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पद्य

बंद पिंजरा
कविता

बंद पिंजरा

राजेश चौहान इंदौर मध्य प्रदेश ******************** मन दुखी हैं और तन्हाईयों में हूं कैद क्योंकि मैं बंद पिंजरे में नहीं रह सकता नित खुले आसमान में विचरण हैं मेरा काम क्योंकि मैं बंद पिंजरे में नहीं रह सकता वृक्षों और पेड़ों पर हैं मेरा प्यारा सा धाम क्योंकि मैं बंद पिंजरे में नहीं रह सकता सांझ-सवेरे मधुर चहकता मेरा गान क्योंकि मैं बंद पिंजरे में नहीं रह सकता चुन-चुन कर तिनकों से भी नीड़ न बनाने से दुखी हूं क्योंकि मैं बंद पिंजरे में नहीं रह सकता मुझे इस "पिंजरे में से आजाद" कर दो क्योंकि मैं बंद पिंजरे में नहीं रह सकता परिचय :- राजेश चौहान (शिक्षक) निवासी : इंदौर मध्य प्रदेश घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते ह...
श्री राम चालीसा
दोहा

श्री राम चालीसा

  डाॅ. दशरथ मसानिया आगर  मालवा म.प्र. ******************* रघुकुल वंश शिरोमणी, मनुज राम अवतार। मर्यादा पुरुषोत्तमा, कहत है कवि विचार।। जै जै जै प्रभु जय श्रीरामा। हनुमत सेवक सीता वामा।।१ लछमन भरत शत्रुघन भ्राता। मां कौशल्या दशरथ ताता।२ चैत शुक्ल नवमी सुखदाई। दिवस मध्य जन्में रघुराई।।३ नगर अवध में बजी बधाई। नर नारी गावे हरषाई।।४ दशरथ कौशल्या के प्राणा। करुणा के निधि जनकल्याणा।।५ श्याम शरीरा नयन विशाला। कांधे धनुष गले में माला।।६ काक भुसुंड दरश को आते। शिव भी जिनकी महिमा गाते।।७ विश्वामित्र से शिक्षा पाई। गुरु वशिष्ठ पूजे रघुराई।।८ बालपने में जग्य रखवाये। ताड़क बाहू मार गिराये।।९ गौतम नारी तुमने तारी। चरण धूल की महिमा भारी।।१० मुनि के संग जनकपुर जाई। शिव का धनुष भंग रघुराई।।११ सीता के संग ब्याह रचाया। जनक सुनेना के मन भाया।।१२ मिथिला नगरी दरशन प्यारे। नर नारी सब भये सुखारे।।...
बुढ़ापा
कविता

बुढ़ापा

संजय जैन मुंबई ******************** न जीत हूँ न मरता हूँ न ही कोई काम का हूँ। बोझ बन कर उनके घर में पड़ा रहता हूँ। हर आते जाते पर नजर थोड़ी रखता हूँ। पर कह नही सकता कुछ भी घरवालो को। और अपनी बेबसी पर खुद ही हंसता रहता हूँ।। बहुत जुल्म ढया है हमने लगता उनकी नजरो में। सब कुछ अपना लूटकर बनाया उच्चाधिकारी हमने। तभी तो भाग रही दुनियाँ उनके आगे पीछे। और हम हो गये उनको एक बेगानो की तरह। गुनाह यही हमारा है की उनकी खातिर छोड़े रिश्तेनाते। इसलिए अब अपनी बेबसी पर खुद ही हंस रहा हूँ।। खुदको सीमित कर लिया था अपने बच्चों की खातिर। और तोड़ दिया थे रिश्तेनाते सब अपनो से। पर किया था जिनकी खातिर वो ही छोड़ दिये हमको। पड़ा हुआ हूँ उनकी घर में एक अंजान की तरह से। और भोग रहा हूँ अब अपनी करनी के फलों को। तभी तो खुद हंस रहा हूँ अपनी बेबसी पर लोगो।। न जीत हूँ न मरता हूँ न ही कोई काम का हूँ। बोझ बन कर उनके घर में प...
फौजी का दर्द
कविता

