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पद्य

दिल्ली की औरतें
कविता

दिल्ली की औरतें

डॉ. जयलक्ष्मी विनायक भोपाल (मध्य प्रदेश) ******************** ये दिल्ली की औरतें कुछ मीठी और नमक सैंडिल ऊंची पहनती लगती है जैसे क्वीन। ये दिल्ली की औरतें कुछ मीठी कुछ नमकीन। पार्लर अक्सर जाती कारें रफ्तार से दौड़ाती तेज तर्राट और गर्म मिजाज़ तबीयत है इनकी रंगीन ये दिल्ली की औरतें कुछ मीठी और नमकीन। नौकरी बड़ी ऊंची करती पैसे खूब कमाती, भारत की नारियों में अग्रगणी ये किसी से कम नहीं। ये दिल्ली की औरतें कुछ मीठी कुछ नमकीन। शापिंग करने में सबसे आगे पैसे बचाने में गंभीर वाकपटुता में सबसे आगे वैभवी और महाजबीन, ये दिल्ली की औरतें कुछ मीठी कुछ नमकीन। दिल्ली की ठंडी-गर्मी सहती पर अपनी त्वचा को बकायदा संवारती, स्कूल टीचर से लेकर बिजनेस टायकून तक सब पर अपनी धाक जमाती। ये दिल्ली की औरतें कुछ मीठी कुछ नमकीन। जूते की नोक पर सभी मर्दों को रखती कोई अगर उनसे...
बेटियों के दर्द
कविता

बेटियों के दर्द

संध्या शुक्ला अमेठी (उत्तर प्रदेश) ******************** आइए महसूस करिए बेटियों के दर्द को, देखिए मतलब की गंगा में नहाते हुए मर्द को। वो औरत जिसने जन्म देकर है तुम्हे पाला यहां, जिसके दूध से जली जीवन की ज्वाला यहां। बहन जिसके धागे की अमानत है कलाई पर, हर बहन का कर्ज वो जो है चढ़ा हर भाई पर। वो बाप जिसकी इज्जत की हर कल्पना बेटी से है, घर की दीवारें सुने हर गर्जना बेटी से है। वो बाप जिसका पुत्र एक और बेटियां दो-तीन हैं, वो प्रेम के सागर तले बेटे में ही क्यों लीन है। इज्जत बचाना काम सबने सौंप बेटी को दिया, बेटा चाहे आबरू छीने बने या माफिया। आबरू को लूट कर भी बेटा कुल का अंश क्यों, बेटी जो बस प्रेम कर ले तो उठेगी उंगलियां। हर धर्म में बेबसी और यातना से ऊब कर, मर गई हैं जानें कितनी बेटियां यूं टूटकर। परिचय :-  संध्या शुक्ला शिक्षा : परास्नातक नि...
लेखनी मुझसे रूठ जाती है
कविता

लेखनी मुझसे रूठ जाती है

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* जब भी मैं लिखने बैठता कविता, लेखनी मुझसे रूठ जाती है, वह कहती मेरा पीछा छोड़ दो, मुझसे अपना नाता तोड़ दो, क्या तुम मुझे सौंदर्य में ढाल सकोगे, इस घुटन भरे माहौल से निकाल सकोगे, क्या तुम कुछ अलग लिख सकोगे, या तुम भी दुनिया की बुराइयों को, अपनी रचना में दोहराओगें? दहेज, भूख, बेकारी के शब्द में अब ना मुझको जकड़ना, हिंसा दंगों या अलगाव के चक्कर में ना पड़ना, नेताओं को बेनकाब करने में मेरा सहारा अब ना लेना, बुराइयां ना गिनाना अब बीड़ी सिगरेट या शराब की, उकता गई हूं अब मैं, बलात्कार हत्या या हो अपहरण, इन्हीं शब्दों ने किया है जैसे मेरे अस्तित्व का हरण। लेखनी बोलती रही, मुझे मालूम है तुम इंसानियत की दुहाई दोगे, इसलिए मैं पास होकर भी हूं पराई। अगर लिखना हो तो लिखो, प्रकृति की गोद में बैठ कर, ...
पति को भी इंसान मानो
कविता

