजन 'विवेक' रीवा (म.प्र.) ******************** तिरस्कार से आहत मन तो, कुंठा की हर चोट छिपाता। पर मैं विचारों की नदी के, पार जाकर लौट आता। तब सदा अनुभूत शांति, क्रोध की ज्वाला दबाती। पछतावे के आंसुओं का, बोझ मन पर लाद जाती। नीरवता फिर रात ढले ही, बात किया करती सांसों से। सुनती है, कुछ भी न बोलती, अंतर्मन रह रह कर टटोलती। बुद्धि का अवरोध हटाकर हौले हौले मन भीतर जाता। पर चकराता देख नज़ारा, बड़े मज़े में खुद को पाता। द्वेष दम्भ के, अहंकार के, सभी मुखौटे पड़े धरा पर। लोभ, लालच के प्रपंच भी, हैं खड़े सिर को नवा कर। निर्मल शीतल नीर झील का, मन पर ऐसा असर दिखाता। ईर्ष्या, द्वेष सभी बह जाते, छल प्रपंच भी नज़र न आता। बुद्धि का अहम ही हमें सताता, मतिभ्रम से मन को उलझाता। कलुषित कुछ ना भीतर पाकर, सब खेल समझ मन ऊपर आता। बुद्धि का कोई उपक्रम अब, जब भी मन में शोक जगाता। मैं फिर विचारों की नदी के पार ज...
यह कैसा संभाषण
कविता

यह कैसा संभाषण

रमेशचंद्र शर्मा इंदौर मध्य प्रदेश ******************** यह कैसा संभाषण है ! प्रायोजित अभिभाषण है !.. यह ज्ञान ध्यान सब भूले हैं, दंभ अज्ञान में फूले हैं, मंत्रणा दुखदायक हैं, यंत्रणा भय कारक हैं, पूर्वाग्रही दुःशासन है !... यह अपनों पर आघाती हैं, सपनों पर प्रतिघाती हैं, पीठ पर वार किए हैं, हाथों पर हार लिए हैं, भीतर घाती विभीषण हैं !... यह शतरंज बिछात बिछाते हैं, प्यादे जाल लगाते हैं, शह मात का खेला है, मंत्री संत्री का रेला है, यह कैसा शीर्षासन है !.... यह राजनीति का मेला है, छल नीति का खेला है, देश हित को दूर किया है, स्वहित का साथ दिया है, कहने का अनुशासन है !... यह लूट तंत्र हावी है, भ्रष्ट तंत्र प्रभावी है, प्रजातंत्र की खिल्ली है, खंभा नोचें बिल्ली है, यह कैसा सुशासन है !... यह परिचय : रमेशचंद्र शर्मा निवासी : इंदौर मध्य प्रदेश घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि मेरी यह रचना स्...
जाने क्यों
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जाने क्यों

रुचिता नीमा इंदौर म.प्र. ******************** जाने क्यों ऐसे हो रहे है लोग जाने क्यों ऐसे हो रहे है लोग कि समझना ही नहीं चाहते खुद को, या फिर बन्द कर लेते है आंखों को देखकर भी नादान बने रहते है आजकल लोग जाने क्यों ऐसे हो रहे....? कोई गलत कर रहा, उसे करने दो.... कभी मन्दिर के नाम पर, कभी मस्जिद के नाम पर, बेवज़ह मुद्दों को खींचकर, बस अपनी रोटी सेंक रहे है लोग न धर्म बच रहा, न ईमान बच रहा.... अब तो ऐसा लग रहा कि कहा इंसान बच रहा....? बिक रहे बाजार में जानवर भी, इंसान भी और ईमान तो बहुत सस्ता बिक रहा.... जाने क्यों ऐसे हो रहे है लोग....? यहाँ हर चीज की बोली लग रही.... शरीर का हर अंग तक अब बिक रहा.... लेकिन फिर भी जीवन का मोल खो गया, जो छोटी छोटी बातों पर जान गवाने लग गए है लोग.... जाने क्यों ऐसे हो रहे है लोग....? क्या इनकी तन्द्रा भी कभी टूटेगी, या ये जिंदगी फिर ऐसे ही छूटेगी। इनका जाग...
संकल्प
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संकल्प

