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पद्य

माँ की ममता
कविता

माँ की ममता

अनन्तराम चौबे "अनन्त" जबलपुर (म.प्र.) ******************** माँ की ममता बच्चों में होती है। माँ स्नेह प्यार दुलार की मूरत होती है। बहू आने पर क्यों ये रूप बदल जाता है। क्या सास द्वारा दिये गये वो दर्द याद आ जाते है। सास-बहू के झगड़े तो वैसे ही जग जाहिर हैं। कभी सास पर कभी बहू पर अत्याचार होते रहते हैं। कोई बहू दहेज न लाई जो माता-पिता की मजबूरी थी। भाई-बहिनों की पढाई और भी परिवार के खर्चो की मजबूरी थी। पति, सास, ससुर सभी से ऐसी बहू सताई जाती है। पहले तो प्रताणित होती है फिर तेल डाल जलाई जाती है। एक बहू वो भी होती है जो पति, सास, ससुर को पैसे देकर खरीद लेती है और सत्ता वही चलाती है। पूरे घर में फूट डालती है मनमानी हर पल करती है। बदला लेने सास ससुर को बृद्धाश्रम भिजवा देती है। माँ की ममता बहू भी चाहती जो माँ की ममता बच्चो में होती है। सास बहू के इन झगड़ो में अक्सर ये नौबत आती रहती है...
मौत का जो ख़ौफ़
कविता

मौत का जो ख़ौफ़

निज़ाम फतेहपुरी मदोकीपुर ज़िला-फतेहपुर (उत्तर प्रदेश) ******************** ग़ज़ल - २१२२ २१२२ २१२२ २१२ अरकान - फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलुन हर तरफ़ ये मौत का जो ख़ौफ़ है छाया यहाँ। ऐसा लगता है ख़ुदा नाराज़ है भाया यहाँ।। तेरा मुजरिम हूँ मगर अब माफ करदे ऐ ख़ुदा। ज़िंदगी में जीते जी धोका बहुत खाया यहाँ।। नाज़ था हमको बहुत विज्ञान पर अपने मगर। चाँद पर जाकर भी मरने से न बच पाया यहाँ।। कोई ऐसा है नहीं जो बच सके इस खेल से। मौत का सबको मज़ा चखना है जो आया यहाँ।। तेरा जो था छोड़ कर वो भी चला तुझको गया। रोता क्यों है अब तो खाली रह गई काया यहाँ।। जो नहीं डरते थे दुनिया मे किसी से भी कभी। आज अपना डर रहे वो देख कर साया यहाँ।। इस जहाँ का है निज़ाम आया है जो वो जाएगा। तेरा मेरा कुछ नहीं झूठी है सब माया यहाँ।। . परिचय :- निज़ाम फतेहपुरी निवासी : मदोकीपुर ज़िला-फतेहपुर (उत्तर प्रदेश) शपथ : मेरी कव...
माँ को नमन
कविता

माँ को नमन

माधुरी व्यास "नवपमा" इंदौर (म.प्र.) ******************** धन्य-धन्य मेरी प्यारी माँ, तू कितनी महान है... जन्म-पूर्व से मेरा वजूद, तुझ से अविराम है। सोते-जगते, हँसते-रोते, हर पल मेरा ध्यान है। धन्य-धन्य......... उज्ज्वल, अविरल छबि घर मे तेरी बसती है, जिससे हम सब बच्चों की, जगत में सारी हस्ती है। धन्य-धन्य........ सूरज सी अनवरत कर्मरत, सदा ही तू रहती है। धरती माँ के सारे सद्गुणों की, तुझमे जैसे बस्ती है। धन्य-धन्य....... मन्दिर-मस्जिद, काशी-काबा, माँ तू चारो धाम है, क्रोध में भी आशीष लुटाना, तेरा अनोखा काम है। धन्य-धन्य...... क्या लिखूं? दुआ से तेरी माँ! सब कितने सुखी है, इतना लिखकर अब मेरी, कलम अदब से झुकी है। धन्य-धन्य...... . परिचय :- माधुरी व्यास "नवपमा" निवासी - इंदौर म.प्र. सम्प्रति - शिक्षिका (हा.से. स्कूल में कार्यरत) शैक्षणिक योग्यता - डी.एड ,बी.एड, एम.फील (इतिहास...
मै भारत माँ का बेटा हूँ
कविता

