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कविता

अधिकार मिले सबको
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अधिकार मिले सबको

कंचन प्रभा दरभंगा (बिहार) ******************** सबको ये अधिकार है अपने अधिकार को भी जाने अपना विकास अपनी सुरक्षा अपने कर्तव्यों को भी जाने महिला को भी मिले अधिकार बालक पर ना हो अत्याचार शिक्षा का अधिकार सभी को मिले राष्ट्र का प्यार सभी को यौन शोषण पर लगे प्रतिबंध बेहतर बने सबका सम्बन्ध बालिका भी पढ़ने जाये जग मे अपना नाम कमाए सबको आजादी का अधिकार सबको सीखने का अधिकार नही बनाओ शिक्षा को व्यापार दे दो निर्धन को पढ़ने का अधिकार बाल मजदूरी बन्द करो अपनी आवाज बुलंद करो हो गरीब या हो लाचार सबको आगे बढ़ने का अधिकार अभिव्यक्ति की आजादी हो कम उम्र मे ना शादी हो किसी के साथ ना हिंसा हो हर दिशा मे बस अहिंसा हो देश का हर व्यक्ति पाये भोजन कपड़ा और आवास फैलता जाये हर क्षेत्र में उन्नति और प्रेम का प्रकाश . . परिचय :- कंचन प्रभा निवासी - लहेरियासराय, दरभंगा, बिहार आप भी अपनी कविताएं, क...
यादों के गुलाब
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यादों के गुलाब

रंजना फतेपुरकर इंदौर (म.प्र.) ******************** घनेरे बादलों पर चलकर चाहत का नज़राना उतर आया है झिलमिल चांदनी में सितारों का नूर निखर आया है जबसे दुआएं मांगी हैं तुम्हारी यादों को पलकों में समेटने की कविता की पुस्तक में रखे सुर्ख गुलाबों का महकना याद आया है एक खूबसूरत सा रंग भीगी चाहत का तुम्हारी सपनीली आंखों में उतर आया है एक धुंधला सा बादल झीने कोहरे का सुहानी यादों में उतर आया है पिघलती शमा की रोशनी जब बहती है सितारों में एक कतरा दुआओं का हथेलियों पर उतर आया है . परिचय :- नाम : रंजना फतेपुरकर शिक्षा : एम ए हिंदी साहित्य जन्म : २९ दिसंबर निवास : इंदौर (म.प्र.) प्रकाशित पुस्तकें ११ सम्मान ४५ पुरस्कार ३५ दूरदर्शन, आकाशवाणी इंदौर, चायना रेडियो, बीजिंग से रचनाएं प्रसारित देश की प्रतिष्ठित पत्र पत्रिकाओं में निरंतर रचनाएं प्रकाशित रंजन कलश, इंदौर अध्यक्ष वामा साहित्य मंच, इंदौर...
कभी कभी
कविता

कभी कभी

रुचिता नीमा इंदौर म.प्र. ******************** कभी कभी कुछ पल ही तो माँगती हूँ, कभी कभी थोड़ी सी हिम्मत, थोड़ा सा प्यार माँगती हूँ... आ जाये इस दिलको करार वो साथ माँगती हूँ मैंने कभी कहा तुमसे, कि इससे ज्यादा की कुछ चाह है न धन की, न गहनों की कही कोई अभिलाषा है... सिर्फ इस व्यस्त जीवन से कुछ सुकून के पल ही तो माँगती हूँ आ जाये जिससे दिल मे सुकून तुम्हारे साथ वो वक़्त माँगती हूँ लेकिन तुम इतना भी नही कर पाते... हर चीज का लगा लेते हो मोल और जो है मेरे लिये अनमोल उसी को तुम कर देते हो गोल... समझते क्यो नही तुम इन जज्बातों को इन एहसासों को मेरी अनकही बातों को जिस दिन तुम, मुझे समझ स्नेह से गले लगाओगे ... सच कहती हूँ जितना दोगे उससे, कहीं अधिक तुम पाओगे... समझने लगो तुम अब मुझकों बस इतनी सी ही है चाहत मेरी क्यूँ ले रहे, कठिन परीक्षा, मेरे सब्र की... हर जनम दासी बन जाऊं बस पूरी हो जाए, चाह...
पाँव थिरक उठता है
कविता