पति को भी इंसान मानो

गरिमा खंडेलवाल उदयपुर (राजस्थान) ******************** उसके कंधे है इतने मजबूत वह सारी दुनिया को उठा लेगा तुम एक सुख दे कर देखो वो खुशियों की झड़ी लगा देगा। पति नहीं कोई जादूगर या कोई भगवान उसकी भी भावनाएं होती है वह भी हाड मास का इंसान प्रेम की चाहत बस उसकी करो तुम पति का सम्मान। भूख पसीना सब सहकर मेहनत कर जब वह घर लौटे मुस्कान भरे चेहरे से उसके तप का तुम करो सम्मान। अपने पति की ताकत बन कर परिवार बगिया सा महकाना होता है पति भी इंसान उसके दुख का कारण कभी मत बनना। शादी संस्कार दो लोगों का यह कोई व्यापार नहीं नफा नुकसान फायदे का साझेदारी का बाजार नहीं। तुम औरत हो शक्ति हो शिव संग सृष्टि रच डालो संग चलो संगिनी बन कर इसमें छोटे बड़े की बात नहीं। वो दुख तकलीफ नही बतलाता होसलो को पर्वत कर लेता परिवार पर कभी आंच ना आए हिम्मत पत्नी को बतलाता। प्रेम ...
तब ही भारत बन पाता है
कविता

तब ही भारत बन पाता है

महेश बड़सरे राजपूत इंद्र इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** नव उदय नव युवानों का नव कर्म प्रवीण महानों का जब रूप राष्ट्र को भाता है तब ही भारत बन पाता है दिग् दिगंत दिवाकर बनकर दौड़ रहे दिक्पाल ये तनकर नव संप्रेरक इन महानों का जब रूप राष्ट्र को भाता है तब ही भारत बन पाता है प्रचंड ज्वाल आँखों में पुरुषार्थ प्रबल हाथों में पाषाण लौह मिश्रित पुष्ट रक्त महानों का जब रूप राष्ट्र को भाता है तब ही भारत बन पाता है तिलक लगाकर तत्पर बनकर तुणीर थामे तेजस रणवर तापस संघ महानों का जब रूप राष्ट्र को भाता है तब ही भारत बन पाता है अरि के संमुख अडिग अचल अस्त्र-शस्त्र प्रहार प्रबल आयुध-वीर महानों का जब रूप राष्ट्र को भाता है तब ही भारत बन पाता है नहीं भ्रमित नहीं व्यथित उपहासों से नहीं श्रमित निःशंक तल्लीन महानों का जब रूप राष्ट्र को भाता ...
मेरे महाकाल
कविता

मेरे महाकाल

राजीव डोगरा "विमल" कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) ******************** मैं न जानू काल को, मैं जानू बस महाकाल। रिद्धि-सिद्धि मुझे न भाए प्रेम, स्नेह और भक्ति मुझे में वो सदा जगाये। हंसते खेलते मुझे अपने गले लगाएं। जान शिशु अपना मुझे रिझाए। अलख निरंजन बन मुझे नाद सुनाएं। चार वेदों का भी मुझे ज्ञान करवाएं। योग विद्या मुझे सिखाएं, महाविद्याओं का भी अभ्यास करवाएं। पूर्ण परब्रह्म मुझको ज्ञान करावे, तभी जग में महाकाल जगतगुरु कहलवाये। परिचय :- राजीव डोगरा "विमल" निवासी - कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) सम्प्रति - भाषा अध्यापक गवर्नमेंट हाई स्कूल, ठाकुरद्वारा घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाच...
सच्चाई हरदम लिखती है
कविता