फौजी का दर्द

संजय सिंह मीणा करौली (राजस्थान) ********************                  (गोली लगने के बाद) गोली लगते ही वीरा को माता की याद सताई है बीवी का प्यार भी याद आया बच्चे की हंसी खुदाई है भाई की यादों में भाई जब अश्क बहाने लगता है बहना प्यारी सी चिडिया है ये सोच सोच के रोता है। उड गया पंक्षी लुट गया मेला कुछ देर सांस बस अटकी है अपशकुन हो गया बीवी को जब फूटी कोरी मटकी है माता की आंखों का तारा पलभर में छलनी कर डाला बापू का पत्थर जैसा दिल भी आंशू रूपी भर डाला। जब खबर गांव मे पहुंची है वीरा ने देह त्यागी है माता बहना बेहोश गिरी बवी भी बाहर भागी है कहाँ गया छोड के ओ साथी तूने धोका मुझसे कर डाला जीना मरना था साथ अकेले केसे छोड चला जारा। बापू की छाती फ़टी निकल गई गंगा रूपी जलधारा बहना चिल्लाई ओ भैया अब तुने ये क्या कर डाला माता जी पागल हुई पडी बेटा बेटा चिल्लाती है छोटी सी अनजानी बच्ची पापा-पापा बिलखाती ...
देश मेरा प्यारा
कविता

देश मेरा प्यारा

कार्तिक शर्मा मुरडावा, पाली (राजस्थान) ******************** देश मेरा प्यारा, दुनिया से न्यारा धरती पे जैसे स्वर्ग उतारा।। ऊँचे पहाड़ों में फूलों की घाटी। प्यारे पठारों में खनिजों की बाटी।। हरे-भरे खेतों में सरगम बजाएँ। नदियों के पानी में चाहूँ मैं तरना।। मन ये गगन में उड़े रे। ऐसे ये जी से जुड़े रे।। दूर मेरा देश ये गाँवों में बसता। मुझको पुकारे है हर एक रस्ता।। पैठा पवन मेरे पाँव में। आना जी तू भी मेरे गाँव में।। देश मेरा प्यारा, दुनिया से न्यारा।। परिचय : कार्तिक शर्मा पिता : शुक्राचार्य शर्मा शिक्षा : बी.एड, एम.ए. निवासी : मुरडावा पाली राजस्थान घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय हिंदी रक्षक म...
में इतिहास हूं
कविता

में इतिहास हूं

रमेश चौधरी पाली (राजस्थान) ******************** मुझे ऐसे ही नहीं याद किया जाता, में इतिहास हूं। मैने शूरवीरों के रक्त से, सिचा है इस इतिहास को। में अफवाहों का पुंज नहीं, सत्य घटनाओं का कुंज हूं। मुझे ऐसे ही नहीं याद किया जाता, में इतिहास हूं। में उन पड़ावों ओर कोरवो की गाथा का बखान करता हूं। में उन यशोदा के लाल की गीता का बखान करता हूं। मुझे ऐसे ही नहीं याद किया जाता, में इतिहास हूं। मैने महान शासक चंद्रगुप्त मौर्य को, राज सिहासन पर बैठते हुए देखा है। मैने सिकंदर को, शुरवीरो की धरती से, वापस लौटते हुए देखा है। मुझे ऐसे ही नहीं याद किया जाता, मे इतिहास हूं। मैने मेवाड़ के शेर से, अकबर को धूल चाटते हुए देखा है। मैने रानी पद्मिनी की चतुराई से, अलाउद्दीन खिलजी की मूर्खता को देखा है। मुझे ऐसे ही नहीं किया जाता, में इतिहास हूं। आजाद की गोली से, गौरो को डरते हुए देखा है। मैने गांधीजी की लाठी...
परिंदे
कविता