पाँव थिरक उठता है

शरद सिंह "शरद" लखनऊ ******************** हो दिल मे उमंग तो, हर तार झंकार उठता है। न रहता भान किसी का, मन मयूर झूम उठता है। खिल जाते है मधुर पुष्प वीराने मे, हर भ्रमर का गान गूँज उठता है। कहाँ रहता है ध्यान बदहवासियो का, हर सांस से संगीत फूट उठता है। मिट जाती है अन्धेरों की छाया, हर पग पर दीप जल उठता है। रहता न वीरान रास्ता कोई, हर मोड़ पर जश्न झूम उठता है। सज  जाती है महफिले उर अन्तर में, वाणी से मधुर गान फूट पड़ता है। जब होता है मिलन उस कान्हा स , स्वतः ही पाँव थिरक उठता है। स्वतः ही ........................।। . लेखक परिचय :- बरेली के साधारण परिवार मे जन्मी शरद सिंह के पिता पेशे से डाॅक्टर थे आपने व्यक्तिगत रूप से एम.ए.की डिग्री हासिल की आपकी बचपन से साहित्य मे रुचि रही व बाल्यावस्था में ही कलम चलने लगी थी। प्रतिष्ठा फिल्म्स एन्ड मीडिया ने "मेरी स्मृतियां" नामक आपकी एक पुस्तक प्रकाश...
पैमाना
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पैमाना

सुरेखा सुनील दत्त शर्मा बेगम बाग (मेरठ) ********************** सबसे अलग है, मुझे आंकने का उसका पैमाना। जुदा है सबसे जहां भर में, उसका निशाना। मुझे जमाने से, बचा कर रखता है, मानो सबसे अलग, वो मुझे समझता है। मुद्दतों से नहीं देखा, "आईना" खुल ना जाए राज, यही डर लगता है। बगैर देखे आईना, आज, खुल ही गया राज! मैं खुद को नहीं, जानती जितना, वो मुझ को, जानता है उतना,.... सबसे अलग है, मुझे आंकने का, उसका पैमाना....!! . परिचय :-  सुरेखा "सुनील "दत्त शर्मा जन्मतिथि : ३१ अगस्त जन्म स्थान : मथुरा निवासी : बेगम बाग मेरठ साहित्य लेखन विधाएं : स्वतंत्र लेखन, कहानी, कविता, शायरी, उपन्यास प्रकाशित साहित्य : जिनमें कहानी और रचनाएं प्रकाशित हुई है :- पर्यावरण प्रहरी मेरठ, हिमालिनी नेपाल, हिंदी रक्षक मंच (hindirakshak.com) इंदौर, कवि कुंभ देहरादून, सौरभ मेरठ, काव्य तरंगिणी मुंबई, दैनिक जागरण अखबार, अमर उजाला ...
जमाने को समझो
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जमाने को समझो

संजय जैन मुंबई ******************** कही गम है तो कही खुशी। कही मोहब्बत तो कही तकरार। कही मिलना तो कही बिछड़ना। कही जिंदगी तो कही मौत। बड़ा ही अजीब है इस जमाने का दृश्य।। जो जमाने को समझा और उसी अनुसार ढल गया। वो मानो मौज मस्ती से जी गया। जो जमाने को नही समझा वो चिंताओं के जाल में फंस गया। और जिंदगी को अलग दिशा में ले गया।। कलयुगी जमाने मे सभी मतलबी नही होते। कुछ तो कलयुग में भी हटकर होते है। माना कि आज का जमाना खराब है। फिर भी कुछ रिश्ते तो सतयुग जैसे होते है।। इसलिए जमाने को देखो, समझो और आगे बढ़ो। फिर जो चाहोगे वो मिल जाएगा। और कलयुग में भी इतिहास लिखा जाएगा।। . लेखक परिचय :- बीना (मध्यप्रदेश) के निवासी संजय जैन वर्तमान में मुम्बई में कार्यरत हैं। करीब २५ वर्ष से बम्बई में पब्लिक लिमिटेड कंपनी में मैनेजर के पद पर कार्यरत श्री जैन शौक से लेखन में सक्रिय हैं और इनकी र...
शब्दों में सामर्थ्य
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शब्दों में सामर्थ्य