सच्चाई हरदम लिखती है

अंजनी कुमार चतुर्वेदी निवाड़ी (मध्य प्रदेश) ******************** परम सुपावन सदा लेखनी, सबकी किस्मत लिखती। बरसों पहले भी जैसी थी, आज पूर्व सी दिखती। सच्चाई हरदम लिखती है, सदा झूठ से दूरी। कलम सदा करती है सबके, मन की इच्छा पूरी। गीत गम भरे जब भी लिखती, रोना आ जाता है। प्यार भरे गीतों को पढ़कर, कौना हर्षाता है। दुखियारों का दुख लिखती है, लिखती सबकी खुशियाँ। विरहन का दुख भी लिखती है, लिख पाती मन बतियाँ। भेदभाव ना किया कलम ने, लिखा सदा ही पावन। रास लिखा मोहन राधा का, सुंदर सुखद सुहावन। हिंदू मुस्लिम सिख ईसाई, तूने कभी ना माना। रामायण, बाइबल, कुरान को, सदा एक सा जाना। क्या अमीर औ क्या गरीब हैं, सबको मान दिलाती। तू सबके सौभाग्य जगा कर, माँ सम दूध पिलाती। अगर कलम तू बिक जाएगी, हाहाकार मचेगी। डोल गया ईमान कलम का, दुनिया नहीं बचेगी। पत्रकार, लेखक,...
जाने भी दो यार
कविता

जाने भी दो यार

सरिता चौरसिया जौनपुर (उत्तर प्रदेश) ******************** जाने भी दो यार.. छोड़ो ना यार, अब जाने भी दो कहां तक लेकर चलोगे गिले, शिकवे एक-दूसरे के बिना तो जी भी ना सकोगे, कभी खेले थे एक संग, पकड़ कर जिसकी उंगली सीखा था एक-एक पग रखना करता था जो तुम्हारी फिक्र कभी खुद से भी ज्यादा, जीता था जो तुम्हारे लिए कभी खुद से भी ज्यादा तुम्हारे सपने थे जिसके लिए उसकी नींद भी थी तुम्हारे लिए, एक सवाल पूछना खुद से किसी दिन, गर फुर्सत मिले दुनियादारी से तो, खुद को तलाश करने की जेहमत करना, एक बार ज़रूर कि नाराजगी तो ठीक है शिकायतें भी ठीक हैं पर क्या मुहब्बत से शिकायत का ओहदा ज्यादा बड़ा है ? आज हैं कल रहें ना रहें फिर किससे करोगे शिकायतें किससे रूठोगे? अब तो मान भी जाओ ना रूठो इस तरह क्या पता फिर मिले न मिले।। परिचय :- सरिता चौरसिया पिता : श्री पारसनाथ चौरसिया शिक्षा : एम...
सुहानें मौसम
कविता

सुहानें मौसम

डोमेन्द्र नेताम (डोमू) डौण्डीलोहारा बालोद (छत्तीसगढ़) ******************** मौसम हो गई हैं अब सुहानें, पंछी गीत गा रही हैं नए तराने। प्रकृति भी ओढ़ ली हैं चादर हरियाली, पर्वत पठार बन गए हैं अब दिवानें।। मंद हवा की सुमधुर झरोखों से, तन-मन को प्रफ्फुलित कर दिया। और बारिश की रिमझिम फुहारों से, धरती भी बन गई अब तो मस्ताने।। नदी-नालों की कलरव संग फूलों पर, मंडराती तितली झर-झर बहती झरना। देख नज़ारा मन हमारा बस, कहता हैं? मौसम हो गई अब सुहानें।। परिचय :- डोमेन्द्र नेताम (डोमू) निवासी : मुण्डाटोला डौण्डीलोहारा जिला-बालोद (छत्तीसगढ़) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी ...
हमारी संस्कृति हमारी विरासत
कविता