संजय वर्मा "दॄष्टि" मनावर (धार) ******************** अंग्रेजी के शब्दों से हो रहा हिंदी के इंद्रधनुष के साहित्य शाला का रंग फीका। मानव देख रहा धुंधलाई आँखों से और व्यथित मन सोच रहा लिखने, पढ़ने में क्यों? बढ़ने लगे हिंदी में अंग्रेजी के मिलावट के खेमे। शायद, मिलावट के प्रदूषण ने हिंदी को बंधक बना रखा हो। तभी तो हिंदी सिसक-सिसक कर हिंदी शब्दों की जगह गिराने लगी लिखने, पढ़ने ,बोलने में तेजाबी अंग्रेजी आँसू। साहित्य से उत्पन्न मानव अभिलाषा मर चुकी अंग्रेजी के वायरस से। कुछ बची वो स्वच्छ ओंस सी बैठी हिंदी विद्वानो की जुबां पर। सोच रही है आने वाले कल का हिंदी लिखने, पढ़ने, बोलने से ही तो कल है हिंदी से ही मीठी जुबां का हर एक पल है। संकल्प लेना होगा हिंदी लिखने, पढ़ने,बोलने का आज हिंदी को बचाने का होगा ये ही एक राज। परिचय :- संजय वर्मा "दॄष्टि" पिता :- श्री शांतीलालजी वर्मा जन्म तिथि :- २ मई १९...
वह तपता सूरज ही मेरी छाव
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वह तपता सूरज ही मेरी छाव

दीपक अनंत राव "अंशुमान" केरला ******************** वह पसीना नमकीन बहा दिया जनम भर, मीठी बन गई हैं जिन्दगी हमारी, जिनके नाम पर है सफर और मंज़र, हे परम पिता तू ही मेरी पूजा है। युग युगों से चलती है, प्यार कोख का और सुरक्षा पितर का इस धरा में जागते-गूँजते महिमा अपार, वह ही ये स्थूल सूक्ष्म का, हे परम पिता तेरी भुजाओं का बल धरती पर आँचल की प्यार भरी एक कहानी, तपते सूरज की प्रज्वलित महिमा की एक कहानी गोदी से प्यार और कंन्धे से ताकत मज़बूत, लेकर चलती रहती यह समाज निरंतर, हे परम पिता तू ही मेरे दिखावनहार मैं एक कवि हूँ, बेटा हूँ तुम्हारी छाव में खड़ा हूँ, प्यार में पला हूँ हिमवन में बैठ दुनिया को मज़बूत मन से निहारता हूँ, सामना करता हूँ, जीत रहा हूँ, हे परम पिता मैं हूँ सदा तुम्हारा परिच्छेद परिचय :- दीपक अनंत राव अंशुमान निवासी : करेला घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि म...
तीज
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तीज

होशियार सिंह यादव महेंद्रगढ़ हरियाणा ******************** सावन शुक्ल तृतीया, कहाए पर्व तीज, हरियाली चहुं ओर, टिड्डे जाते हैं रीझ, पूरे देश में पर्व मनाते, परंपरा है पुरानी, शिव पार्वती की पूजा, सुनते हैं कहानी। सावन के झूले पड़े, मन में उठे हिलौर, झूला देती सखियां, छुप हुआ चितचोर, सावन की घटा छाई, नाचे मन का मोर, पानी लेने चल पड़े, बिजली चमके घोर। हरियाली तीज आई, मिलती मिठाई घेवर, आपस में बात करते, भाभी संग में देवर, बतासों का उपहार, आये बेटी के ससुराल, नई नवेली दुल्हन के, मन में एक सवाल। दादुर सुर में गा रहे, टिड्डे छेड़े राग मल्हार, साजन सजनी तरस रहे, ऑँखों में है प्यार, एक साथ पड़ रही, नभ से बूंद कई हजार, चकवा चकवी ताक रहे, अब डूबेंगे प्यार। विरह में डूबी हुई, एक नवेली झूला झूले, सोच रही क्या बात हुई, साजन हमको भूले, आये ना यह विरह की रात, करती है बेचैन, जब विदेश से साजन आये, तब ...
हरियाली तीज
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हरियाली तीज