वीणा वैष्णव कांकरोली ******************** शब्दों में सामर्थ्य बस, इतना मुझे देना प्रभु। प्रार्थना मन से करूँ, तुम तक वह पहुँचें प्रभु।। धर्म जाति से परे हो, जीवन सदा मेरा प्रभु। किसी का दर्द समझू, ऐसा जीवन मेरा प्रभु।। कर्म कांड पाखंड से, सदा दूर में रहूँ प्रभु । किसी की मदद करू, इतनी शक्ति देना प्रभु।। सज्जन व्यक्ति बन, जीवन यापन करुँ प्रभु। दिल में जगह मिले, यही प्रार्थना करूँ प्रभु।। नहीं चाहिए धन दौलत, दीन बन रहूँ प्रभु। सेवा दीन की करुँ तो, जीवन सफल हो प्रभु।। प्रार्थना बस यही, तुझसे मैं सदा करूँ प्रभु। कोई गरीब भूखा उठे, पर भूखा ना सोए प्रभु।। जब जाऊ इस जहां से, याद में आऊँ प्रभु। कर्म कुछ ऐसे करूं, ठौर चरण पाऊँ प्रभु।। . परिचय : कांकरोली निवासी वीणा वैष्णव वर्तमान में राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय फरारा में अध्यापिका के पद पर कार्यरत हैं। कवितायें लिखने में आपकी गहन रू...
काश ….
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काश ….

सुरेखा सुनील दत्त शर्मा बेगम बाग (मेरठ) ********************** काश एक बार तुमने हमें पुकारा होता टूटे हुए दिल को संवारा होता जिस तरह काटा है वक्त तुम्हारे बिना .... काश तुमने भी एक एक लम्हा ऐसे ही गुजारा होता उसको ये जिद थी जैसा है कबूल है उसको मेरी ये चाहत थी कि जैसा है वो सिर्फ मेरा होता.... उसके बिना खुश रहने का करती हूं दिखावा दिल में है कसक काश वो मेरे बिना, अधूरा होता उसके चेहरे पर वो शबनम की बूंदें देखकर अपने आप को थोड़ा सा हमने भी तराशा होता चांद कहा बाबू कहा और शोना भी कहा काश ... सिर्फ एक बार मेरी "सुरेखा" कहकर पुकारा होता।। . परिचय :-  सुरेखा "सुनील "दत्त शर्मा जन्मतिथि : ३१ अगस्त जन्म स्थान : मथुरा निवासी : बेगम बाग मेरठ साहित्य लेखन विधाएं : स्वतंत्र लेखन, कहानी, कविता, शायरी, उपन्यास प्रकाशित साहित्य : जिनमें कहानी और रचनाएं प्रकाशित हुई है :- पर्यावरण प्रहरी मेरठ, हिमालि...
मिटा इतिहास वो काला, इबारत गढ
कविता

मिटा इतिहास वो काला, इबारत गढ

ओम प्रकाश त्रिपाठी गोरखपुर ********************** मिटा इतिहास वो काला, इबारत गढ नयी डाला, शत्रु भी सोचता होगा, पडा किससे है अब पाला।। गया अब तीन सौ सत्तर, नया इतिहास लिख डालो। चढाई कर पी ओ के पर, उसे अपना बना डालो। पाक अब रह जाये जपते, यू ही कश्मीर की माला शत्रु भी........।। तू ही है मान भारत का तू ही अभिमान भारत का तू ही है शान भारत का तू ही है जान भारत का तूने ही हर असंभव को, बना संभव है अब डाला शत्रु भी....।। है कुछ गद्दार भी अपने चमन मे, उनको पहचानो है जो इस देश का दुश्मन, उसे अपना नहीं जानो जो बोले देशद्रोही बोल, उन पर डाल दो ताला शत्रु भी.......।। करो ताण्डव दिखा दो शक्ति, दुश्मन बच नहीं पाये हसरतें जो भी मन मे है, धरी की धरी रह जाये वो खुद जल भस्म हो जाये नयन मे ऐसी हो ज्वाला शत्रु भी....।। . लेखक परिचय :-  ओम प्रकाश त्रिपाठी आल इंडिया रेडियो गोरखपुर आप भी अपनी कविताएं, कहा...
पानी का महत्व
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पानी का महत्व

कंचन प्रभा दरभंगा (बिहार) ******************** पानी बिन हम जीवित रह नहीं सकते पानी की महत्ता हम कह नही सकते। पानी से धरा पानी से सजीव पानी से ही जीवन की नीव गर्मी मे प्यास हम सह नहीं सकते पानी की महत्ता हम कह नही सकते। पानी से ही होता सब काम पानी का कोई दे ना सकता दाम पानी के बिना पशु भी रह नही सकते पानी की महत्ता हम कह नही सकते। अपने छत पर रोज पानी जरूर डालें पक्षी भी अपनी अपनी प्यास बुझा लें पानी बिना पक्षी भी रह नही सकते पानी की महत्ता हम कह नही सकते। . . परिचय :- कंचन प्रभा निवासी - लहेरियासराय, दरभंगा, बिहार आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, हिंदी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, हिंदी में टाईप करके हमें hindirakshak17@gmail....
नादान बहुत था
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नादान बहुत था