हमारी संस्कृति हमारी विरासत

शशि चन्दन इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** धरा से अम्बर तलक विस्तृत है, हमारी "भारतीय संस्कृति", देती है जो हर जड़ चेतना को, सारगर्भित जीवन की स्वीकृति।। है संगम यहाँ विविधता का, पर लेष मात्र भी नहीं है कोई विकृति, संविधान ने दिए हैं कई अधिकार, जन जन में एकता ही एक मात्र संतुष्टि।। यहाँ बच्चा बच्चा राम है, और हर एक नारी में माँ सीता है, यहाँ हर प्राणी को मिलती माँ के आँचल में प्रेम की गीता है।। बहती नदियों की धारा में आस्था और विश्वास के दीपक जलते हैं, कि मल मल धोये कितना ही तन को, मगर श्रेष्ठ कर्मों से ही पाप धुलते हैं।। इतिहास बड़ा पुराना है शिलालेखों में कई राज़ हमराज से मिलते हैं, मार्ग मिले चार ईश वंदन के, मगर एक ही मंजिल पर जाकर रुकते हैं।। रक्त-रक्त में मिलता एक दिन, यहाँ ना कोई जात धर्म का ज्ञाता है, "रहीमन धागा प्रेम का है", दिलों से रिश्...
गणित सूत्र को गाइये
दोहा

गणित सूत्र को गाइये

डाॅ. दशरथ मसानिया आगर  मालवा म.प्र. ******************* लंबाई चौड़ाई गुणा, क्षेत्रफल का मान। चाल समय का गुणा करें, दूरी का हो ज्ञान।।१ लंबाइ चौड़ाई अरु, ऊंचाई गुण आन। आयतना को पाइए, कहत हैं कवि मसान।।२ त्रिज्या पाई दो गुनी, वृत्त की परिधि जान। त्रिज्या दुगुनी व्यास है, कहत हैं कवि मसान।।३ आंकड़ों का योग करें, कुल संख्या का भाग। फिर औसत को पाइये, मिले गणित का राग।।४ दर समय अरू मूल का, गुणा करें सम्मान। सौ से भाग दीजिये, सरल ब्याज को आन।।५ गायन वाचिक परम्परा, भारत की पहिचान। गणित ज्ञान को गाइये, कहत हैं कवि मसान।।६ संकेत १. क्षेत्रफल=लंबाई×चौड़ाई २. दूरी=चाल×समय ३. आयतन=लंबाई×चौड़ाई ×ऊंचाई ४. वृत्त की परिधि= २πr या २×त्रिज्या ५. औसत=सब संख्याओं का योगफल/संख्याओं की संख्या ६. सरल ब्याज=मूलधन×दर×समय/१०० परिचय :- आगर मालवा के शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय आ...
जीवन मूल्य
कविता

जीवन मूल्य

सुरेश चन्द्र जोशी विनोद नगर (दिल्ली) ******************** छद्मी-कपटी नांच नचायैंं, स्व मूल्य गिराकर तू नाचता है | प्रतिफल इसका संतान लेगी, ऐसा कभी नहीं तू सोचता है || पतित मूल्य ब्यवहार का तो, परिणाम अतिभयंकर होता है | देख सृष्टि के तो संज्ञान को, फिर भी तू विचलित नहीं होता है || जिनके जीवन मूल्य नहीं, वह मानव नहीं कहलाता है | जीवन मूल्य जो त्याग दे, वह दानव ही कहलाता है || कुटुंब समाज या राष्ट्र हो , सबके तो अपने मूल्य हैं | सभी क्षेत्रों की उन्नति के लिए, उपयोग करते अपने मूल्य हैं || गिराए मूल्य परिवारों ने तो, परिवार सारे बिखर गए | जो मूल्य गिराए समाज ने , समाज विघटित हो गए || गिराकर शिक्षा मूल्य तुम, शिक्षा इस राज्य की गिरा गए | बने थे शिक्षा मूल्य जो , सारे सुमूल्य कुछ गिरा गए || कर आलोचना मूल्यवानों की, तुम अपना स्तर गिरा गए | बनाया मूल्य विहीन को मेंटौ...
आषाढ़
आंचलिक बोली