परिंदे

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उ.प्र.) ******************** उड़ने दो मासूम परिंदो को खुले आसमां में फैलाने दो अपने पंख इन्हें विशाल गगन में इनके कर्म से है बुलंदी इस जहान की ईश्वर भी सिर झुकाए इनके दर पर फड़फड़ाने दो इनके पंख स्वछंद हवाओं में छू लेने दो आकाश की बुलंदियों को इन्हीं से है रोशन हर घर का अंधेरा मत तोड़ो इनकी ऊंचाइयों की डोर मत मसलों इन्हें, मत दफन करो, सुरों के सारे संगीत बसते हैं इनकी चहचहाट में शून्य रह जाएगा ये जहान इनके बगैर क्योंकि,ये "बेटियां" हैं, जिनसे है रोशन जहां सारा। परिचय :- श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी पति : श्री राकेश कुमार चतुर्वेदी जन्म : २७ जुलाई १९६५ वाराणसी शिक्षा : एम. ए.,एम.फिल – समाजशास्त्र,पी.जी.डिप्लोमा (मानवाधिकार) निवासी : लखनऊ (उ.प्र.) विशेष : साहित्यिक पुस्तकें पढ़ने के शौक ने लेखन की प्रेरणा दी और विगत ६-७ वर्षों ...
गजानन सुनलो हमारी पुकार
कविता

गजानन सुनलो हमारी पुकार

आशा जाकड़ इंदौर म.प्र. ******************** गजानन सुनलो हमारी पुकार। गजानन लाओ खुशियां अपार।। विघ्नों के हर्ता हो कष्टों के हर्ता हो मंगलदायक तुम सुखों के कर्ता हो भर दो समृद्धि का भंडार गजानन लाओ खुशियांँ अपार।। कोई काम शुरू हम करते पहले नाम तुम्हारा ही लेते हर संकट करे निवार। गजानन लाओ खुशियाँ अपार।। अज्ञान का छाया है अंधेरा कर सकते हो तुम्ही उजेरा ज्ञान की रोशनी अपार गजानन लाओ खुशियाँ अपार।। विपदाओं का लगा है डेरा कोरोना का है रूप घनेरा। कृपा की कर दो बौछार। गजानन लाओ.खुशियां अपार। कोरोना को तुम दूर भगाओ कष्टों से तुम मुक्ति दिलाओ करो मानवता का उद्धार गजानन लाओ खुशियां अपार गजानन सुन लो हमारी पुकार।। परिचय :- आशा जाकड़ (शिक्षिका, साहित्यकार एवं समाजसेविका) शिक्षा - एम.ए. हिन्दी समाज शास्त्र बी.एड. जन्म स्थान - शिकोहाबाद (आगरा) निवासी - इंदौर म.प्र....
ताल्लुकात
ग़ज़ल

ताल्लुकात

मनमोहन पालीवाल कांकरोली, (राजस्थान) ******************** किस रिवायात से ताल्लुकात रखते हो सुबूं से मय से पीने से ताल्लुकात रखते हो बे वक्त कोई किसी को दखल नहीं देता यारो हर बात हुजूर की पीने से ताल्लुकात रखते हो न जमाने का ख़ौफ़ न नज़र से लेना कोई फ़कत तुम पीने से ताल्लुकात रखते हो तुम होश मे हो या किसी मस्ती के आलम मे करीब हे कोई पीने से ताल्लुकात रखते हो उन्हे हमें गिराने की ज़िद हे तो घूंघट उठा दूं शिकस्त-ए-मोहन पीने से ताल्लुकात रखते हो शब्दार्थ - रिवायात - घराना, खानदान सुबूं - जाम परिचय :- मनमोहन पालीवाल पिता : नारायण लालजी जन्म : २७ मई १९६५ निवासी : कांकरोली, तह.- राजसमंद राजस्थान सम्प्रति : प्राध्यापक घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिंदी रक्षक म...
राणा का शौर्य
कविता