आशीष तिवारी "निर्मल" रीवा मध्यप्रदेश ******************** जिससे मिलने के लिए मैं परेशान बहुत था, उसके मिलने का ढंग देख मैं हैरान बहुत था। चाहतों के भंवर में फंस के डूब ही जाता मैं, मुझे डुबाने हेतु उसके पास सामान बहुत था। वो जब-जब मिला मतलब से ही मिला मुझसे, समझ ना पाया ये मेरा दिल नादान बहुत था। दिल से आखिर वो शख्स गरीब ही निकला, सोने, चांदी, रुपयों से भले ही धनवान बहुत था। अपना समझकर गया था उसको गले लगाने, पर उसके अंतस में कांटों का मैदान बहुत था। अच्छा ये हुआ कि बात दिल की मैं कहा ही नहीं कि फासला भी हम दोनों के दरमियान बहुत था।   लेखक परिचय :- कवि आशीष तिवारी निर्मल का जन्म मध्य प्रदेश के रीवा जिले के लालगांव कस्बे में सितंबर १९९० में हुआ। बचपन से ही ठहाके लगवा देने की सरल शैली व हिंदी और लोकभाषा बघेली पर लेखन करने की प्रबल इच्छाशक्ति ने आपको अल्प समय में ही कवि सम्मे...
खूबसूरती बसी है तुझमें
कविता

खूबसूरती बसी है तुझमें

अंजना झा फरीदाबाद हरियाणा ******************** जिंदगी कितनी खूबसूरती बसी है तुझमें आलिंगनबद्ध हैं तुझसे तेरे हर स्वरूप में सत्य से परे बंधे हैं मोह के अटूट बंधन में आशा और आकांक्षा के भ्रमित संसार में। हमें लुभाती रहती है तू सदा हर रूप में कभी पूजा की पवित्र सजी हुई थाली में कभी मद से भरे उस गर्मागर्म प्याली में डूबते रहते हैं सदा झूठ की खुशहाली में कभी सराबोर होली के रंगबिरंगे रंगों में कभी दीपावली के प्रज्ज्वलित दीप में कभी रमज़ान के पश्चात ईद के चांद में कभी ईश के झिलमिलाते क्रिसमस में। कभी बसंत के मदमस्त पुरवाईयों में कभी पतझड़ के सूखे हुए उन पत्तों में कभी गर्मी की उमसपूर्ण उन थपेड़ों में कभी शीत की कंपकंपाती हवाओं में । क्यों ऐ जिंदगी हम डूब गए हैं तुझमें बंधी हो तुम सांसों की कच्ची डोर में झूठ और सच के क्षीण से आवरण मे बेगाना कर देता जो तुझसे इक पल में। . परिचय :-  नाम : अंज...
अकेला
कविता

अकेला

धैर्यशील येवले इंदौर (म.प्र.) ******************** मेरी ये रचना भारत के सभी पुलिस कर्मी यो को समर्पित है निर्धनता में जन्मा वो सपने लिए बड़ा हुआ रोटी, कपड़ा, मकान की तलाश में आ पोहचा ऐसी जगह जो मायावी थी वहा भ्रम हो जाता है शक्तिशाली होने का। शक्ति से साथ मिलेगा रोटी, कपड़ा, मकान इसी लालसा में घुस गया चक्रव्यूव में। धसता चला गया धसता चला गया सारे भेद खुलते गये जिसे शक्ति समझा था, वो तो बेबसी लाचारी निकली निकलना चाहा चक्रव्यूव से परंतु अनुभव अभिमन्यु सा। जिसने चाहा उसने मारा जिसने चाही उसने उतारी इज्ज़त जीने की चाह में रोज मरता रहा। पर दुसरो की रखवाली करता रहा। बड़ी आस से अपने श्रेष्ठी जन को मदद के लिए याचक की नज़रों से देखता रहा। श्रेष्ठी भी क्या करता वो खुद ही है निराधार। कैसे उठाये तेरा भार। कौन करे तेरा उद्धार इस प्रश्न का कोई उत्तर नही तू शापित है शापित रहेगा दुसरो की रखवाली में ते...
साधना
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साधना