आषाढ़

परमानंद सिवना "परमा" बलौद (छत्तीसगढ) ******************** छत्तीसगढ़ी करीया-करीया बादर ते रोज बरसात हस, आषाढ़ के महिना मा रोज चमकत-गरजावत हस.! खेत-खार ला भर देहस, टैक्टर नई चले नागर के पाग कर देहस, अब तो नागर बइला नदा गेहे, जेकर कर हाबे पइसा ला बढ़ा देहे.! लोग-लइका जुरमिल के टोक (खेत के कोना) खने बर जावत हे, बबा नागर चलावत हे ता दाई देख के मुसुर-मुसुर मुसकावत हे.! ज्यादा पानी बरसे बिजली चमके ता लोगन घर मा खुसर जावत हे, चना-मसुर खावत हे मया के गोठ गोठियावत हे, आषाढ़ के महिना रिमझिम रिमझिम पानी बरसात हे सुन्दर नजारा दिखात हे.!! परिचय :- परमानंद सिवना "परमा" निवासी : मडियाकट्टा डौन्डी लोहारा जिला- बालोद (छत्तीसगढ़) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी क...
नदी नदियां
कविता

नदी नदियां

संजय कुमार नेमा भोपाल (मध्य प्रदेश) ******************** पर्वतों से निकलकर प्रवाहिनी, अविरल बहती उछलती कूदती, अपने पथ को तलाशती। पतली सी मासूम सी जलधारा में पानी बचा शेष। घुटनों भर पानी से भिंगोकर हो जाते पार। अब हम हो रहे मायूस।। लुप्त हो रहे जंगल सूख रही वाटिकांए। अपना गंतव्य तलाशती, निर्झर बहती धाराओं‌ में अब शेष रह गई रेत। बिन पानी हम हो गए मायूस। जैसे ही अषाढ़, सावन, भादों, बरसता भर जाता उसका थाल। अब नदिया इतराती, मतवाली सी बदली उसकी चाल। दोनों किनारों का अब हरियाली की चुनरी से जलमाला का होता श्रंगार। वर्षा जल से भरकर, उछले कूदे मैदानों में आकर निर्झरिणी की बहती धारा। अंत समय में शीतलता से सब साथ, तनुजा ने लाकर सब कुछ समर्पित कर दिया सागर को। सब कुछ देकर भी तरनी, तटनी, ने अर्पित करके सबका जीवन साकार किया। अब ना करो मन-माना सदा नीर का दोहन। सदा न...
आज तू कहां…!
कविता

आज तू कहां…!

हरिदास बड़ोदे "हरिप्रेम" गंजबासौदा, विदिशा (मध्य प्रदेश) ******************** आज तू कहां..., आज तू कहां..., आज तू कहां..., कभी साथ थे..., हंसी थे..., जवां थे..., जिन्दगी के दो पल...। आज तू कहां...।। छोटी-छोटी बातें, ओ मुलाकातें, रूठना मनाना, फिर मुस्कुराना। ख्वाबों में मेरे, यूं चले आना, याद मैं करूं..., ना... जाने... तू... है... कहां...। आज तू कहां...।। सुना-सुना अंगना, है मेरे आना, आकर मुझको, फिर गले लगाना। गले लगाकर, यूं शर्माना, याद मैं करूं..., ना... जाने... तू... है... कहां...। आज तू कहां...।। बार-बार रहते, क्यों दूर हमसे, दूर होकर, क्यूं यादों में मेरे। आ जाए शर्म तो, फिर लौट आना, याद मैं करूं..., ना... जाने... तू... है...कहां...। आज तू कहां...।। सच-सच बोलूं, अब तेरे सहारे, सारी उमर हो, बस साथ हमारे। हर पल जीना, है संग तुम्हारे, याद मैं करूं.....
पहली बूंद बारिश की
कविता

