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कविता

उम्मीदों की भोर
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उम्मीदों की भोर

भीमराव झरबड़े 'जीवन' बैतूल मध्य प्रदेश ******************** निगल रहा अब अंधकार जग, होकर आदमखोर। क्षितिज परे जाकर दुबकी है, उम्मीदों की भोर।। जंगी ताले ने जकड़ा है, दुनिया का चिंतन। शुष्क कूप में करते मेंढक, सरहद पर मंथन।। हर बैठक का फल खा जाता, छली केमरा चोर।। क्षितिज परे जाकर दुबकी है, उम्मीदों की भोर।।१ निर्जन में सम्पन्न भेड़िए, करते हैं कसरत। कम्बल ओढ़े चरती हैं अब, कुछ भेड़ें आहत।। शून्य कौर के आगे लगकर, करे पेट में शोर। क्षितिज परे जाकर दुबकी है, उम्मीदों की भोर।।२ भगा दिए हैं दर से शिल्पी, इन बाजारों ने। वस्त्र जंग के पहन लिए हैं, अब औजारों ने।। 'जीवन' का हर उत्सव भूला, इस जंगल का मोर। क्षितिज परे जाकर दुबकी है, उम्मीदों की भोर।।३ परिचय :- भीमराव झरबड़े 'जीवन' निवासी- बैतूल मध्य प्रदेश घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी...
मेरी दासताँ
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मेरी दासताँ

जया आर्य भोपाल म.प्र. ******************** हस्ती मेरी मिटेगी नहीं अभी बहुत सी बातें करनी बाकी है अब भी बची हैं कुछ इश्क की बातें जो दिल में आग लगाती हैं। मेरे अफसानों को तुम करोगे याद कुछ तो फसाने हैं इनअल्फज़ों में यहीं जमीं पर पड़े पाये हैं मैने कुछ तो आस्मानों से चुरालाये हैं। आज भी इस भीड़ में जब अकेले होते हैं तो हर तरफ से आती है आवाजें कौन हो तुम कहां से आये हो क्यों सोये हुए जज़्बात जगाते हो। न जाने कितने दिलों पे राज किया है मैने हर दिल मेरे इर्द गिर्द घूमती है किस दिल से कहूं तुम मेरे हो हर दिल के जख्म सिए हैं मैने। ऐ खुदा तुझे पुकारते हैं हर दम तभी तो प्यार जिन्दा है मुझमें मैं रहूं न रहूं तेरी इस दुनियां में सांसे मेरी दासताँ सुनाएंगी हर दम। परिचय - जया आर्य जन्म : १७ मई १९४७ निवासी : भोपाल म.प्र. शिक्षा : तमिल भाषी अंग्रेज़ी में एमए. उपलब्धि : ग्रेड १, हिंदी उदघोषक आकाशवाणी मुम...
प्यासा पंछी
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प्यासा पंछी

रशीद अहमद शेख 'रशीद' इंदौर म.प्र. ******************** नेह नीर का प्यासा पंछी, आँगन डोल रहा। अपनी प्यारी वाणी में वह, कुछ है बोल रहा। संभवतः कर रहा निवेदन, सुमधुर भाषा है। उसकी कुछ अपनी चाहत है, कुछ अभिलाषा है। सुनने वालों के कानों में, मिसरी घोल रहा। नेह नीर का प्यासा पंछी, आँगन डोल रहा। आदि काल से है मानव के, खग से प्रिय नाते। विहग संग पाकर घर-आँगन , सब जन सुख पाते। मानव जीवन में हर नभचर, नित अनमोल रहा। नेह नीर का प्यासा पंछी, आँगन डोल रहा। उसके गाने में है सरगम, स्वर है मनमोही। धुन सीधे उर को छूती है, लय है आरोही। मधुर-मधुर स्वर लहरी द्वारा, उर पट खोल रहा। नेह नीर का प्यासा पंछी, आँगन डोल रहा। परिचय -  रशीद अहमद शेख 'रशीद' साहित्यिक उपनाम ~ ‘रशीद’ जन्मतिथि~ ०१/०४/१९५१ जन्म स्थान ~ महू ज़िला इन्दौर (म•प्र•) भाषा ज्ञान ~ हिन्दी, अंग्रेज़ी, उर्दू, संस्कृत शिक्षा ~ एम• ए• (हिन्दी और ...
बड़ी देर कर दी
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बड़ी देर कर दी