मै भारत माँ का बेटा हूँ

रूपेश कुमार (चैनपुर बिहार) ******************** मै भारत माँ का बेटा हूँ, भारत माँ मेरी माता है, भारत माँ का लाल हूँ , भारत माँ का सोना हूँ, मै भारत माँ का बेटा हूँ, भारत माँ मेरी आँशु है , भारत माँ की छांव में, हर दिन सुकून पाता हूँ, मै माँ का बेटा हूँ, भारती की मै आशियाने मे, हर दिन-रात भटकता हूँ, भारत माँ आन-बान-शान है मेरी, मै भारत माँ का बेटा हूँ, भारत माँ को पुजता हु मै, भारत माँ की राह चलता हूँ मै, भारत माँ आरजू है मेरी, मै भारत माँ का बेटा हूँ, मेरी भारत माँ विश्व की सिरमौर है, जिसे सारी दुनिया मे पूजा जाता, जहाँ राम की पूजा होती, सभी अल्लाह को पुकारते है, गुरुनानक देव जन्म लिए, मै भारत माँ का बेटा हूँ, जहाँ जैन धर्म की उत्पति हुई, महावीर यहाँ पैदा हुये, बुद्ध ये जन्म भूमि हुई, मै भारत माँ का बेटा हूँ, जहाँ रफी साहब राम का गीत सुनाते, प्रेमचंद्र बच्चो को ईदगाह सुनाते,...
जीवन और कठिनाई
कविता

जीवन और कठिनाई

डॉ. विभाषा मिश्र कोटा, रायपुर (छ.ग.) ******************** जीवन और कठिनाइयों के बीच झूलती मेरी ज़िंदगी अब थक-सी गई है अल्पविराम लग जाये उस पर ऐसा कोई विकल्प चाहिए जिससे कुछ तो हल निकले इस जटिल समस्या का उलझती हुई मेरी ज़िंदगी हमेशा यह सोचकर सम्हल जाती है समय है अभी बहुत जीना है आगे और नित नए संघर्षों के बीच अपने आप को निखारना भी है फिर एक दिन ज़रूर आएगा जब मेरे सामने स्वर्णिम भविष्य के निर्माण के द्वार भी अपने आप खुलते जाएंगे। . परिचय :-  नाम - डॉ. विभाषा मिश्र जन्मतिथि : २३.०३.१९८२ पिता : डॉ.चित्तरंजन कर माता : श्रीमती माधुरी कर पति : श्री बजरंग मिश्र शिक्षा : एम.ए.(हिंदी),एम.एड., पी.जी.डिप्लोमा योग एवं दर्शनशास्त्र, पी-एच.डी. (हिंदी), राज्य पात्रता परीक्षा (सेट), पी.जी.डिप्लोमा छत्तीसगढ़ी भाषा एवं साहित्य (अध्ययनरत) सम्प्रति : अतिथि व्याख्याता (हिंदी/छत्तीसगढ़ी) पंडित रविशंक...
फुटपाथों को कहाँ झोंपड़ी
गीत

फुटपाथों को कहाँ झोंपड़ी

अख्तर अली शाह "अनन्त" नीमच ******************** बड़ी बड़ी बातें करलें पर, यह कड़वी सच्चाई है। फुटपाथों को कहाँ झोंपड़ी, एक यहाँ मिल पाई है।। जन कल्याण के खातिर हमने, बनती सरकारें देखी। वोट के खातिर नेताओं की, चलती मनुहारें देखी।। वादों से फिरते नेताओं, को देखा उसके पश्चात। और कभी देखा है उनको, करते जनता पर ही घात।। प्रश्न यही क्या आज करें हम, सम्मुख गहरी खाई है। फुटपाथों को कहाँ झोंपडी, एक यहाँ मिल पाई है।। माना हमने, देश बड़ा है, और हजारों मसले हैं। हर मसले का हल हो ऐसी, उगा रहे वो फसले हैं । लेकिन लोगों की सब माया, खाली पेट रहें कैसे। हमीं न होंगे तो क्या होगा, बोलो दर्द सहें कैसे।। इतसी जो बात न समझे, समझो वो हरजाई है। फुटपाथों को कहाँ झोंपड़ी, एक यहाँ मिल पाई है।। "अनन्त" तन भी नंगा है और, गरमी सरदी सहता है। गांधी का है देश देर तक, सदमें सहता रहता है।। आसमान को छत कहकर वो, ...
नयन
कविता