विमल राव भोपाल म.प्र ******************** गिरिराज किशोरी पुत्री नें शिवनाथ सो ब्याह रचावन कों हरियाली सो श्रृंगार रच्यों हरियाली तीज मनावन कों सब सखियन संग श्रृंगार कियो श्रावण कों मास सज्यो झूला हरियाली तीज करों री सखी शिव पार्वती कों मिल्यो दूल्हा हिल मिल सखियन संग गाऊँगी श्रद्धा सो तीज मनाऊँगी बन पार्वती मैं भोले की भस्मी मैं आज रमाऊँगी परिचय :- विमल राव "भोपाल" पिता - श्री प्रेमनारायण राव लेखक, एवं संगीतकार हैं इन्ही से प्रेरणा लेकर लिखना प्रारम्भ किया। निवास - भोजपाल की नगरी (भोपाल म.प्र) विशेष : कवि, लेखक, सामाजिक कार्यकर्ता एवं प्रदेश सचिव - अ.भा.वंशावली संरक्षण एवं संवर्द्धन संस्थान म.प्र, रचनाएँ : हम हिन्दुस्तानी, नई दुनिया, पत्रिका, नवभारत देवभूमि, दिन प्रतिदिन, विजय दर्पण टाईम, मयूर सम्वाद, दैनिक सत्ता सुधार में आए दिन लेख एवं रचनाएँ प्रकाशित होती रहती हैं। घोषणा पत्र : म...
राखी अब आने वाला है
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राखी अब आने वाला है

विशाल कुमार महतो राजापुर (गोपालगंज) ******************** बंधेगा अब रिश्तों डोर, गलियों में भी होगा शोर, भाई-बहन में होगी खुशियां, चारो ओर चारो ओर हर भाई-बहन के चेहरों पे खुशियों को लाने वाला है, धागे में सिमटे स्नेह प्यार भईया को जताने वाला है , सुन भाई मेरे, सुन भाई मेरे अब राखी आने वाला है। अब राखी आने वाला है। कभी गुस्सा कभी प्यार, कभी भईया की बुराई करें। कभी झगड़ा, कभी लड़ाई करें फिर भी बहना कि रक्षा भाई करें। इस धागे में प्यार अपार है, ये बात बताने वाला है सुन भाई मेरे, सुन भाई मेरे अब राखी आने वाला है। अब राखी आने वाला है। माथे पर तिलक लगायेगी, भईया को मिठाई खिलायेगी। जब राखी कलाई में बांधेगी, फिर उपहार भईया से मांगेगी। राखी का फर्ज भी प्यारा भईया भी निभाने वाला है, सुन भाई मेरे, सुन भाई मेरे अब राखी आने वाला है। अब राखी आने वाला है। परिचय :- विशाल कुमार महतो निवासी : राजापुर (...
ऐ युवा हिन्दूस्तान सुनों
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ऐ युवा हिन्दूस्तान सुनों

मंगलेश सोनी मनावर जिला धार (मध्यप्रदेश) ********************** हम ना भूलेंगे देश के वीरों का बलिदान सुनों। उठो, जागो, कमर कसो, ऐ युवा हिन्दूस्तान सुनों।। शत्रु चढ़ आया सरहद पर, देश की आन ना जाने पाए, जान भी जाये पर सम्मान न जाने पाए। डटे रहना, सीना तानें, मेरे वीर जवान सुनों, उठो, जागो, कमर कसो, ऐ युवा हिन्दूस्तान सुनों।। कहां हो देश का दुश्मन हमें ललकार रहा, कभी गलवान, कभी डोकलाम में फुंफकार रहा। देश की सेना के बाहुबल और पुरुषार्थ सुनों, उठो, जागो, कमर कसो, ऐ युवा हिन्दूस्तान सुनों।। विश्व ने माना वीर प्रसूता भारती के फौलादी इरादों को, मौन किया हमने, पराक्रम से, रणभेरी व शंखनादों को। हे अर्जुन के गांडीव और अभिमन्यु के बाण सुनों, उठो, जागो, कमर कसो, ऐ युवा हिन्दूस्तान सुनों।। परिचय :-  मंगलेश सोनी युवा लेखक व स्वतंत्र टिप्पणीकार निवासी : मनावर जिला धार (मध्यप्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्...
मेरा मन – नीला आकाश
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मेरा मन – नीला आकाश