होशियार सिंह यादव महेंद्रगढ़ हरियाणा ******************** जीवन की राह में, नहीं चलती मर्जी, समय पर चलना, बड़ी देर कर दी। समय का पाबंध, नहीं हो खुदगर्जी, देरी न हो अच्छी, बड़ी देर कर दी। दर्द कभी ना दो, बनो नहीं बेदर्दी, देरी भ्रष्टाचार हो, बड़ी देर कर दी। गर्मी जब बीतती, फिर आती सर्दी, सावन भी कहता, बहुत देर कर दी। मरीज दम तोड़ता, चले डाक्टर मर्जी, नहीं लगती अर्जी, बहुत देर कर दी। अन्न पैदा न हुआ, कैसी खेती करली, बीज बोया देर से, बहुत देर कर दी। विद्यार्थी फेल हो, खूब लगाई अर्जी, सालभर पढ़ा नहीं, बहुत देर कर दी। युद्ध में हार गया, तत्परता न बरती, चारों ओर घिरता, बहुत देर कर दी। मरीज बीमार हो, लापरवाही बरती, रोग ठीक न हुआ, बहुत देर कर दी। बढ़ा हुआ प्रदूषण, हदें ही पार करली, अब भी वक्त बचा, बहुत देर कर दी। रोग बढ़ता जाएगा, जब लगी हो सर्दी, वक्त है बचाव कर, बहुत देर कर दी। जोह र...
मौसम संमदर किनारा मेहबूब पैसै
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मौसम संमदर किनारा मेहबूब पैसै

अलका जैन (इंदौर) ******************** मौसम संमदर किनारा मेहबूब पैसै लोक डाउन ने सब पर पानी फेरा करोना जीते जी मार डाला यार मंझधार में साथ रहे किनारे पर वो अजनबी बन गया हाय रो मत दुनिया में होता लाख बहाने मरने के यार तू सिर्फ एक सहारा जिंदगी का बस मै नहीं तू ही तू कस्मे वादे प्यार वफा बेकार जिस्म की चाहते सबसे पहले नया दौर मेहबूबा चाहे इश्क नादानी करें महफ़िल यार दोस्त खुशी पैमाना दुनिया बदला पैमाना मंहगी वस्तु खुशी दे तेरा को देख खुश कोई लहू संग अश्क बह रहे अश्क बाहाये समझा कौन दर्द ए मुफलिस दर्द-दर्द और दर्द मुफलिस की जिंदगी हुनर को दाद दे कौन माया दिवानी कला को मान दे कोन हुनरमंद कैसे हूनर निखारे यारो अश्क तेरे ही नहीं दीवाने दुनियाभर की आंखों नम क्या तू क्या जाने अश्क पीता जा और जी मिलेगी मंजिल एक दिन तुझे भी भटक घूमना ना छोड़ हुनरमंद कलाकार मेहनत रंग लाएगी एक दिन परिचय :- इं...
देख मां
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देख मां

मित्रा शर्मा महू - इंदौर ******************** अमिट कहानी लिख डाली है बेटों ने, तेरी लाज बचाने कदम बढ़ाए है बेटों ने। सोंधी खुश्बू तेरी माटी की महक गई , तेरे रक्षा के लिए जान भी कुर्बान गई। मनाते है हम दीवाली घरों में बैठकर, वो खेलते है होली सरहदों पर जाकर। जब दुश्मन अपनी पंख फड़फड़ाते है, तब वीरों ने डटकर अपना लहू बहाते है। दांव पेच खेलकर कायरों ने हराने को, शूरवीर हारते नहीं आंखे चार कराने को। परिचय :- मित्रा शर्मा - महू (मूल निवासी नेपाल) आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, हिंदी में टाईप करके हमें hindirakshak17@gmail.com पर अणु डाक (मेल) कीजिये, अणु डाक करने के बाद हमे हमारे ...
रात की बात
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रात की बात