नयन

संजय वर्मा "दॄष्टि" मनावर (धार) ******************** नीर भरे नयन पलकों पर टिके रिश्तों का सच बिन बोले कहते यादों की बातें ठहर जाते है पग सुकून पाने को थके उम्र के पड़ाव निढाल हुए मन पूछ परख रास्ता भूलने अब लगी राहें इंतजार की रौशनी चकाचोंध धुंधलाए से नयन कहाँ खोजे आकृति जो हो गई अब दूरियों के बादलों में तारों के आँचल में निगाह से बहुत दूर जिसे लोग देखकर कहते-वो रहा चाँद . परिचय :- संजय वर्मा "दॄष्टि" पिता :- श्री शांतीलालजी वर्मा जन्म तिथि :- २ मई १९६२ (उज्जैन) शिक्षा :- आय टी आय व्यवसाय :- ड़ी एम (जल संसाधन विभाग) प्रकाशन :- देश - विदेश की विभिन्न पत्र - पत्रिकाओं में रचनाएँ व समाचार पत्रों में निरंतर पत्र और रचनाओं का प्रकाशन, प्रकाशित काव्य कृति "दरवाजे पर दस्तक", खट्टे मीठे रिश्ते उपन्यास कनाडा -अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर विश्व के ६५ रचनाकारों में लेखनीयता में सहभागिता भारत की और से...
आज नहीं तो कल संभव
कविता

आज नहीं तो कल संभव

विनोद सिंह गुर्जर महू (इंदौर) ******************** थाली, लोटे, शंख बजाये, और खुशी में नाचे हम। यज्ञ, हवन भी कर डाले, देव ऋचायें वांचे हम।। राम नाम के दीपक भी घर-घर सभी उजारे थे। देवों जैसे वो क्षण पाकर, सारे दुख विसारे थे।। विनाश काल विपरीते बुद्धि, मति कैसी बौराई है। अर्थतंत्र को पटरी लाने, व्यर्थ की सोच बनाई है। किसने तुमको रोका-टोका, वेतन हिस्सा दान किया। देश समूचा साथ तुम्हारे, किसने यहाँ अभिमान किया।। महिलाओं का छिपा हुआ धन, बच्चों ने गुल्लक फोड़ी है। आपदा के इस संकट में, नहीं कसर कोई छोड़ी है।। गर और जरूरत थी तुमको, आदेश का ढोल पिटा देते। खुद को गिरवी रख करके, ढेरों अर्थ जुटा देते।। किंतु नहीं ये करना था मंदिर भूले, मदिरा खोले। पवित्र घंटियां मूक रहीं, प्यालों के कातिल स्वर बोले।। मदिरालय सब खोल दिये। देवालय सारे बंद पड़े। कोरोना को आज हराने बुलंद हुए स्वर मंद पड़े।। बोतल और प्...
मुझे अफसोस रहेगा
कविता

मुझे अफसोस रहेगा

प्रीति शर्मा "असीम" सोलन हिमाचल प्रदेश ******************** मुझे .......अफसोस रहेगा। जिदंगीयों को, अंधविश्वासों से दूर ले जाता। प्यार से जिंदगी है। यह बात समझा पाता। विश्वास का, एक छोटा-सा ही सही। पर... एक घर बना पाता। समझ कर भी, न-समझी का खेद रहेगा। मुझे .......अफसोस रहेगा। अंधेरे दूर हो जायें, दिलदिमाग से भरमों के। अंधविश्वास की सोच से, निकाल कर, जो तर्क समझा पाता। चिराग तो बहुत जलायें। लेकिन........? चिरागों तले जो रहे अंधेरे, उन्हीं का भेद रहेगा। मुझे ......अफसोस रहेगा। जिदंगी ईश्वर की अमूल्य नेमत। नही दे सकता। किसी बाबा का....कोई धागा। हिम्मत से संवारो, अपने जीवन को। न खोना, बहमों में अपने , आज और कल को। भटकन को अपनी समेट कर। ईश्वर का सत्य-संवाद रहेगा। और तब तक वेद-विज्ञान रहेगा। फिर न कोई खेद और न भेद रहेगा। समझ जायें तो.... अच्छा है। फिर न कोई अफसोस रहेगा। . परिचय :- प्रीति ...
मुर्दे
कविता