राणा का शौर्य

धीरेन्द्र पांचाल वाराणसी, (उत्तर प्रदेश) ******************** अकबर हुआ दुलारों में। हैं राणा खड़े क़तारों में। हम पढ़ते हैं बाज़ारों में। कुछ बिके हुए अख़बारों में। ये जाहिल हमें सिखाते हैं। शक्ति का भान कराते हैं। अकबर महान बताते हैं। राणा का शौर्य छिपाते हैं। कुछ मातृभूमि कोहिनूर हुए। जो मेवाड़ी शमशिर हुए। वो रण में जब गम्भीर हुए। तब धरा तुष्ट बलबीर हुए। अरियों की सेना काँप गई। जब राणा शक्ति भाँप गई। भाले की ताक़त नाप गई। अरि गर्दन भी तब हाँफ गई। कुछ दो धारी तलवारों में। था चेतक उन हथियारों में। वो जलता था प्रतिकारों में। उन मेवाड़ी अधिकारों में। हाथ जोड़ यमदुत खड़ा था। दृश्य देख अभिभूत पड़ा था। मेवाड़ी बन ढाल लड़ा था। चेतक बनकर काल खड़ा था। राजपूताना शमशिरों का, जब पूरा प्रतिकार हुआ। तब तब भारत की डेहरी पर, भगवा का अधिकार हुआ। परिचय :- धीरेन्द्र पांचाल निवासी : चन्दौली, वार...
ऐ दर्द तेरा शुक्रिया
कविता

ऐ दर्द तेरा शुक्रिया

माधुरी व्यास "नवपमा" इंदौर (म.प्र.) ******************** ना किसी को थी खबर, ना किसी को था पता। एक थी मैं और एक बस तू ही था, मेरे इस राज़ को, छुपाने का शुक्रिया। ऐ दर्द तेरा शुक्रिया, ऐ दर्द तेरा शुक्रिया......... किसीने साथ छोड़कर, साथ देकर भी तुझे दिया । मिलन का पल हो या जुदाई, दगा बस तूने ना दिया, एक तू ही तो बस था, मेरा हमसफ़र सदा। ऐ दर्द तेरा शुक्रिया, ऐ दर्द तेरा शुक्रिया........ मेरे सब्र का सबूत तू, हरदम सबसे करीब रहा। ऐ मेरे सच्चे रफ़ीक़, सबक तेरी तासीर में था, एक बस तू ही मेरा, हरपल हमदम रहा। ऐ दर्द तेरा शुक्रिया, ऐ दर्द तेरा शुक्रिया...... अश्क़ मेरे चश्म-ए-तर का, दिल की हूक में तरंग रहा। गहरी साँस की राहत पर, होठों की मुस्कान से छुपा, एक तू ही बस रहा, सच्चा हमनशी जहाँ। ऐ दर्द तेरा शुक्रिया, ऐ दर्द तेरा शुक्रिया...... वक़्त की हर मार पर, मरहम जब तूने रखा। जिंदा होने का यकीन मेरे, यक...
माता सीता सी कोई नहीं
कविता

माता सीता सी कोई नहीं

अमित प्रेमशंकर एदला, सिमरिया, चतरा (झारखण्ड) ******************** राधा बनने को सब चाहे माता सीता सी कोई नहीं! सब कृष्ण के प्रेम में भटक रही संग राम के वन में कोई नही!! ये क्यों कहते हैं धोका खा गई रो-रो वक़्त गुज़ार रही सब ढुंढ़ती रही है राजभवन सीता सा वन पथ कोई नहीं।। फिर कहां मिलेगा सत्य प्रेम जो कर्तव्यों से जूझी नहीं। वो जनक सुता महलों की ज्योति वन आकर भी बूझी नहीं।। बीता दिया कांटों में जीवन फिर भी लंका की हुई नहीं।। राम हुए बस सीता के..... वो और किसी की हुई नहीं।। राधा बनने को सब चाहे माता सीता सी कोई नहीं! सब कृष्ण के प्रेम में भटक रही संग राम के वन में कोई नही!! परिचय :- अमित प्रेमशंकर निवासी : एदला, सिमरिया, चतरा (झारखण्ड) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष...
जिगर के ख़ून
ग़ज़ल