धैर्यशील येवले इंदौर (म.प्र.) ******************** रात आज मुझ से बात कर रही थी चाँद सितारों का जिक्र कर रही थी। बीच बीच मे जुगनुओं को डपट देती कभी सुनी पड़ी सड़को को निहार रही थी। मैं पूछ बैठा कभी उजाले से बात हुई है। उसकी निगाहें उठी, वो सितारों को ताक रही थी। वो गुनगुना रही थी, सन्नाटे की धुन पर सूरज का कोई पुराना गीत गा रही थी। अचानक खींच लिया उसने मुझे आगोश में नींद के साथ वो मेरी ही बात कर रही थी। रात का जादू अपने पूरे शबाब पर था। ख्वाबो में वो मुझे सूरज से मिला रही थी। परिचय :- धैर्यशील येवले जन्म : ३१ अगस्त १९६३ शिक्षा : एम कॉम सेवासदन महाविद्याल बुरहानपुर म. प्र. से सम्प्रति : १९८७ बैच के सीधी भर्ती के पुलिस उप निरीक्षक वर्तमान में पुलिस निरीक्षक के पद पर पीटीसी इंदौर में पदस्थ। सम्मान : राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर hindirakshak.com द्वारा हिंदी रक्षक २०२० राष्ट्रीय सम्मान घ...
भीम हमारे
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भीम हमारे

बुद्धि सागर गौतम नौसढ़, गोरखपुर, (उत्तर प्रदेश) ******************** बाबा साहब भीम हमारे, मां भीमा के लाल रहे। सूबेदार पिता जी उनके, चौदहवीं संतान रहे। पिता रामजी राव हुए खुश, अन्न, वस्त्र भी बांट रहे। विधि मंत्री पहले भारत के, बाबा साहब जी भीम रहे। बालक भीमराव पढ़ने में, अपनी रुचि दिखलाए थे। सूबेदार पिता जी उनके, नामांकन करवाए थे। दर-दर, दर-दर भटक रहे थे, तभी सफलता पाए थे। प्रतिभाशाली भीमराव जी, सदा प्रथम ही आए थे। भारत आजाद कराने को, भीमराव संघर्ष किए। कठिन परिस्थिति में भी पढ़कर, संविधान निर्माण किए। शोषित पीड़ित, नर नारी को, उनका हक अधिकार दिए। भारत मेरा आजाद हुआ, भीम राव कानून दे। करूं नमन में भीम आपको, भारत नव निर्माण किए। चौदह अप्रैल को जन्म लिए, छः दिसंबर प्रस्थान किए। भारतवासी ऋणी आपका, नमन आपको करते हैं। जय भारत, जय भीम प्रेम से, मिलकर बोला करते हैं। परिचय :- बुद्धि सागर गौतम जन...
अन्नदाता
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अन्नदाता

श्रीमती आभा चौहान अहमदाबाद (गुजरात) ******************** हम सबका अन्नदाता किसान है कहलाता अपनी कड़ी मेहनत से रोटी देता सारे जग को पर उसका परिवार कोसता है अपनी किस्मत को न जाने कितनी मेहनत कर इस फसल को है उगाता बंजर धरती को भी पुकारता है कहकर माता जो सब को भरपेट है खिलाता वो कभी कभी खुद भूखा है सो जाता हमारे देश का किसान जो रोज हल चलाता है इतनी मेहनत करने पर भी कितना कम वो पाता है सारा देश भूखा मरेगा अगर किसान यू आत्महत्या करेगा। हम सबको मिलकर हर किसान को बचाना है अपने अन्नदाता को उसका हक दिलाना है। परिचय :- श्रीमती आभा चौहान निवासी :- अहमदाबाद गुजरात घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय हिंदी रक...
मृगतृष्णा
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मृगतृष्णा