मुर्दे

धैर्यशील येवले इंदौर (म.प्र.) ******************** कौन कहता है वे जी रहे थे सालो से आंख बंद कर सो रहे थे वे तो मुर्दा थे जो चल रहे थे जिंदगी का बोझ ढो रहे थे। किसने कत्ल किया उन्हें मत पूछ, ये सब झूठ है जिनको तुम जिंदा समझ रहे हो वे मुर्दे सिर्फ जिंदगी ढो रहे थे जिंदगी का बोझ ढो रहे थे। उनके जिस्म में खून था ही नही जो बह निकला वो पानी है पानी तो बहता रहता है पानी बहने पर कौन रोता है हम लखपति हो गए है, वे आसमान से खुश हो कह रहे थे जिंदगी का बोझ ढो रहे थे। अच्छा है चिर निद्रा में सो गये वे तो जागते भी सोए हुए थे एक जरूरत पड़ जाती थी उनसे वे पांच साल में एकबार तर्जनी पे सोते में अमिट शाही लगवाते थे वे तो मुर्दा थे जो चल रहे थे जिंदगी का बोझ ढो रहे थे। . परिचय :- धैर्यशील येवले जन्म : ३१ अगस्त १९६३ शिक्षा : एम कॉम सेवासदन महाविद्याल बुरहानपुर म. प्र. से सम्प्रति : १९८७ बैच के सीधी भर्ती...
मैं नारी हूँ
कविता

मैं नारी हूँ

पूनम आदित्य इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** यह कविता आकाशवाणी इंदौर में प्रसारित हो चुकी है एवं कुछ यूट्यूब चैनलों पर भी उपलब्ध है। २००८ में जीवन मंच पुस्तक जो की काव्य संग्रह है उसमें भी प्रकाशित हो चुकी है। मैं चिन्तन से परे, सुशोभित चिन्तनीय नारी हूँ मैं यौवना मधु कलश सी शोभित सुकुमारी हूँ मैं मृदु भावी, कोमल आगंना कली न्यारी हूँ मैं तम हरिणी, तीमिर निवारणकारी हूँ मैं चिन्तन से परे, सुशोभित चिन्तनीय नारी हूँ मैं चिन्तन से परे, सुशोभित चिन्तनीय नारी हूँ मैं सर्वदा कलुषित यम विजयकारी हूँ मैं आतूरता से भरी मृगनैनी नारी हूँ, मैं सर्वस्व न्यौछावर करने वाली अधिकारी हूँ मैं चिन्तन से परे, सुशोभित चिन्तनीय नारी हूँ मैं चिन्तन से परे, सुशोभित चिन्तनीय नारी हूँ मैं कमला, कमलेश्वरी, जीवित प्यारी हूँ मैं शक्तिस्वरूपा मुण्ड मालाधारी हूँ मैं अलंकार, निरअलंकृत नारी हूँ मैं चिन्तन स...
जिन्दगी के पन्ने
कविता

जिन्दगी के पन्ने

शरद सिंह "शरद" लखनऊ ******************** तन्हा बैठी देख रही थी, अन्तस्तल की पुस्तक को, हर पन्ना उल्टा पल्टा, मन की तसल्ली करने को, कुछ पन्नों मे सूनापन था, कुछ मे छाई रंगीनी थी, पर कुछ पन्ने सूने क्यों हैं?, क्या इनकी कोई कहानी है?, क्या इनको मिला न कोई रंग? वह रंग, जो रहता इनके संग, इनमे भी बन जाती कोई तस्वीर सुहानी क्यों न बनी, क्यों सूने हैं यह, पूछा मैने उन पन्नों से, मूक रहे वह पन्ने, बोल न सके वह कुछ मुॅह से, आगे के पन्नों पर बढी़ उत्सुकता वश पर यह क्या? आगे तो हर पन्ना सूना है, एक दो चार दस हर पन्ना तो सूना है, पल्टा हर पन्ना यही सोचकर, शायद कुछ होगा आगे के पन्ने पर, हाॅ आगे कुछ था, कुछ बजी थी शहनाईयाॅ, थिरके थे कदम मिली थी बधाईयाँ, फिर छा गया अन्धकार, आया तूफान करता हा हा कार, उड़ गये उन पन्नों के सारे रंग, फिर थी सूनी जिन्दगी की किताब, जैसे किसी मतवाली वाला के, टूट चुक...
यक्ष प्रश्न
कविता