पहली बूंद बारिश की

विवेक नीमा देवास (मध्य प्रदेश) ******************** बीती बेला उष्ण काल की ऋतु आ पहुँची फिर पावस की। मेघ मुदित हो नित लहराते वृष्टि का संदेशा लाते। तप्त धरा थी राह निहारे जग में जीवन वर्षा के सहारे। श्यामल बादल जल्दी आओ वसुधा की तुम क्षुधा मिटाओ। कूक उठी अब कोयल डाली हलधर बजा रहा है ताली। नदियाँ प्यासी सूखे सब सर आकर जल्दी कर दो तर। बारिश की पहली बूंद जो बरसे देखो धरती का कण-कण हरसे। परिचय : विवेक नीमा निवासी : देवास (मध्य प्रदेश) शिक्षा : बी कॉम, बी.ए, एम ए (जनसंचार), एम.ए. (हिंदी साहित्य), पी.जी.डी.एफ.एम घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय हिन्...
देश बदल भी सकता है
कविता

देश बदल भी सकता है

गौरव श्रीवास्तव अमावा (लखनऊ) ******************** सीमा पर तैनात खङे हैं, वीर सपूत जो भारत के। मृत्यु से वे भय न करते लिए तिरंगा हाथों में। तन मन धन से समर्पित है वे, भारत माँ के चरणों में। हर मानव हो सजग अगर, परिवेश बदल भी सकता है। वीरों की करें पूजा, तो देश बदल भी सकता है।। राजनीति की उपमा को, देश प्रेम से मत जोङो। वीरों के बलिदानों का सबूत मांगना अब छोङो। बलिदानो के कितने उदाहरण, ढूँढ ढूँढ कर लाऊं मैं। मर गया हो जिसकी आँख का पानी, उसे पुलवामा का दृश्य दिखाऊँ मैं। सीमा पर तैनात खङे, वीरों का जो सबूत मांगे। कानून अगर होता कर में, उनको फांसी दिलवाऊ मैं। आने वाली पीढी का वेश बदल भी सकता है। वीरों की करें पूजा, तो देश बदल भी सकता है।। इतिहास के स्वर्णिम पन्नों पर, वीरों का नाम लिखा जाए। हर मनुष्य के अधरों पर स्वदेश प्रेम ही छा जाए। गौरव चाहेगा धरती...
नियति
कविता

नियति

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** घोंटकर अपने अरमानों का गला। किसी और के अरमा सजाए हैं। वीरान कर किसी एक आंगन को दूजा अंकन सजाने आए हैं किन्तु हाय यह नियति स्वागत है यहां अपशब्दों की फुलझड़ी से फुल झाड़ियों का प्रकाश जिंदगी भर पर कचोटता है खुरचन सा खुरच-खुरच कर खुलते हैं अतीत के पन्ने। अपने ही नहीं गैरों के सामने किस्सा बयां होता है जहर का घूंट पीकर रह जाते हैं हम पर मरते नहीं, मरे कैसे क्योंकि अरमा मर चुके हैं फिर जहर का घूंट क्या करेगा मरी हुई जिंदगी के लिए। परिचय :- इंदौर निवासी मालती खलतकर आयु ६८ वर्ष है आपने हिंदी समाजशास्श्र में एम ए एल एलबी किया है आप हिंदी में कविता कहानी लेख गजल आदि लिखती हैं व आपकी रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मैं प्रकाशित होते हैं आप सन १९६८ से इंदौर के लेखक संघ रचना संघ से जुड़ीआप शासकीय सेवा से निमृत है...
बादल ने ली अंगड़ाई
कविता