धैर्यशील येवले इंदौर (म.प्र.) ******************** कोई भूख से परेशान है कोई बदहजमी से हलकान है शहर के इस हालत पर बताओ कौन कौन पशेमान* है। सभी को पता है ये बात ऊंट किस करवट बैठेगा खत्म हो जाएगा वो शख्स ये बात अगर किसी से कहेगा। गांव के लिए कोई सच्चा न था ये बुरा है तो वो भी अच्छा न था किससे करे गिला शिकवा हमारा नसीब ही पक्का न था। रहबर है तू, बारबार जता नही जाना कहा है, कुछ पता नही अब दौड़ने लगे है सभी उधर जिधर कोई रास्ता जाता नही। हर निगाह में यही एक सवाल है न मैं न तु फिर कौन मालामाल है कान पक गए ये सुन सुन कर देगा खुशियां आने वाला साल है *पशेमान- लज्जित होना परिचय :- धैर्यशील येवले जन्म : ३१ अगस्त १९६३ शिक्षा : एम कॉम सेवासदन महाविद्याल बुरहानपुर म. प्र. से सम्प्रति : १९८७ बैच के सीधी भर्ती के पुलिस उप निरीक्षक वर्तमान में पुलिस निरीक्षक के पद पर पीटीसी इंदौर में पदस्थ। सम्मान : राष...
मेरी दुनिया हो तुम
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मेरी दुनिया हो तुम

श्वेतल नितिन बेथारिया अमरावती (महाराष्ट्र) ******************** तुम्हारे हर एक दर्द की दवा हो गई हूँ मैं तुम्हारे लिए फूल, शोला, शबनम हो गई हूँ मैं हर पल हूँ तुम्हारी ही हमसाया बनकर के मैं अलग होने की सोचते ही तनहा हो गई हूँ मैं! तुम बिन कैसे पल पल गुजरते हैं मुझसे पूछो तुमने भर लिया बाहों में कि पूरी हो गई हूँ मैं! तुम मेरी दुनिया मेरे संसार हो मेरे सनम एक तुम्हारी मोहब्बत में फना हो गई हूँ मैं! बुरे दौर में भी साथ निभाया मेरा मेरे हमदम तुम में खोई हूँ इतना खुद से रुसवा हो गई हूँ मैं! परिचय - श्वेतल नितिन बेथारिया निवासी - अमरावती (महाराष्ट्र) घोषणा पत्र - मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, क...
ज़िंदगी…”एक दीप तेरे दर रख आया”
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ज़िंदगी…”एक दीप तेरे दर रख आया”

निर्मल कुमार पीरिया इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** मन प्रीत माटी को गूंथ, प्रेम रंग से दिया रँगा, मिलन आस की बाती धर, चाहत से था रहा भीगा... गढ़ रहा हूं प्रेमदीप को, अरमानो के नीर से, उलझनों की अमा मिटाने, रौशन करता पीर से... सह तपन तू रोक रहा है, परवाने को मिटने से, आह उपजती एक साथ ही, नादा अंग सामने से... कर उजाला तम से लड़ता तू, वास्ते औरो जलता आया, तले तेरे भी उजियारा हो, बन दीप तेरे दर जल आया... परिचय :- निर्मल कुमार पीरिया शिक्षा : बी.एस. एम्.ए सम्प्रति : मैनेजर कमर्शियल व्हीकल लि. निवासी : इंदौर, (म.प्र.) शपथ : मेरी कविताएँ और गजल पूर्णतः मौलिक, स्वरचित और अप्रकाशित हैं आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीयहिंदी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने ह...
भोला आदमी
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भोला आदमी

आनन्द कुमार "आनन्दम्" कुशहर, शिवहर, (बिहार) ******************** आदमी तू बड़ा भोला है बात बोले बड़बोला है अच्छाई-बुड़ाई में भेद न जाने आदमी तू बड़ा भोला है। न जाने तू सच्चाई बस कहे उसकी सुनायी गफलत में पड़ता जाता है आदमी तू बड़ा भोला है। नियम की धज्जी उड़ती सरेआम माँ-बेटियाँ बदनाम होती सरेआम फिर भी लड़ता ये नाकाम शायद कभी तो सुने ये हैवान आदमी तू बड़ा भोला है। परिचय :- आनन्द कुमार "आनन्दम्" निवासी : कुशहर, शिवहर, (बिहार) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, हिंदी में टाईप करके हमें hindiraks...
धरोहर
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धरोहर

