दूर रहो थोड़ा
भीमराव झरबड़े 'जीवन'
बैतूल (मध्य प्रदेश)
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ख्याल रखो कुछ बिरादरी का, दूर रहो थोड़ा।
अभी-अभी तो चोंच निकाली, बाहर अंडे से।
लड़ने को तैयार खड़े हो, पोथी पंडे से।।
आदमयुग की सभ्य रीति को, कहते जो फोड़ा।।
अक्षर चार पढे क्या बच्चू, बनते हो खोजी।
अमरित पीकर आरक्षण का, हरियाये हो जी।।
मत दौड़ाओ, तेज हवा-सा, अक्षर का घोड़ा।।
ढोल गँवार नारियों जैसे, तुम पर कृपा रही।
ब्रह्मा जी ने आ सपने में, हम से बात कही।।
बचो पाप से मानस के पथ, बनो नहीं रोड़ा।।
मिथकों की सच्चाई पर जो, प्रश्न उठाओंगे।
कानूनी पंजों में जबरन, जकड़े जाओंगे।।
अब भी चोटी के हाथों हैं, कब्जे का कोड़ा।।
परिचय :- भीमराव झरबड़े 'जीवन'
निवासी : बैतूल मध्य प्रदेश
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है।
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