बादल ने ली अंगड़ाई

प्रमेशदीप मानिकपुरी भोथीडीह, धमतरी (छतीसगढ़) ******************** उमड घुमड के उड़ते बादल ने ली अंगड़ाई। बरखा बहार आई धरती मे हरियाली छाई ।। बुझ गई प्यास इस धरा धाम की। अब की बरखा आई बड़े काम की॥ किसानो के होंठो पर मुस्कान आई। उमड़-घुमड़ के उड़ते बादल ने ली अंगड़ाई I मधुबन मे जैसे उमंग हे बहार है। लग रही अब निस दिन त्यौहार है।। प्रकृति ने ओढ़ ली हो जैसी हरितिम रजाई॥ उमड़-घुमड़ के उड़ते बादल ने ली अंगड़ाईII कल-कल करते झरने करते हो जैसे गान। प्राकृतिक सुंदरता देश का हो जैसे मान॥ रज-कण से धरा के सोंधी सोंधी खुशबु आई। उमड़- घूमड़ के उड़ते बादल ने ली अंगड़ाई II आओ इस मिट्टी की मादकता में खो जायें। चंदन तुल्य माटी का माथे तिलक लगाये॥ आओ बरखा का करें स्वागत जैसे पहुना आई। उमड़-घूमड़ के उड़ते बादल ने ली अंगड़ाईII बरखा बहार आई, धरती पर हरियाली छाई॥ परिच...
बरखा का रानी
कविता

बरखा का रानी

शत्रुहन सिंह कंवर चिसदा (जोंधरा) मस्तुरी ******************** आषाढ़ का महीना बारिश का बसेरा चमक उठी है बिजली की ताड़ बरस पड़ी है पानी की बुंदे खिल उठा है हरियाली सा आँगन महक उठी है मिट्टी का कटेरा मन मयूर नाच रहा है सुंदर सा पकेरा चहक रहा है भोर का चकेरा टपक पड़ी छाजन, छत घीरैना खिल गई है किसानों का चेहरा करने को लास भूमि भी मचलती आषाढ़ का महीना बारिश का बसेरा। परिचय :-  शत्रुहन सिंह कंवर निवासी :  चिसदा (जोंधरा) मस्तुरी घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं...
औरत
कविता

औरत

श्वेता अरोड़ा शाहदरा (दिल्ली) ******************** कभी-कभी लगता है कि औरत बंदिशो मे जकड़ी एक कैदी है, इच्छाओं को पूरा करने की इजाजत मांगती एक फरियादी है! रूढियो का दामन थामे एक बडी आबादी, गला उसकी इच्छाओ का घोंटती है, कभी जब वह अपने मन की करके, पुरानी विचारधारा के नियम तोडती है! कभी-कभी मन उसका भी चाहे, सुनना अपने अंतर्मन को, अपनी मरजी से जीने का, अपनी मरजी से ढकने को अपने तन को! अलग-अलग है नियम कायदे, स्त्री-पुरुष के लिए समाज मे, स्वछंद घूमे पुरूष हर पल, स्त्री के लिए अभी भी समाज मे लक्ष्मण रेखा बाकी है! सदा जीती आई औरो की खातिर, अपनी इच्छाओ का गला घोंटने की आदी है! इच्छाओ को पूरा करने की इजाजत मांगती फरियादी है! परिचय :-  श्‍वेता अरोड़ा निवासी : शाहदरा दिल्ली घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्...
निस्वार्थ कवि
कविता

निस्वार्थ कवि

सूरज कुमार दरभंगा (बिहार) ******************** शब्दों में जीने वालों की जीवन होती है अनूठी मां शारदे खुश रहती है रहती है मां लक्ष्मी रुठी शब्दों में वे जीते हैं, मुंह से कुछ ना कहते हैं अपनी व्यथा पर चुप रहकर जनता की व्यथा वे कहते हैं कभी-कभी अंदर से टूट शब्दों का साथ छोड़ देते हैं शब्द बिना वो कैसे जिये मन ही मन वे कहते हैं शब्दों से सबकी कहने वाले अपनी कुछ ना कहते हैं बस गरीबी में, अभावो में जीवन भर वे रहते हैं मां शारदे की आराधना करते शब्दों की वह साधना करते बिना धन के लालच की जीवन की वे कामना करते परिचय :-सूरज कुमार निवासी : सराय सत्तार खाँ, लहेरियासराय, दरभंगा (बिहार) शिक्षा : १०वीं घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां,...
उड़ने दो
कविता