सुधीर श्रीवास्तव बड़गाँव, जिला-गोण्डा, (उ.प्र.) ******************** हम सबके लिए हमारे बुजुर्ग धरोहर की तरह हैं, जिस तरह हम सब रीति रिवाजों, त्योहारों, परम्पराओं को सम्मान देते आ रहे हैं ठीक उसी तरह बुजुर्गों का भी सम्मान बना रहना चाहिए। मगर यह विडंबना ही है कि आज हमारे बुजुर्ग उपेक्षित, असहाय से होते जा रहे हैं, हमारी कारस्तानियों से निराश भी हो रहे हैं। मगर हम भूल रहे हैं कल हम भी उसी कतार की ओर धीरे धीरे बढ़ रहे हैं। अब समय है संभल जाइए बुजुर्गों की उपेक्षा, निरादर करने से अपने आपको बचाइए। बुजुर्ग हमारे लिए वटवृक्ष सरीखे छाँव ही है, उनकी छाँव को हम अपना सौभाग्य समझें, उनकी सेवा के मौके को अपना अहोभाग्य समझें। सबके भाग्य में ये सुख लिखा नहीं होता, किस्मत वाला होता है वो जिसको बुजुर्गों की छाँव में रहने का सौभाग्य मिलता। हम सबको इस धरोहर को हर पल बचाने का प्रयास करना चाहिए, बुज...
कयामत की रात
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कयामत की रात

माधुरी व्यास "नवपमा" इंदौर (म.प्र.) ******************** कयामत तक न भूलेगी, वो क़यामत की रात। दिल को कँपाती, डराती हुई वो तूफानी सी रात। कैसे गिर पड़ा था, आंधी से वो बूढ़ा पीपल, बिजली के तारों में, उलझा हुआ था बेतल। दिल की धड़कन को बढ़ाती हुई डराती सी वो रात। कयामत तक नहीं भूलेगी, वो क़यामत की रात, दिल को कँपाती, डराती हुई, वो तूफानी सी रात। देखा गुस्से से गरजता, पानी में सुलगता वो बादल हर इक शे से टकराता हो कोई भटकता पागल एक अनजान डर को डराती , घबराती सी वो रात कयामत तक नहीं भूलेगी, वो क़यामत की रात। दिल को कँपाती, डराती हुई, वो तूफानी सी रात। हाय वो धोखे से जाना, अचानक यूँ उसका, लौटकर वापस फिर कभी ना आना उसका, लूटकर जैसे मुझ को जाती हुई फरेबी सी वो रात कयामत तक नहीं भूलेगी, वो क़यामत की रात। दिल को कँपाती, डराती हुई, वो तूफ़ानी सी रात। परिचय :- माधुरी व्यास "नवपमा" निवासी - इंदौर म.प्र. सम्प्...
बस इतनी सी है जिंदगानी
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बस इतनी सी है जिंदगानी

प्रियंका पाराशर भीलवाडा (राजस्थान) ******************** कभी हँसते गाते मौजों की रवानी कभी दर्द समेटे दिल और आँखो में पानी कभी सुकून तो कभी बैचेनी कभी मन गंभीर तो कभी शैतानी बस इतनी सी है जिंदगानी तैयार हर पल एक नया किस्सा कभी सुख तो कभी दुख का हिस्सा कठिन डगर पर कठिन संघर्ष मंजिल पाने पर अथाह हर्ष जीवन जीने की आपाधापी कभी ईमानदार तो कभी बनते पापी निभाने मे तत्पर अलग-अलग किरदार हैसियत बस इत्ती सी जैसे कोई किरायेदार कुछ वक्त का है बसेरा साँस है जब तक तेरा मेरा चिरनिद्रा लेते ही जग अँधेरा समय के आगे नहीं चलती कोई भी मनमानी जो आज है वो बन जाएगा कल एक कहानी रह जाएगी बस यादों की निशानी बस इतनी सी है जिंदगानी परिचय :- प्रियंका पाराशर शिक्षा : एम.एस.सी (सूचना प्रौद्योगिकी) पिता : राजेन्द्र पाराशर पति : पंकज पाराशर निवासी : भीलवाडा (राजस्थान) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर...
ज़िंदगी…”तू रुक, वक्त को जाने दो!”
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ज़िंदगी…”तू रुक, वक्त को जाने दो!”