यक्ष प्रश्न

निर्मल कुमार पीरिया इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** चित बढ़ा उद्वेग हैं, सोच कर व्याकुल हैं... संवेदना को कर परे, भाग रहा इंसान है... धाम है ना विश्राम है, ना तृष्णा पर लगाम है... ओर है ना छोर है, बस!निरन्तर दौड़ है... अंत है! वो जानता,पर मान कर ना मानता... इन्द्रियों के वशीभूत, बस! दौड़ रहा इंसान है... सिन्धु की प्यास लिये, क्षितिज की आस लिये... मरीचिका के जाल में उलझा हर नादान है... क्यों और किसलिये, यक्ष प्रश्न हैं खड़ा... अबूझ हर सवाल है, बस!वक्त ही बलवान हैं... . परिचय :- निर्मल कुमार पीरिया शिक्षा : बी.एस. एम्.ए सम्प्रति : मैनेजर कमर्शियल व्हीकल लि. निवासी : इंदौर, (म.प्र.) शपथ : मेरी कविताएँ और गजल पूर्णतः मौलिक, स्वरचित और अप्रकाशित हैं आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, हिंदी रक्षक मंच पर अपन...
आज मैंने
कविता

आज मैंने

मनीषा शर्मा इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** आज मैंने यह क्या खूब नजारा देखा, पहली बार साथ में परिवार सारा देखा। सभी को है फुर्सत कोई ना व्यस्त है , एक दूसरे के साथ सब बड़े मस्त हैं। हंसते पापा भी बड़ी जोर जोर से हैं , खामोशी के बीच भी बड़े शोर शोर से हैं। मम्मी को भी कैरम खेलना खूब भाता, दादी को भी तो ताश खेलना है आता। भैया भी करते हैं ढेर सारी बातें , बस कभी-कभी मुझे बड़ा सताते। बस एक बात को लेकर है मन बड़ा रोता, काश यह सब डर के साए में ना हो रहा होता। . परिचय :-  मनीषा शर्मा जन्म : २८/८/१९८२ शिक्षा : बी.कॉम., एम. ऐ. लेखन शुरुआत वर्ष : लेखन में रुचि बचपन से है लेखन विधा : कविता ,व्यंग्य ,कहानी समसामयिक लेखन। व्यवसाय : आकाशवाणी केंद्र इंदौर उद्घोषक पता : इंदौर म.प्र. आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशि...
माँ
कविता

माँ

रंजना फतेपुरकर इंदौर (म.प्र.) ******************** माँ, देखा है हर सुबह तुम्हें तुलसी के चौरे पर मस्तक झुकाए हुए जब भी हथेलियां उठीं दुआओं के लिए तुम्हारी पलकों पर हमारे ही सपने सजे होते हैं जब भी आँचल फैलाया मन्नतों के लिए तुम्हारे होंठों पर हमारी ही खुशियों के फूल खिले होते हैं जब जिंदगी अंधेरों में घिरने लगती है खामिशियों से भरी रातें मंझधार में डुबोने लगती हैं माँ, तुम रोशन करती हो अंधेरों को चाँद का दीपक जलाए हुए माँ, देखा है हर सुबह तुम्हें तुलसी के चौरे पर मस्तक झुकाए हुए . परिचय :- नाम : रंजना फतेपुरकर शिक्षा : एम ए हिंदी साहित्य जन्म : २९ दिसंबर निवास : इंदौर (म.प्र.) प्रकाशित पुस्तकें ११ हिंदी रक्षक मंच इंदौर (hindirakshak.com) द्वारा हिन्दी रक्षक २०२० राष्ट्रीय सम्मान सहित ४७ सम्मान पुरस्कार ३५ दूरदर्शन, आकाशवाणी इंदौर, चायना रेडियो, बीजिंग से रचनाएं प्रसारित दे...
राजा बेटा
ग़ज़ल