जिगर के ख़ून

निज़ाम फतेहपुरी मदोकीपुर ज़िला-फतेहपुर (उत्तर प्रदेश) ******************** ग़ज़ल - १२२२ १२२२ १२२२ १२२२ अरकान- मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन जिगर के ख़ून से लिखना वही तहरीर बनती है। इन्हीं कागज़ के टुकड़ों पर नई तक़दीर बनती है।। ग़ज़ल इतनी कही फिर भी न समझा हम भी शायर हैं। मेरी भी ज़िंदगी गुमनाम इक तस्वीर बनती है।। किसी को जीते जी शोहरत किसी को मरने पर मिलती। कहीं ग़ालिब बनी किस्मत कहीं ये मीर बनती है।। तुम्हारी सोच कैसे इतनी छोटी हो गई यारों। हमारे नर्म लहजे से भी तुमको पीर बनती है।। 'निज़ाम' अपनी क़लम रखकर दुबारा क्यों उठाई है। बुढ़ापे में बता राजू कहीं जागीर बनती है।। परिचय :- निज़ाम फतेहपुरी निवासी : मदोकीपुर ज़िला-फतेहपुर (उत्तर प्रदेश) शपथ : मेरी कविताएँ और गजल पूर्णतः मौलिक, स्वरचित हैं आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो ...
माँ
कविता

माँ

काकोली बिश्वास सिमुलतला (बिहार) ******************** मन का इक कोना है सूना आखिर अब काहे को रोना चित्कार में दफन उस मासूम को किया था मैंने ही अनसुना सिसकियाँ भर जब उसने कहा था न कर मुझको खुद से दूर पत्थर सा मन ना पिघला था न बहा था नेत्र से नीर निठुर खाली गोद अब बिलख रही है मन विसादित है गम से चूर क्यूं आयी कुछ पल के खातिर और आकर अब क्यूं गयी वो दूर? जब हम थे एक ही जाति के फिर क्यूं ये क्रूरतम भेदभाव? सुलगन मन के बुझे न बुझती तन से गहरा मन का घाव तीन महीने का ही रिश्ता वो थी बड़ी निश्चल बड़ा अटूट जाने किसकी थी लगी नज़र क्षण में छन्न से गया वो टूट मन से निकली आह निकली थी पर जुबां तक सिमटकर रह सी गयी तन जख़्मों से तिलमिला उठा आंखों से लहू बह सी गयी रिश्ता था एक माँ बेटी का जो थी मेरे खुन से पली समाज की कुत्सित रूढ़ियों की चढ़ गयी मेरी नवजात शिशु बली मूढ समाज की बेहयाई का इससे बुरा और क्या प...
बिन बोले कुछ, चल दिए
दोहा

बिन बोले कुछ, चल दिए

प्रो. आर.एन. सिंह ‘साहिल’ जौनपुर (उ.प्र.) ******************** खल जाता है कुछ लोगों का इस दुनिया से जाना यादें इतनी मन में ताज़ा मुश्किल बहुत भुलाना बिन बोले कुछ चल दिए मन कर गए उदास अभी तो आकिल आप से हमें बहुत थी आस इतनी जल्दी क्या थी भाई छोड़ गए क्यों साथ ताक़त दुगुनी हो जाती थी मिलता था जब हाथ राष्ट्रवाद सद्भाव समन्वय के थे प्रबल समर्थक कर्तव्यों प्रति सदा समर्पित बातें सदा सार्थक हर मज़हब से देश बड़ा है था उनका आदर्श राष्ट्र प्रेम पर उनकी बातें करती दिल स्पर्श सरल सहज इंसान कहाँ मिलते है दुनिया में ग़ैरों का दुःख देख द्रवित हो आँसू नयनन में डाकी नही लक्ष्मण रेखा निज सुख की ख़ातिर प्यार मोहब्बत की भाषा सद्भाव प्रेम में माहिर परिचय :- प्रोफ़ेसर आर.एन. सिंह ‘साहिल’ निवासी :जौनपुर उत्तर प्रदेश सम्प्रति : मनोविज्ञान विभाग काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी, उत्तर प्रदेश रुचि ...
शिवनाम माला
भजन