निर्मल कुमार पीरिया इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** दरिया-ए-वक्त पर जोर नहीं, वो बहता अपनी रवानी में, अच्छी हो या बुरी सोहब्ते, ना बिसराता कभी गुमानी में, तू ही थम जा! दम भर रुक जा! वो तो बंधा उसूलों से, हैं चार प्रहर,बस तेरे वास्ते, ना गुम हो किसी कहानी में... लम्हा लम्हा दरक रहा हैं, जलती बुझती यादों के संग, रुक रुक कर कहती हैं साँसे, पल छिन जी ले मेरे संग, लहर बड़ी हैं उठती गिरतीं, ना जाने कब किस ओर बहे, कल की फिर कल को कर लेंगे,आज तू बह जा मेरे संग... चलते चलते आ निकले दूर, मंजिल का फिर भी पता नही, तकते तकते शमा गुम हुईं,परछाई का कही कोई पता नही, चलने ही चलने में राहे , पता नही कब कहा गुम हुई, मन भर जी ले, उर की सुन ले, कल क्या होगा पता नही... परिचय :- निर्मल कुमार पीरिया शिक्षा : बी.एस. एम्.ए सम्प्रति : मैनेजर कमर्शियल व्हीकल लि. निवासी : इंदौर, (म.प्र.) शपथ : मेरी कवि...
कार्तिक पूर्णिमा
कविता

कार्तिक पूर्णिमा

विरेन्द्र कुमार यादव गौरा बस्ती (उत्तर-प्रदेश) ******************** कार्तिक पूर्णिमा स्नान का दिन है भाई, चलकर अयोध्या सरजू नदी में लो डूबकी लगाई। व्यक्ति के जीवन का सब पाप धुल जाय, जो लेगा पवित्र नदी गंगा में नहाय। कार्तिक पूर्णिमा गंगा स्नान के नाम से भी प्रसिद्ध है भाई, वाणारसी में आज ही गंगा घाट पर देव दीपावली जाय मनाई। शाम के समय दीपक जलाकर गंगा जी में प्रवाहित किया जाये, देश-विदेश के लोगों का मन गंगा घाट की मनमोहक दृश्य लुभाये। कार्तिक पूर्णिमा को त्रिपुरारी पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाये, आज के ही दिन भगवान भोलेनाथ से त्रिपुरासुर का अन्त हुआ भाये। कार्तिक पूर्णिमा के दिन पवित्र नदियों में जो नहाये, उसके जीवन सम्पूर्ण पाप व कष्ट दूर हो जाये। आज ही के दिन सिख धर्म के गुरु नानक देव का जन्म मनाया जाये, इनके जन्म दिन को प्रकाशोत्सव के रूप में भी जाना जाये। सिख धर्म के लोग गुरु ना...
परमात्मा
कविता

परमात्मा

धैर्यशील येवले इंदौर (म.प्र.) ******************** खुद को जाना नही दुसरो को जानेगा भरम में जी रहा है सच कब मानेगा। घर से कभी निकला नही लौटने की बात करता है, दरवाजे पर दे रहा दस्तक वहम में जिया करता है। उत्तर तुझे पता है क्यो प्रश्न करता है, ढोंगियों के जाल में फसने को करता है। जो माया रचता है वो भीतर ही बैठा है, तू सोया ही कब था जो उठ कर बैठा है। याद रखो या भूलो कोई फर्क नही होगा अवचेतन की चेतना में तमस नही होगा । सर्वत्र तुझे देख रहा हूँ मुझसे कुछ छुपा नही रोम रोम में बसने वाले मेरी नजरो से तू छुपा नही। परिचय :- धैर्यशील येवले जन्म : ३१ अगस्त १९६३ शिक्षा : एम कॉम सेवासदन महाविद्याल बुरहानपुर म. प्र. से सम्प्रति : १९८७ बैच के सीधी भर्ती के पुलिस उप निरीक्षक वर्तमान में पुलिस निरीक्षक के पद पर पीटीसी इंदौर में पदस्थ। सम्मान : राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर hindirakshak.com द्वारा हिं...
मेरा वजूद
कविता