सोनल पंजवानी इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** आसमान की मुट्ठी से इक नीला सा सच निकला जो कहता था तुम चलो ना चलो पर रहोगे साथ ही मेरे ख़्वाबों और खयालों में यूँ पलोगे साथ ही एक तपिश से झूझता हर सच कुछ न कर पाया और मन की ओस ने तुम्हे समेट लिया दिल ने सराबोर कर दिया इक मीठी याद से अब तुम ही कहो कैसे जा पाओगे इस मन आँगन से कि तुलसी की क्यारी और आँगन की सौंधी मिट्टी तक में तुम्हारी जड़ें सिमटी हुई हैं। परिचय :- सोनल पंजवानी शिक्षा : एम. कॉम, इंटीरियर डिजाइनिंग जन्म : २९ जून निवास : निपानिया, इंदौर (म. प्र.) व्यवसाय : इंटीरियर डिजाइनिंग रूचि : साहित्य पठन, चित्रकारी, म्यूरल, पेंटिंग्स, संगीत इत्यादि सम्मान : इतिहास एवम् पुरातत्व शोध संस्थान, बालाघाट की ओर से 'कुल भूषण श्री' अलंकार से सम्मानित, इतिहास एवम् पुरातत्व शोध संस्थान, बालाघाट की ओर से 'हिन्द केसरी श्री' अलंकार से सम्मानि...
गुरु की शिक्षा
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गुरु की शिक्षा

राज कुमार साव पूर्व बर्धमान (पश्चिम बंगाल) ******************** गुरु वही है........... जो हमें जीने का मार्ग दिखाएं, अच्छे- बुरे की पहेचान करवाएं, हमारे जीवन को गतिमान बनाएं, हर कठिन सवालों का सरलता पूर्वक हल करवाएं, संसार में फैले हुए कुरीतियों से हमें बचाएं, हमें समय के महत्व को बताएं, समाज में हमें जीने योग्य बनाएं हमारे जीवन में आने वाली हर संकट से निपटने का सही मार्ग दिखाएं, जाति- धर्म का पाठ पढ़ाए, हमें कर्तव्यर्निष्ठ बनाएं, हमारा भविष्य बनाएं, हमें समाज में शिक्षित बनाएं।। परिचय :- राज कुमार साव निवासी : पूर्व बर्धमान पश्चिम बंगाल घोषणा पत्र : प्रमाणित किया जाता है कि रचना पूर्णतः मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, हिंदी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने ह...
शिक्षक की पुकार
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शिक्षक की पुकार

डॉ. राजेश कुमार मौर्य मधुबनी ******************** विद्यार्थी हैं देश के भविष्यनिधि। शिक्षकगण भी हैं एक कस्तूरी। अच्छे भविष्यनिधि का करना है यदि निर्माण। सच्चे मन से रखना होगा हमको इनका अभी ध्यान। इनसे ही होगा राष्ट्र की पहचान यही होंगे निर्माता और बनेंगे कर्णधार। इस मुसीबत से इन सब को बचाना है। घर से बाहर बहुत जरूरी होने पर ही बाहर जाना है। प्रत्येक विद्यार्थी-शिक्षक है अनमोल। हल्के में न इसको तौल। इनके जीवन को ना खतरे में डालो। कुछ दिन परीक्षाओं को अभी और टालो। मनोदर्पण का उद्देश्य हो जाएगा साकार। सबके प्रयास से ही होंगे इस मुसीबत से पार। प्रज्ञाता भी देखो आया। ऑन लाइन शिक्षण के नियम बताया। शिक्षक संग मातपिता करेंगे पालन। दुष प्रभाव से बचेंगे अब सभी के लालन। परीक्षायें व अन्य शैक्षणिक कार्य जीवन से है नहीं बड़े। ऐसी इच्छायें न कर दे सबको मौत के द्वार खड़े। इनको ना देना ऐसे ही छोड़। य...
नारी ही है
कविता