उड़ने दो

राजीव डोगरा "विमल" कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) ******************** मत बांधो इन नन्हीं चिड़ियो को खुले नील गगन में उड़ने दो। नन्हे-नन्हे पंखों से सहसा इनको भी तो उड़ान भरने दो। लड़की हुई तो क्या हुआ इनको भी तो अपना नाम रोशन करने दो। खुद योनि का भेद कर पहला योन शोषण तुम ही करते हो। लड़की-लड़की बोल कर लिंग भेद भी पहले तुम ही करते हो। मत समझो इनको कमजोर इनके सीने में दुर्गा रहती है इनकी रगों में काली बहती है इनको भी सहसा हब्शियों का सीना फाड़ कर अपने अनुकूल जीने दो। परिचय :- राजीव डोगरा "विमल" निवासी - कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) सम्प्रति - भाषा अध्यापक गवर्नमेंट हाई स्कूल, ठाकुरद्वारा घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट...
अग्निपथ
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अग्निपथ

डॉ. अर्चना मिश्रा दिल्ली ******************** आज का ज़वान हुआ हैं बड़ा ही लाचार। सभ्यताओं ओर सरकारों के बीच झूला झूल रहा। निज मनुष्यता का सीना चीर रहा। इस नर विभीषिका का कौन हें ज़िम्मेदार। चारों ओर हैं दहशत छाई जाने अब क्या होगा आगे भाई। दशा ओर दिशा का बोध कराना होगा। सबको संज्ञान में आना होगा॥ आज का युवक वर्तमान ओर भविष्य के बीच हुआ लाचार। राष्ट्र बोध कराना होग़ा, अपनों का महत्व समझाना होग़ा॥ दंगाईयों ओर उपद्रियों को सबक़ सिखाना होगा। सबका हो कल्याण कुछ ऐसा कर दिखाना होगा। ख़ुशहाली छाएँ चहुँ और, अपनत्व बढ़े पुरजौर, कुछ ऐसा बिगुल बजाना होगा, फिर से राष्ट्रवाद का गाना गाना होगा। भटके हुए क़ो सही रास्ता दिखाना होग़ा। परिचय :-  डॉ. अर्चना मिश्रा निवासी : दिल्ली प्रकाशित रचनाएँ : अमर उजाला काव्य व साहित्य कुंज में रचनाएँ प्रकाशित। आपका रुझान आरम्भ से ही ...
आग
कविता

आग

डॉ. जयलक्ष्मी विनायक भोपाल (मध्य प्रदेश) ******************** जवानों में आग की धधक देश पर मर मिटने की ललक, योगी के अंतस का अनल सांसारिकता से अलग एक दिव्यता का ओजस, सूर्य के ताप में जल बन जाएं सब विमल, अग्नि की लौ में समर्पित सारे द्वेष और दुःख, ज्वालादेवी के प्रताप से जिसका मुख हो दव, कर्मठता व पवित्रता की द्युति हो आग से प्रखर, हवनकुंड की पावक से वायुमंडल महक, टुटे हुए दिल की चोटिल अग्नि सृजनात्मक बन प्रसिद्धि की और अग्रसर, उसी आग पर बनी रोटी करें उदर का शमन, विवाह में वर-वधू की साक्षी यह शिव स्वरुप हुताशन, महाराज हरिश्चंद्र का पुत्र रोहिताश्व अर्थात, सूरज की प्रथम किरण हमें दिखती सर्वप्रथम, जंगल में दावानल मानव निर्मित या कहिये प्राकृतिक, शिव के अपमान पर सति का पिता के घर हवन कुंड में दहन, अंत में क्षणभंगुर शरीर समर्पित इसी को वैश्वानर, हर मानव में ...