भारती कुमारी मोतिहारी (बिहार) ********************** थाल सजाए पूजा की, तेरे दरपे प्रभु आई। ध्यान लगाएं कब से, क्षण-क्षण जो बिताएं।। पल-पल भी बीत रहे, जीवन भी सब रीत रहे। समझ ना तुम प्रेम पाये, बैठी हूँ तेरा ध्यान लगाएं।। आवोगे कब सन्मुख मेरे, मैं मतवाली प्रतीक्षा करती। ध्यान लगाएं जीवन बिताएं, हर पल प्रयत्न करते जाते।। आशा की कलियों से खेलती, देखती तेरी मधुमय मुँख को। ध्यान जब तेरे चरणों में लगाती, पहचान प्रिये मैं तुझसे हीं पाती।। . लेखक परिचय :-  भारती कुमारी निवासी - मोतिहारी , बिहार आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, हिंदी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, हिंदी में टाईप करके हमें hindirakshak17@gmail.com पर अणु ड...
मै क्यों गाऊँ
कविता

मै क्यों गाऊँ

शरद सिंह "शरद" लखनऊ ******************** मै गीत विरह के क्यों गाऊँ, मै गीत विरह के क्यों गाऊँ। मेरे तन के रोम रोम में, बसा हुआ कान्हा प्रियतम, जब चाहूँ मै उसे निहारूँ, साथ मेरे रहता हरदम। जब मै सोऊँ वह भी सोऐ, साथ मेरे उठ जाता है, जब वह रहता साथ ही हरपल, फिर क्यों मै न इतराऊँ, मै गीत विरह के क्यों गाऊँ। जब चाहूँ पलके मूंदे, वंशी की ध्वनि मैं सुनती हूँ, जब लगता तन्हा हूँ मै, उससे बतियाया करती हँ। जब हो जाती दग्ध ह्रदय, वह हमे हँसाया करता है, गाकर अपनी मधुर रागिनी, मुझे रिझाया करता है। मै उसकी वह मेरा है, मै इसको क्योंकर झुठलाऊँ, मैं गीत विरह के क्यों गाऊँ। हर दिन ही तो मेरे दिल में, वह नये तराने लिखता है। रूठूँ गर मै कभी अगर तो वह हमे मनाया करता है। उसकी इन प्यारी बातो को क्योंकर भला मै ठुकराऊँ मै गीत विरह के क्यों गाऊँ। मै गीत .... . लेखक परिचय :- बरेली के साधारण परिवार मे जन्मी शर...
अधूरी नन्हीं परी
कविता

अधूरी नन्हीं परी

सुरेखा सुनील दत्त शर्मा बेगम बाग (मेरठ) ********************** मैं एक अधूरी नन्ही परी हूं कूड़े के ढेर पर सड़क किनारे पड़ी हूं मेरी किस्मत तो देखो ए दुनिया वालों मुझे आंगन नहीं कूड़े का ढेर मिला मुझे जन्मते ही दुत्कार दिया ना मां मिली ना पिता मिला सिर्फ समाज का तिरस्कार मिला गलती जो की थी और ने मुझे क्यों उसका इनाम मिला कुत्तों ने खाया मुझे गिद्धों ने नोचा मुझे क्या इसीलिए अधूरा जन्म मिला था मुझे यूं तो कहते हो देवी मुझे पूजते हो मुझे फिर क्यों जन्म से पहले मारा मुझे ए समाज के रखवालों अब तो सबक लो मेरे जैसी अधूरी नन्हीं परी को बचा लो मैं एक अधूरी नन्ही परी हूं कूड़े के ढेर पर सड़क किनारे पड़ी हूं।। . परिचय :-  सुरेखा "सुनील "दत्त शर्मा जन्मतिथि : ३१ अगस्त जन्म स्थान : मथुरा निवासी : बेगम बाग मेरठ साहित्य लेखन विधाएं : स्वतंत्र लेखन, कहानी, कविता, शायरी, उपन्यास प्रकाशित साहित्य : जिनमें...
नफरत की तोड़ दीवारें
कविता