शिवनाम माला

तेज कुमार सिंह परिहार सरिया जिला सतना म.प्र ******************** जय महादेव जय कैलाशपति जय शिवसंकर जय उमापति जय भोले नाथ जय त्रिपुराररी जय त्रयम्बक जय भंडारी जय महाकाल जय चंद्रशेखर जय रुद्र शम्भू जय गंगाधर जय हर, स्मरहर जय महेश जय खण्डपरसु जयगिरिश जय वामदेव जय नीलकण्ठ जय त्रिपुरान्तक जय श्रीखण्ठ जय मृत्युंजय जय व्योमेश जय वीरू पाक्ष जय ईश्वर महेश जय खण्ड परसु जय विश्वनाथ जय कृति वासा जय पशुपतिनाथ जय जय पिनाकी जय शिति कण्ठा जय अनन्त नाम जय उत्कंठा नित नाम जप जो भिनसारे भव बन्ध कटे यम के द्वारे परिचय :- तेज कुमार सिंह परिहार पिता : स्व. श्री चंद्रपाल सिंह निवासी : सरिया जिला सतना म.प्र. शिक्षा : एम ए हिंदी जन्म तिथि : ०२ जनवरी १९६९ जन्मस्थान : पटकापुर जिला उन्नाव उ.प्र. आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित क...
रात्रि में
कविता

रात्रि में

ओमप्रकाश सिंह चंपारण (बिहार) ******************** निशा रात्रि में टिमटिमा रही है व्योम में तारक गण सुदूर अनन्त में। झींगुर की आवाजें गहन अंधकार को बेध रही है महाश्मशान में उठ रही है। चिता की लपटें जलती हड्डियां चटक रही है शिवा श्रृंगाल की आवाजें निशा की अपार नीरवता को भंग कर रही है। जल रही मोबतिया भी कुछ दूरियों तक महाश्मशान में जय माँ तारा की आवाजें निशा रात्रि की स्तब्धता को तोड़ रही है। तारापीठ की महाश्मसान में अमावस्या की निशा रात्रि में। साधक गण भी मग्न है अपनी साधना में कुछ क्रियाए और मंत्रोचार में। केवड़ा ,गुलाब की खुश्बू भी फैल गई है इस जाग्रत महाश्मशान में। मै भी टहल रहा हु भय मिश्रित सा माँ की चरण चिह्यो को याद कर । महान साधक वामाखेपा को प्रणाम कर। जीवन की सत्यता को तलाश रहा हु इस निशा के बीतते प्रहरो में समय के साथ अनन्त की लय में खो गया अपनी नश्वर भंगिमाओं के साथ। अनश्वर आत्म...
बारिश की आहट
कविता

बारिश की आहट

होशियार सिंह यादव महेंद्रगढ़ हरियाणा ******************** नभ पर काली घटा छाई, बादल गरज रहे घनघोर, देख -देख नभ की घटा, नृत्य कर रहे वन में मोर। द्युति से चमक रहा नभ, टप टप बूंदों का है शोर, दादुर जल में टेर लगाते, टिड्डे कर रहे मन विभोर। कहीं काले, कहीं नीले, कहीं लोग करे भागदौड़, कोई हँसता खिलखिला, भरेंगे अब तड़ाग,जोहड़। रेगिस्तान में उठी मतंग, मतंग ऋषि के नाम पर, बरसेंगी वो रेगिस्तान में, फिर बारिश हो घर घर। किसान हुये अब प्रसन्न, भीगा उनका तन व मन, खुशगवार होगा मौसम, सावन गया, है अगहन। बारिश की अब आहट, चकौर की बढ़ी चाहत, सूरज डूबा बादल ओट, गर्मी हटे मिलेगी राहत। चकवा चकवी मन हँसे, सीप के मुंह, बने मोती, किसानों ने ली है राहत, अब मिलेगी खूब रोटी। लहलहाएगी ये फसल, अनाज कमी मिले हल, टकटकी लगा देख रहे, ताक रहे नभ पल पल। तरुवर पर आयेगी बहार, चित चोरों की बढ़े प्यास, होगी जमकर अब बार...
होते हैं बहुत रगं सनम
कविता

होते हैं बहुत रगं सनम

बबली राठौर पृथ्वीपुर टीकमगढ़ (म.प्र.) ******************** जिन्दगी में तो वक्त के होते हैं बहुत रगं सनम कभी गम के, कभी खुशियों के होते हैं बहुत रगं सनम मेरे जख्मी दिल के घाव पढ़कर तुम कभी तो देखो कभी दर्द तो आँखों में टूटे ख्वाबों के होते हैं बहुत रगं सनम कैसे-कैसे तूफां को हमने थामा है जीवन में ओ खुदा कभी-कभी अपने अरमानों के पंखों के होते हैं बहुत रगं सनम जिन्दगी को कोई खिलौना समझे कैसे हैं नादान लोग कभी रंगीन फिजा उस तबाही के होते हैं बहुत रगं सनम रात पहरों में बदलती है शमा, परवानों तुम तो कुछ समझो कभी जिन्दगी के भी हसीन लम्हों के होते हैं बहुत रगं सनम परिचय :- बबली राठौर निवासी - पृथ्वीपुर टीकमगढ़ म.प्र. घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच पर अपने परि...
रात-रात भर
गीत