मेरा वजूद

मित्रा शर्मा महू - इंदौर ******************** किन्नरों की भावनाओ को ध्यान में रखकर लिखी गई रचना :- मेरा होना किसी को भाता नहीं सभ्य समाज में, मैं समाता नहीं। जन्म से धिक्कार, कोई अपनाता नहीं सभ्य समाज से मेरा कोई नाता नहीं। सिर्फ हँसी के लिए बना हूँ दर्द पीने के लिए बना हूँ तालियाँ मेरे नसीब में नहीं ताली बजाने के लिए बना हूँ। पेट भरने के लिए मेरी झोली फैली रहती सबकी मुरादें मेरी झोली में सिक्कों संग गिरती रहती अपने तन से नफरत कैसे करूँ बस, खुद मन ही मन धीर धरूँ आँसू को मुस्कान के पीछे धरूँ उसने भेजा धरती पर, कबूल करूँ। तन अधूरा मन अधूरा, ना कुछ मुझमें भी पूरा लेकिन स्त्री का श्रृंगार कर, करूँ कुछ मन का पूरा। कोई नहीं दे सकता मुझे जो रह गया मुझमें अधूरा विनती यही कि दुआ लेते रहना, हो ख्वाब तुम्हारा पूरा। परिचय :- मित्रा शर्मा - महू (मूल निवासी नेपाल) आप भी अपनी कविताएं, कहान...
व्योम के बादल
कविता

व्योम के बादल

मनोरमा जोशी इंदौर म.प्र. ******************** व्योम के बादल बहा ले, नीर तू, देख धरती रो रही है। रो रही सारी दिशाऐं, ज्वार सागर में उठा है, रो रही जग की हवाऐं। व्योम के बादल बटा, ले पीर तू। रो रहे पाषाण जिन पर, खेलते निर्झर बहे है, रात दिन सरवर रहे हैं। व्योम के बादल हटाले, नीर तू। रो रहा मेरा हर्दय है, रो रहे है नैन मेरे। जल रही ज्वाला विरह की जल रहे सुख चैन मेरे। व्योम के बादल बंधा दे, धीर तू। व्योम के बादल बहा ले, नीर तू। परिचय :-  श्रीमती मनोरमा जोशी का निवास मध्यप्रदेश के इंदौर में है। आपका साहित्यिक उपनाम ‘मनु’ है। आपकी जन्मतिथि १९ दिसम्बर १९५३ और जन्मस्थान नरसिंहगढ़ है। शिक्षा - स्नातकोत्तर और संगीत है। कार्यक्षेत्र - सामाजिक क्षेत्र-इन्दौर शहर ही है। लेखन विधा में कविता और लेख लिखती हैं। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में आपकी लेखनी का प्रकाशन होता रहा है। राष्ट्रीय कीर्ति सम्मान सहित साहि...
व्हाट्सएप मैसेज नहीं कोई खत भेज दो मेरे पते पर
कविता

व्हाट्सएप मैसेज नहीं कोई खत भेज दो मेरे पते पर

होशियार सिंह यादव महेंद्रगढ़ हरियाणा ******************** पता नहीं चल पाता है, संदेश आकर जाता है, कई कई दिन पढ़ते ना, नहीं इनसे कोई नाता है। पुराने वक्त का खत था, आकर मन हर्षाता था, गमी और खुशी सारी, एक झलक कहता था। खत जब आता था घर, डाकिया चल आता था, जोर से दरवाजे पर बोल, खत हमको दे जाता था। आस पास पता लगता, इनके कोई चिट्ठी आई, खुशी भरी खबर मिले, सारे मोहल्ले खुशी मनाई। गम भरा खत होता था, सबको पता लग जाता, पढ़कर वो समाचार ही, गम हमें बहुत सताता। अब क्या मोबाइल चले, दिनभर करे आंखें खराब, लगता चेहरा मानव का, जैसे पी रखी हो शराब। इंसान रखता मोबाइल है, सोचता अपने को महान, ये चीजें कभी ना बनाती, इंसान की कोई पहचान। पुरानी विचारधारा बनी, मोबाइल नहीं खत रूप, खत संदेश दे मन खुशी, खत संदेश होता अनूप। करते थे इंतजार दिनरात, आयेगा कोई शुभ संदेश, अच्छा संदेश जब मिले, इच्छा ना रहती थी शेष। ...
बेटियां
कविता