नारी ही है

बबली राठौर पृथ्वीपुर टीकमगढ़ (म.प्र.) ******************** कहीं-कहीं त्याग की नारी और मूर्ति महिमा है इसके रूप कई और वो माँ की छाँव ममता है सहनशील रखने वाली खुशलता की प्रतीक है घर परिवार को अपना जीवन देने वाली नारी ही है कहीं दुर्गा तो कहीं काली बनी पूजी जाने वाली भी नारी ही है आज कल तो ये सब एक सपना सा लगने लगा है प्राचीन काल की संस्कृति क्योंकि घिसने लगी है फिर भी इस जमाने में कई औरतें सभ्यता संभाले हैं पहचान, गरिमा को अपना वक्त देने वाली नारी ही है कहीं दुर्गा तो कहीं काली बनी पूजी जाने वाली भी नारी ही है औरत अगर चाहे तो अपने घर को स्वर्ग भी बना देती है मगर ना समझे अपने को, गलत राहें चल नरक जीवन कर लेतीं हैं ना समझी अपना कर अपनी जिन्दगी को खिलौना बनातीं हैं लालच, महत्वकांक्षा को अपना सतित्व खोने वाली नारी है कहीं दुर्गा तो कहीं काली बनी पूजी जाने वाली भी नारी ही है परिचय :- बबली...
कल्पना
कविता

कल्पना

ओमप्रकाश सिंह चंपारण (बिहार) ******************** विरह की अगन बनकर तूम भी बहुत पल जल चुकी हो। अब प्यार की पावस बनकर जरा बरस कर देखो। गीत बनकर पुष्प बन हार बनकर पा चुकी महिमा बहुत सृंगार बनकर। बोलो अब मौन ब्रत तोड़ो मेरे शुष्क हृदय में उतरकर। अपने अधरों में छुपे हास को विखरो कल्पना जन्म जन्मान्तरों के बंधनों से। उन्मुक्त होकर फिर ये अनन्त नाद फिर से भर दो। तुम कालचक्र हो केशव का माया बंधन को छिन्न भिन्न कर दो। पल भर में दिव्य चेतना की अमृत रस ह्रदय पटल में भर दो। शंकर की डमरू बन कर तुमअनन्त नाद भर दो। माँ सरस्वती की विणा बन कर तुम कल्पना अनन्त स्वर भर दो। कल्पना तुम ही तो कवियों की सवामिनी हो। अनन्त राग रागनी हो प्यास और नदिया तुम्ही हो। तुम्ही पाप और पुण्य हो परिचय :- ओमप्रकाश सिंह (शिक्षक मध्य विद्यालय रूपहारा) ग्राम - गंगापीपर जिला - पूर्वी चंपारण (बिहार) सम्मान - राष्ट्रीय हिंदी र...
नारी उत्पीड़न
कविता

नारी उत्पीड़न

रवि कुमार बोकारो, (झारखण्ड) ******************** रो रही हूँ सिसक-सिसक्कर ना पोंछता कोई आँसु है, आँसु की नदियाँ बह चली रोकना भी अब बेकाबू है। नैन निहारे ताक रही है खड़ी घर मे चौखट सहारे, क्यूं होता हे नारी उत्पीड़न? सोंच रही हे नैन सुलाये। माँ चाहिए बहन चाहिए चाहिए प्यारी-सी पत्नी। फिर क्यूं गर्भपात कराते हो? जब गर्भ में बेठी थी बेटी। इनको भी अधिकार चाहिए समाज से थोड़ा प्यार चाहिए, माँ की ममता- बहन का प्यार नारी से है घर संसार। परिचय :- रवि कुमार निवासी - नावाड़ीह, बोकारो, (झारखण्ड) घोषणा पत्र : यह प्रमाणित किया जाता है कि रचना पूर्णतः मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीयहिंदी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, हिंदी में टा...
तब गाँव हमें अपनाता है
कविता