राजा बेटा

प्रेम प्रकाश चौबे "प्रेम" विदिशा म.प्र. ******************** राजा बेटा, खूब कमा रये। पइसा कुजने कितै बिला रये। "मिडिल क्लास" की है जा रीती, एक कमा रऔ, सब घर खा रये। प्राइवेट में, पढ़ रये बच्चे, रही कसर, सो कोचिंग जा रये। गाड़ी, "मोबाइल", पोसाकें, नये-नये खर्चा, रोज सता रये। "प्रेम" रोत हैं, भीतर-भीतर, हम जानत कैसें, मुस्का रये? कुजने कितै=पता क्या ? बिला रये=समा जाना . परिचय :-  प्रेम प्रकाश चौबे साहित्यिक उपनाम - "प्रेम" पिता का नाम - स्व. श्री बृज भूषण चौबे जन्म -  ४ अक्टूबर १९६४ जन्म स्थान - कुरवाई जिला विदिशा म.प्र. शिक्षा - एम.ए. (संस्कृत) बी.यु., भोपाल प्रकाशित पुस्तकें - १ - "पूछा बिटिया ने" आस्था प्रकाशन, भोपाल  २ - "ढाई आखर प्रेम के" रजनी  प्रकाशन, दिल्ली से अन्य प्रकाशन - अक्षर शिल्पी, झुनझुना, समग्र दृष्टि, बुंदेली बसन्त, अभिनव प्रयास, समा...
तुम
कविता

तुम

सुरेखा सुनील दत्त शर्मा बेगम बाग (मेरठ) ********************** नींद से भरी आंखों की बोझिल सी पलकों पर बिखरी शबनम की बूंदे सुर्ख होठों पर मदहोश करने वाली कशिश इश्क का एक एक लम्हा और हर लम्हों में तुम.... ख्वाबों में तुम हकीकत में तुम आसमान के चांद में भी तुम मेरे दिल की धड़कन में तुम जिंदगी की तमाम खुशियों में तुम क्योंकि हर खुशी में हो तुम बस तुम ही तुम.... नींदों से भरी आंखों की बोझिल सी पलकों पर.... . परिचय :-  सुरेखा "सुनील "दत्त शर्मा साहित्यिक : उपनाम नेहा पंडित जन्मतिथि : ३१ अगस्त जन्म स्थान : मथुरा निवासी : बेगम बाग मेरठ साहित्य लेखन विधाएं : स्वतंत्र लेखन, कहानी, कविता, शायरी, उपन्यास प्रकाशित साहित्य : जिनमें कहानी और रचनाएं प्रकाशित हुई है :- पर्यावरण प्रहरी मेरठ, हिमालिनी नेपाल,हिंदी रक्षक मंच (hindirakshak.com) इंदौर, कवि कुंभ देहरादून, सौरभ मेरठ, काव्य तरंगिणी मुंबई, दैनिक ...
मातृभूमि
कविता

मातृभूमि

रीना सिंह गहरवार रीवा (म.प्र.) ******************** है धन्य धरा ये मातृभूमि जिसके आंचल मे है विश्व पला। तृण-तृण नग-पग विशाल धरा, शीतल भू-जल जग जीत रहा, सागर पग पृच्छाल रहा, नग शीष धरा मुकुट पहनाय रहा, षड़ ऋतु शोभित गीतों की गुंजान यहाँ, रंग-बिरंगे पुष्पों से शोभित है ऋतुराज यहाँ, गंगा-यमुना की निर्मल धार यहाँ, ब्रहमपुत्र की झंकार यहाँ, इसकी रक्षा करने को, हो रहे नित नए आविष्कार यहाँ, कोटि-कोटि कर प्रणाम इसे, तन पुलकित मन हर्षाय रहा। है धन्य धरा ये मातृभूमि जिसके आंचल में है विश्व पला। . परिचय :- रीना सिंह गहरवार पिता - अभयराज सिंह माता - निशा सिंह निवासी - नेहरू नगर रीवा शिक्षा - डी सी ए, कम्प्यूटर एप्लिकेशन, बि. ए., एम.ए.हिन्दी साहित्य, पी.एच डी हिन्दी साहित्य अध्ययनरत आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते...
मै हूं
कविता

मै हूं

मित्रा शर्मा महू - इंदौर ******************** मै हूं तेरे बिना कुछ नहीं हूं मै, तेरे पसीने की कर्जदार हूं मैं। क्या लौटा पाऊंगा तेरी वफादारी का कीमत, कभी कर पाऊंगा तेरे भूखे नंगे बच्चो पर रहमत। नहीं हूं काबिल तुझ से आंख मिलाने के डर है मुझे मुझे मेरे हाथ खाली रह जाने के। छोड़ दिया अब तुझे सड़क पे मरने को, कुछ बचा नहीं तेरे पास पेट भरने को। खुदगर्ज इंसान हूं यह फितरत है मेरी, तेरे पसीने का खाकर तुझ से उलझने की ताकत है मेरी। बख्श दे प्राण दाता तेरे रहमों कर्म पर, जिंदा हूं इठलाता हूं अपने गुमान पर। . परिचय :- मित्रा शर्मा - महू (मूल निवासी नेपाल) आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, हिंदी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, हिंदी में टाईप करके हमे...
पावन पानी आंसू भी
कविता