बेटियां

संजय वर्मा "दॄष्टि" मनावर (धार) ******************** अपने गांव का दिखे या ख़बर हो खुश होती है बेटियां बिदाई के समय रुलाती है बेटियां मोबाइल बेटी का आता पूरे घर को नजदीक कर देती बेटियां भाई के रिजल्ट सुनकर ससुराल में मिठाई बटवा देती बेटियां घर आंगन के गुड्डे गुड़ियों को छोड़ बहुत दूर जा बसती बेटियाँ घर मे बेटियों का टूटता खिलौना डर होता आने पर डाँटेगी बेटियां नन्ही चिड़िया सी उड़कर ससुराल में बना लेती बसेरा बेटियां त्यौहार पर नही आ पाने से रिश्तो को रुला देती बेटियां मोबाइल पर दुःख की बातें कभी नही बताती बेटियां मायके-ससुराल को तराजू के पलवो में रिश्ते तोलती बेटियां बेटियों से मिलकर आने पर हिम्मत आजाती खुशियां नाच गा उठती बातें सुनाती नए रिश्तों के घर आंगन को ऐसी होती है प्यारी सी लाडली बेटियां माता- पिता की ता उम्र फिक्र करती बेटियां बेटी की याद आने पर आँसू छलकाती अंखिया परिचय :- संजय वर्...
टूटते गठबंधन और निदान
कविता

टूटते गठबंधन और निदान

विकाश बैनीवाल मुन्सरी, हनुमानगढ़ (राजस्थान) ******************** चौपाल नहीं रही, ना रहे चबूतरे, आपसी खीज ने सब तोड़ डाला। ग़लतफ़हमियो से भरे रिश्तों ने, एकांतता की और मुँह मोड़ डाला। क्या बात करें गठबंधन की हम, इसने भी एकता को निचोड़ डाला। नये रिश्तों की बेहूदी चाह में, लोगों ने पुराना घर फोड़ डाला। गलतफहमियां होती है रिश्तों में, माफ़ करना सुधारना भी जरूरी है। इंसान जो ठहरे हम सब साहब, आपस में सराहना भी जरूरी है। वहम जो है ये फ़क़त मन का मेल है, मेल को जड़ से मिटाना भी जरूरी है। गौर से देखें अनदेखे ना करें रिश्ते, जीवन में रिस्ते निभाना भी जरुरी है। परिचय :- विकाश बैनीवाल पिता : श्री मांगेराम बैनीवाल निवासी : गांव-मुन्सरी, तहसील-भादरा जिला हनुमानगढ़ (राजस्थान) शिक्षा : स्नातक पास, बी.एड जारी है घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। ...
जान जरूरी-जहान भी जरूरी
कविता

जान जरूरी-जहान भी जरूरी

विजय गुप्ता दुर्ग (छत्तीसगढ़) ******************** मानव रूप में जनमे युग के विशाल योग से कर्मों कीआहुति मरने कोरोना अकाल रोग से दिल दौलत दुनिया का तालमेल जरूरी है ये जान बड़ी जरूरी, सुन्दर जहान जरूरी है। धरा पर संवादी मौसम हमें आगाज़ कराता कई ढंगों से जीवन-यापन आभास कराता आन जरूरी है, दिल का अरमान जरूरी है ये जान बड़ी जरूरी, सुंदर जहान जरूरी है। अनजाने स्वभाववश, कभी मार्ग दिखलाता किसी मोड़ पे संयोगवश घटना याद दिलाता दान जरूरी है, सेवा अवदान बहुत जरुरी है ये जान बड़ी जरूरी, सुंदर जहान जरूरी है। कर्म भाग्य चाल से शीर्ष स्थान मिल जाता राष्ट्रप्रेम हितैषी जग में महामानव कहलाता उसका मान जरूरी है यथा सम्मान जरूरी है ये जान बड़ी जरूरी, सुंदर जहान जरूरी है। साहित्यकार इस जगत में, कई रंगों को झेले सूरज चांद गगन धरा, राष्ट्रीय कलम से खेले राष्ट्रगान जरूरी है, उसका गुणगान जरूरी है। ये जान बड़ी जरूरी, सुं...