संभव है
अखिलेश राव
इंदौर (मध्य प्रदेश)
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संभव है क्या रीते मन में
या फिर मेरे ही जीवन में
होता है विश्वासघात क्यूं
या में करता आत्मसात हूं
क्यूं अपेक्षा बढती जाती
और उदासी छाती।
या फिर मेरे ही जीवन में
तृप्त ना होता मन मेरा है
या फिर जीवन का घेरा है
तनिक मुझे इतना बतला दो
मुझको भी पथ प्रेम बता दो
वरना भटकूंगा वन वन में
प्यास बुझेगी ना जीवन में
आओ और बसंत बन जाओ
मेरे उजड़े से मधुवन में।
संभव है क्या रीते मन में
या फिर मेरे ही जीवन में।
परिचय :- अखिलेश राव
सम्प्रति : सहायक प्राध्यापक हिंदी साहित्य देवी अहिल्या कला एवं वाणिज्य महाविद्यालय इंदौर
निवासी : इंदौर (मध्य प्रदेश)
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।
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