पावन पानी आंसू भी

रशीद अहमद शेख 'रशीद' इंदौर म.प्र. ******************** कहते हैं गंभीर कहानी आँसू भी। कहलाते हैं पावन पानी आँसू भी! आँखों को छलकाते आँसू ! पलकों को नहलाते आँसू! उर जब-जब होता है भारी, उसे क्षणिक सहलाते आँसू! करते बातें याद पुरानी ऑंसू भी। कहलाते हैं पावन पानी ऑंसू भी। समाचार दुखदाई आता! अत्याचार हृदय पर ढाता! छिन्न-भिन्न हो जाता आनंद, सुख-सुविधा का भवन ढहाता! करते नीरस शाम सुहानी आँसू भी। कहलाते हैं पावन पानी ऑंसू भी! कभी-कभी आँखों तक आते! पतित नहीं होते रुक जाते! मुख स्मित कर अंतर्मन की, वापस जाकर आग बुझाते! कभी-कभी होते हैं ज्ञानी आँसू भी। कहलाते हैं पावन पानी ऑंसू भी! . परिचय -  रशीद अहमद शेख 'रशीद' साहित्यिक उपनाम ~ ‘रशीद’ जन्मतिथि~ ०१/०४/१९५१ जन्म स्थान ~ महू ज़िला इन्दौर (म•प्र•) भाषा ज्ञान ~ हिन्दी, अंग्रेज़ी, उर्दू, संस्कृत शिक्षा ~ एम• ए• (हिन्दी और अंग्रेज़ी साहित्य), बी...
विषधर विषहीन श्रेष्ठ नहीं होता
मुक्तक

विषधर विषहीन श्रेष्ठ नहीं होता

भारत भूषण पाठक देवांश धौनी (झारखंड) ******************** मुक्तक लेखन का प्रयत्न वीर रस में कुल मात्रा भार १६ रखने का प्रयत्न विधान:-१,२ व ४थी पंक्ति समतुकान्त,३री अतुकान्त:- मुक्तक १:- विषधर विषहीन श्रेष्ठ नहीं होता। नखहीन भला क्या सिंह भी होता। रहे गरल जबतक शेष विषधर में। फुँफकार तभी तो वो डरा पाता। मुक्तक २ः- हे मेरी सुताओं विषधर बनो। नखयुक्त सिंह अब भयंकर बनो। सरलता अब यहाँ आवश्यक नहीं। महाभयंकर तुम प्रलयंकर बनो। मुक्तक४:- स्मरण रहे अब कृष्ण नहीं आते। पापियों से आज सभी भय खाते। आज पूजे जाएं शैतान यहाँ। देख व्यभिचार प्रभु आज शर्माते। मुक्तक५:- उठो चूड़ी छोड़ तुम कतार धरो। स्वयं का कष्ट आज तुम स्वयं हरो। हे वीर सुताओं तोड़ दो चुप्पी। वार सहो नहीं तुम अब वार करो। . परिचय :- भारत भूषण पाठक 'देवांश' लेखनी नाम - तुच्छ कवि 'भारत ' निवासी - ग्राम पो०-धौनी (शुम्भेश्वर नाथ) जिला द...
संगीत-महिमा
कविता

संगीत-महिमा

कु. हर्षिता राव चंदू खेड़ी भोपाल म.प्र. ******************** जब तुम बजाते हो कोई गीत, मेरे हृदय का बन जाता है वो मधुर संगीत... सरगम के सुर बस जाते मन में, ऐसे सहला जाते हैं तेरे गीत... कभी सुर सितार में बहते हैं, गुनगुनाने लगती है मेरी प्रीत... सुख-दुख के सारे मौसम, तेरे गीतों में सजते हैं... यह साज़ नहीं है तारों में, यह साज़ दिलों से बजते हैं... . परिचय : कु. हर्षिता राव पिता - श्री रमेश राव पेंटर (प्रेरणा स्त्रोत) निवासी - चंदू खेड़ी भोपाल म.प्र. शिक्षा - एम.ए.हिंदी साहित्य में अध्ययनरत, राष्ट्रीय सेवा योजना (एन.एस.एस) की स्वयं सेविका एवं सामाजिक कार्यकर्ता। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, हिंदी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, हिंदी में ...
कोरोना से भयमुक्त रहे
कविता