रात-रात भर

डॉ. कामता नाथ सिंह बेवल, रायबरेली ******************** रात-रात भर जगते रहना भी है बुरी बला !! एक छौंछियाहट-सी बनी हुई क्यों रहती है, किर्च-किर्च शीशे सी व्यथा कथानक कहती है; पल-पल यूँ ही दहते रहना भी है बुरी बला !! रात-रात भर जगते रहना भी है बुरी बला !!१!! कचनारों-से बिम्ब उभरते मौसम, बेमौसम, मन में सौ तूफान मचलते रहते हैं हरदम; भितरमार यूँ सहते रहना भी है बुरी बला! रात-रात भर जगते रहना भी है बुरी बला!!२!! मन, अनन्त के अन्त तलक उसकी राहें ताके, जिसने मीठी सुधियों तक के बन्द किये नाके; सपनों में यूँ बहते रहना भी है बुरी बला!! रात-रात भर जगते रहना भी है बुरी बला !!३!! अब कोई कौतूहल नहीं कहानी-किस्से में, ठहरी झीलों के जल-सा जीवन है हिस्से में; इससे, उससे कहते रहना भी है बुरी बला !! रात-रात भर जगते रहना भी है बुरी बला !!४!! परिचय :- डॉ. कामता नाथ सिंह पिता : स्व. दुर्गा बख़्श सिंह...
एकता का रूप है हिंदी
कविता

एकता का रूप है हिंदी

उषा शर्मा "मन" बाड़ा पदमपुरा (जयपुर) ******************** वंदे मातरम की शान है हिंदी। देश की माला का स्वरूप, भारत मां का मान है हिंदी।। अन्य भाषाओं से बढ़कर है हिंदी। भारत भारतीयों के साथ, संविधान का गौरव है हिंदी।। हिंदुस्तान के नाम में है हिंदी। कड़ी से कड़ी जोड़ने वाली, देश को एक मुठ्ठी में करने वाली है हिंदी।। भारत की आत्मा, चेतना है हिंदी। एकता की नित्य परम्परा, भारत वासियों की पहचान है हिंदी।। अन्य भाषाओं पर विजय पाने वाली है हिंदी। जन-जन की विरासत भाषा, भारत मां की बेटी का रूप है हिंदी।। आदर्शों की मिसाल है हिंदी। हिंदी से ना कोई बढ़कर, वक्ताओं की शक्ति है हिंदी।। कालरूपी अंग्रेजी करती है दबाने को हिंदी। अंग्रेजी को पीछे कर बलवती, दिन-दिन बलवान हो जाती है हिंदी।। फूलों-सी खुशबू महक रही है हिंदी। साहित्य की मन, आत्मा का, जन्मों-जन्मों का साथ है हिंद ।। कवि-लेखकों का मान है ह...
इंतजार
कविता

इंतजार

डाॅ. अहिल्या तिवारी रायपुर (छत्तीसगढ़) ******************** दहलीज़ को इंतजार है किसी अपने का जो पार कर गया है सदियों पहले, किसी की आशा किसी की उम्मीद को किसी की झोली राह तकती है दिन-रात, और वो दहलीज़ मैं ही तो हूँ। आंगन को इंतजार है किसी पहुना का जो आने वाला है खुशियों की गठरी लिए, सदियों पहले आई थी एक पाती उसकी चौंरे के तुलसी में पानी चढ़ाते समय और वो आंगन मैं ही तो हूँ। खेतों को इंतजार है उस मालिक का जिसके कंधे पर फसल पकते थे, खलिहानों के जमीन की सोंधी खुशबू अब भी मुझसे पूछती उसका पता वो खेत और खलिहान मैं ही तो हूँ। चौराहे को इंतजार है उस मुसाफिर का जो बसा गया था एक गांव जाते-जाते, उस गांव की धरती फिर से बुलाती हैं पीपल के छांव तले गुनगुनाने के लिए सदियों से खड़ी हूँ आंखें बिछाए, वो चौराहा मैं ही तो हूँ.....। . परिचय :-  डाॅ. अहिल्या तिवारी जन्म : २१ अक्टूबर निवास : रायपुर, छत...
सुंदरता
कविता