तब गाँव हमें अपनाता है

मुकेश गाडरी घाटी राजसमंद (राजस्थान) ******************** आई विडम्बना ऐसी की दूर गया में गाँव से, कुछ धन कमाने को में चल पड़ा शहर की ओर। प्रदूषण से जब होने लगे घुटन शहर में, गाँव जाना तब मन मेरा करता है ....... तब गाँव हमें जो अपनाता है। शिक्षा ग्रहण के लिए विदेश जो जाते, ना मिले जब संस्कार परिवार के तब जीवन है अधूरा। चौपाटी पर बैठ गप्पे जो मारना मन को बढ़ा भाता, गाँव ना जाकर मन विचलित मेरा हो जाता है ......... तब भी गाँव हमें जो अपनाता है। खेत पर जाकर भूमि पुत्र बन जाना, बीज को मिट्टी में मिला कर सोना उगवाते। चारों तरफ हरियाली देखने को मिल जाती, तकनीक का मंत्र ऐसा आया सब उसमें डूब गए। जन लोग शहर की ओर पलायन कर जाते हैं....... तब भी गाँव हमें जो अपनाता है। परिचय :- मुकेश गाडरी शिक्षा : १२वीं वाणिज्य निवासी : घाटी (राजसमंद) राजस्थान घोषणा पत्र : प्रमाणित किया...
फुटपाथ
कविता

फुटपाथ

धैर्यशील येवले इंदौर (म.प्र.) ******************** देख ले वो जिंदा है या मुर्दा है जो शख्स सोया है फुटपाथ पर कोई रोता है कोई मुस्कुराता है जिंदगी, मौत दोनों है फुटपाथ पर कोई खेल रहा कोई बेच रहा है अमीरगरीब बच्चा है फुटपाथ पर तंग गलियों में जो नही बिकता है सबकुछ बिकता है फुटपाथ पर गांववाले न जाने शहर की बात शहर जीता मरता है फुटपाथ पर बस यही एक बात सुकून देती है नस्लभेद नही होता है फुटपाथ पर। परिचय :- धैर्यशील येवले जन्म : ३१ अगस्त १९६३ शिक्षा : एम कॉम सेवासदन महाविद्याल बुरहानपुर म. प्र. से सम्प्रति : १९८७ बैच के सीधी भर्ती के पुलिस उप निरीक्षक वर्तमान में पुलिस निरीक्षक के पद पर पीटीसी इंदौर में पदस्थ। सम्मान : राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर hindirakshak.com द्वारा हिंदी रक्षक २०२० राष्ट्रीय सम्मान घोषणा पत्र : प्रमाणित किया जाता है कि रचना पूर्णतः मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं,...
हरियाली तीज
कविता

हरियाली तीज

डॉ. भगवान सहाय मीना बाड़ा पदम पुरा, जयपुर, (राजस्थान) ******************** साजन, सावन की सुरंगी आई बहार, कोयल बोले वाणी रस की। अब तो आ गया है तीज का त्योहार, आजाओं मेरी नहीं बस की। सूनी सेज तड़पती तेरे बिन, हे ! ननद के वीर। ससुराल का क्या सुख, मैं जाउंगी अपने पीहर। तेरे वादे झूठे, खिंचे पानी पर लकीर। यह बढ़ते ही जातें, जैसे द्रोपदी का चीर। परसों के दिन आ गये, मेरी सहेली के साजन। उदास हरियाली तीज, तेरे बिन सूना लगें सावन।। परिचय :- डॉ. भगवान सहाय मीना (वरिष्ठ अध्यापक राजस्थान सरकार) निवासी : बाड़ा पदम पुरा, जयपुर, राजस्थान घोषणा पत्र : प्रमाणित किया जाता है कि रचना स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर ...
कितना ख़्याल वो रखता हैं
कविता