कोरोना से भयमुक्त रहे

जितेन्द्र रावत हमदर्द मलिहाबाद लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** मत डर भयरहित साहस दिखा। खुद को प्रचण्ड हीम्मत सीखा। कोरोना का रुप बड़ा विकराल है। तेरा धैर्य, विश्वास इसका काल है। चतुर है वह भेद भाव नही करता। अमीर गरीब किसी से नही डरता। उस से डरो नही उसे ही भेद देंगे। बस कुछ दिन और उसे खेद देंगे। समय बलवान समय रुख बदलेगा। एक दिन कोरोना देश से निकेलगा। हौसला रखो परिस्थियाँ प्रतिकूल है। हराने की हम में ताकत अनुकूल है। ना जाने कितनी जिंदगी खा गया है। कितनो को बिना कन्धे के रखा गया है। मात नही खाई कोरोना से जंग जारी है। धरती का ईश्वर कर चुका पूरी तैयारी है। साथ देना होगा कोरोना योद्धाओं का। यह समय नही रहा प्रतिस्पर्धाओं का। सक्रिय रखे मन तन और उम्मीदों को। बेजुबान भूखे जीवित रखे परिदों को। समय शेष रहा जीत हमारी पक्की है। घर पर सतर्क रहें, देश की तरक्की है। बने हमदर्द ...
प्रकृति
कविता

प्रकृति

सौरभ कुमार ठाकुर मुजफ्फरपुर, बिहार ************************ जहाँ जाने के बाद वापस आने का मन ना करे जितना भी घूम लो वहाँ पर कभी मन ना भरे हरियाली, व स्वच्छ हवा भरमार रहती है जहाँ सच में वही तो असली प्रकृति कहलाती है। जहाँ पर चलती गाड़ियों की शोर नही गूंजती जिस जगह की हवा कभी प्रदूषित नही रहती सारे जानवरों की आवाजें सदा गूंजती है जहाँ सच में वही तो असली प्रकृति कहलाती है। जहाँ नदियों व झड़नों का पानी पिया जाता है जहाँ जानवरों के बच्चों के साथ खेला जाता है बिना डर के जानवर विचरण करते हैं जहाँ सच में वही तो असली प्रकृति कहलाती है। पहाड़ जहाँ सदा शोभा बढ़ाते हैं धरती की नदियाँ जहाँ सदा शीतल करती हैं मिट्टी को वातावरण अपने आप में संतुलित रहता है जहाँ सच में वही तो असली प्रकृति कहलाती है। . परिचय :- नाम- सौरभ कुमार ठाकुर पिता - राम विनोद ठाकुर माता - कामिनी देवी पता - रतन...
चिंतन
ग़ज़ल

चिंतन

धीरेन्द्र कुमार जोशी कोदरिया, महू जिला इंदौर म.प्र. ******************** अतीत के चिंतन को टाल। प्याज है छिलके मत निकाल। जवाब मिले ये जरूरी नहीं, छोड़ ना, रहने दे सवाल। पत्ता पत्ता बिखरी ये ज़िन्दगी, जितना हो सके इसे सम्हाल। कोशिश कर पूरी जान लड़ा, फिर देख कुदरत का कमाल। धरा - धूल मस्तक चढ़ बैठेगी, किसी की इज्ज़त यूं न उछाल। जब मंजिल निकट हो तेरी, बहक न जाएं, कदम सम्हाल। खुशबू फैले जो प्यार की, जिन्दगी कुमकुम अबीर गुलाल। . परिचय :- धीरेन्द्र कुमार जोशी जन्मतिथि ~ १५/०७/१९६२ जन्म स्थान ~ महू ज़िला इन्दौर (म.प्र.) भाषा ज्ञान ~ हिन्दी, अंग्रेज़ी, उर्दू, संस्कृत शिक्षा ~ एम. एससी.एम. एड. कार्यक्षेत्र ~ व्याख्याता सामाजिक गतिविधि ~ मार्गदर्शन और प्रेरणा, सामाजिक कुरीतियों और अंधविश्वास के प्रति जन जागरण। वैज्ञानिक चेतना बढ़ाना। लेखन विधा ~ कविता, गीत, ग़ज़ल, मुक्तक, दोहे...