सुंदरता

संजय जैन मुंबई ******************** नही होती सुंदरता किसी के भी शरीर में। ये बस भ्रम है अपने अपने मन का। यदि होता शरीर सुंदर तो कृष्ण तो सवाले थे। पर फिर भी सभी की आंखों के तारे थे।। क्योंकि सुंदरता होती है उसके कर्म और विचार में। तभी तो लोग उसके प्रति आकर्षित होकर आते है। वह अपनी वाणी व्यवहार और चरित्र से जाना जाता है। तभी तो लोग उसे अपना आदर्श बना लेते है।। जो अर्जित किया हमने अपने गुरुओं से ज्ञान। वही ज्ञान को हम दुनियाँ को सुनता है। जिससे होता है एक सभ्य समाज का निर्माण। फिर सभी को ये दुनियां, सुंदर लगाने लगती है। इसलिए संजय कहता है, जमाने के लोगो से। शरीर सुंदर नही होता सुंदर होते उसके संस्कार।। परिचय :- बीना (मध्यप्रदेश) के निवासी संजय जैन वर्तमान में मुम्बई में कार्यरत हैं। करीब २५ वर्ष से बम्बई में पब्लिक लिमिटेड कंपनी में मैनेजर के पद पर कार्यरत श्री जैन शौक से लेखन मे...
माता का आंचल
कविता

माता का आंचल

रवि कुमार बोकारो, (झारखण्ड) ******************** माँ की पल्लु पकड़ आज रो रहा हूँ मैं।। प्यार भरी ममता आंचल मे सौ रहा हूँ मैं।। सपने में आया उड़ता परिन्दा काट रहा था हाँथ मेरे।। मानो माँ से कह रहा हो छोड़ इसे चल साथ मेरे।। माँ की ममता बहक गई,, आँसु आँखो-से छलक गई।। दूर खड़ी थी माँ मेरी छूने से मुझको तरस गई।। उड़ गया परिंदा नीले गगन में ले गया माँ को साथ मेरे आँख खुली तो पाया में कोई नहीं अब साथ मेरे।। परिचय :- रवि कुमार निवासी - नावाड़ीह, बोकारो, (झारखण्ड) घोषणा पत्र : यह प्रमाणित किया जाता है कि रचना पूर्णतः मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, हिंदी में टाईप करके हमें hindirakshak17...
प्रेम का सौन्दर्य
कविता

प्रेम का सौन्दर्य

मधु टाक इंदौर मध्य प्रदेश ******************** प्रेम जज्बा है दिलों का मिलन है रूहो का कुछ पलों का आकर्षण नहीं गूढ़ता लिये है चाहतों का सीप में मोती का बनना बागों में कलियों का खिलना प्रेम की कोई सीमा नहीं मूरत में श्रद्धा की होना कृष्ण की मुस्कान है प्रेम राधा का देदीप्यमान है प्रेम प्रेम की कोई बंदिश नहीं मज़हब का इमान है प्रेम प्रेम पलकों पेे सजता है नयनो से झलकता है लबों पे तरन्नुम लिये बन रागिनी बज उठता है सुदामा का स्वाभिमान है आत्मा का अभिमान है सब विधाओं से अलग अध्यात्म का सोपान है मीरा की आन है द्रोपदी का सम्मान है भक्ति और शक्ति का सूचक सौन्दर्य का प्रतिमान है "मधु" से मधुर ध्यान है प्रेम माँ का दिया ग्यान है प्रेम आत्मा को परमात्मा से मिला दे पूजा का ऐसा विधान है प्रेम परिचय :-  मधु टाक निवासी : इंदौर मध्य प्रदेश घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि मेरी यह रचना स्...