कितना ख़्याल वो रखता हैं

निर्मल कुमार पीरिया इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** मेरी हर चीज, सहेज कर रखता हैं, ये ख्याल भी हैं कि, मन मे बसाये रखता हैं... चाहा जब करना बातें, बैठ सामने शीशे वो, मन भर ख़ुद ही से, पहरो गुफ़्तगू करता हैं... मेरा हर ख्याल सहेज कर रखता हैं। मेरा हर लम्हा, सहेज कर रखता हैं, मलमली सी वो यादे भी, दिल मे बसाये रखता हैं... संगी सतरंगी लम्हें को, कभी रुठे,भीगे हर पल को, पलछिन मुस्काते लम्हों संग, तरतीब से वो पिरोता हैं... मेरा हर वक़्त सहेज कर रखता हैं। मेरा हर हिस्सा, सहेज कर रखता हैं, महकी बाहें,बहकी बातें, शरमाती वो मदमाती रातें... अलकों में अटके चाँद का, साँसों में महकी साँस का, रक्त सीप में टके जो मोती, नखशिख,नजरो से सजाता हैं.. मेरा हर रंग रूप सहेज कर रखता हैं। मेरा हर वक़्त सहेज कर रखता हैं। मेरा हर ख्याल सहेज कर रखता हैं। मेरी हर चीज ,सहेज कर रखता हैं... परिचय :- निर्मल कु...
सावन ना बरसा
कविता

सावन ना बरसा

मनीषा शर्मा इंदौर म.प्र. ******************** मेरा ये बावरा मन पिया मिलन को तरसा सखी अब के बरस भी सावन ना बरसा छाते रहे यादों के बादल तो बहुत बादलों को देख मन घड़ी भर हर्षा सखी अब के बरस भी सावन ना बरसा बरस भर किया था सावन का इंतजार पल-पल बीता ऐसे जैसे कोई अरसा सखी अब के बरस भी सावन ना बरसा बीता जाए सावन नाआए बैरी पिया लागे मोहे अब तो कुछ- कुछ डर सा सखी अब के बरस भी सावन ना बरसा बहुत संभाला था मैंने खुद को मगर छलक ही गया दो नैयनन का कलसा सखी अब के बरस भी सावन ना बरसा परिचय :-  मनीषा शर्मा जन्म : २८/८/१९८२ शिक्षा : बी.कॉम., एम. ऐ. लेखन शुरुआत वर्ष : लेखन में रुचि बचपन से है लेखन विधा : कविता ,व्यंग्य ,कहानी समसामयिक लेखन। व्यवसाय : आकाशवाणी केंद्र इंदौर उद्घोषक निवासी : इंदौर म.प्र. घोषणा पत्र : प्रमाणित किया जाता है कि रचना पूर्णतः मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां...
आज का नेता
कविता

आज का नेता

राजेन्द्र यादव सरैंया, नरोसा जनपद- लखनऊ ******************** कुर्सी के ही लिए यहां पर सब हथकंडे होते हैं। नारेबाजी शोर शराबे बैनर झंडे होते हैं। लोकतंत्र की मर्यादा की उनको है परवाह नहीं। जिनकी काली करतूतों से जनता है आगाह नहीं। जनता की नजरों में इनकी लंबी-लंबी खाईं है। बांट बराबर खाने वाले सब मौसेरे भाई हैं। बड़े निराले कर्म है इसके गिरगिट हैं मंडूक यही। परे बुद्धि से जानों इनको गोली हैं बंदूक यही। संघर्ष सदन का नाता है केवल जनता की हमदर्दी। छुट्टे सांड़ राजनीति के करते हैं गुंडागर्दी। जनसेवक हैं बड़े देश के बेतन एक रुपैया है। उपहारों में सोना चांदी धन की आमद गैया है। स्वर्ण पात्र में मदिरा ऊपर पावनता में गंगे हैं। सातों के सम्राट अहाते लुच्चे और लफंगे हैं। जोड़ तोड़ उपकरण सजाते राजनीति की खेती में। मरुस्थल में नीर बहाए भीति उठाए रेती में। भृष्ट आचरण के जनसेवक हैं हमको स्वीका...