नफरत की तोड़ दीवारें

वीणा वैष्णव कांकरोली ******************** नफरत की तोड़ दीवारें, प्रेम को अपनाएंगे। सबके दिलों में हम, एकता भाव जगाएंगे।। बहुत लड़े हैं अब तक, अब न इसे दोहराएंगे। हंसी-खुशी साथ रह, हम भेदभाव भुलाएंगे।। एकता के दीप, हर घर में अब जगमगाएंगे। प्यार का महत्व बता, दिलों को जोड़ आएंगे।। पैसों के लालच में आ, अब न भ्रष्टाचार फैलाएंगे। भूखे प्यासे रहकर भी, एक साथ जीवन बिताएंगे।। बुजुर्गों का सम्मान कर, आशीष हम पाएंगे। उनके ही आशीष से, सफलता ओर जाएंगे ।। विविधता में एकता, देश की पहचान बताएंगे। हम हमारे देश को, विश्व में महान बनाएंगे।। . परिचय : कांकरोली निवासी वीणा वैष्णव वर्तमान में राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय फरारा में अध्यापिका के पद पर कार्यरत हैं। कवितायें लिखने में आपकी गहन रूचि है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित कर...
स्त्री
कविता

स्त्री

धैर्यशील येवले इंदौर (म.प्र.) ******************** आना मेरा दुनिया मे नागवार गुजरा अपनो को सहती रही पलती रही शिकवा न किया जिंदगी घर मे ही मिला दुजभाव पैरो में थी अदृश्य बेड़िया हर पल मन ममोस्ति रही शिकवा न किया जिंदगी अपने घर की थी पराई जब आई अपने पराये घर बातों में उलाहने सहती रही शिकवा न किया जिंदगी मुझे बोझ समझते थे मुझ पर बोझ बन गए सब का बोझ उठाती रही शिकवा न किया जिंदगी जब दुनिया मे आ ही गई क्यो कर तुझसे हार मानु तुझसे हरपल लढती रही शिकवा न किया जिंदगी आज भी हार नही मानूँगी तुझे पाल अपने भीतर वसुधा सा भार उठाती रही शिकवा न किया जिंदगी। . परिचय :- नाम : धैर्यशील येवले जन्म : ३१ अगस्त १९६३ शिक्षा : एम कॉम सेवासदन महाविद्याल बुरहानपुर म. प्र. से सम्प्रति : १९८७ बैच के सीधी भर्ती के पुलिस उप निरीक्षक वर्तमान में पुलिस निरीक्षक के पद पर पीटीसी इंदौर में पदस्थ। आप भी अपनी कविता...
आखिर तू है क्या
कविता

आखिर तू है क्या

शरद सिंह "शरद" लखनऊ ******************** ऐ जिन्दगी! जिन्दगी निकल रही है, पर न जान सकी, ऐ जिन्दगी! तू ही बता तू है क्या। तू गुल का गुलिस्ताँ है, या गम की गजल है को, ऐ जिन्दगी! तू ही बता तू है क्या। तू रात्रि का गहन अन्धेरा है, या दिन का चमकता उजाला है, ऐ जिन्दगी! तू ही बता तू है क्या। तू खुशनुमा फूलों की महक है, या नुकीले काँटो की गहन पीडा़ है, ऐ जिन्दगी! तू ही बता तू है क्या। कोकिल की कूक पपिहा की रटन है, या अन्जान कर्णभेदी कर्कश ध्वनि है, ऐ जिन्दगी! तू ही बता तू है क्या। तू चन्दा की शीतल चाँदनी है, या सूर्य की तपती दुपहरी है, ऐ जिन्दगी! तू ही बता तू है क्या। तू सपनो मे छायी खुशनुमा खुमारी है, या डरी सहमी रात अन्धेरी है ऐ जिन्दगी! तू ही बता तू है क्या। अब तक न जान सकी, ऐ जिन्दगी! तू ह बता तू है क्या। . लेखक परिचय :- बरेली के साधारण परिवार मे जन्मी शरद सिंह के पिता पेशे से डाॅक्टर थ...
सोचो जब जमी पर
कविता

सोचो जब जमी पर

ओम प्रकाश त्रिपाठी गोरखपुर ********************** पानी.. जरा सोचो जब जमी पर एक दिन ऐसा होगा धरा सब रेत होगी सन्नाटा यू पसरा हुआ होगा नहीं होगी हरी घासें न दीखेगी हरी बासें न नदियां कल कलायेंगी न चिडियाँ चह चहायेंगी न फसलें लह लहायेंगी न बिजली चम चमायेंगी धरित्री माँ का ये धानी चुनर जब जल रहा होगा धरा सब.........।। जब तक ये पानी है,जवानी है सभी किस्सा कहानी है सुनो उपदेश रहिमन की यही उनकीभी बानी है सून सब कुछ है, बिन पानी सँवारो आने वाला कल बचा एक बूँद पानी को नहीं चेता अगर अब भी भयानक कल बडा होगा धरा सब..।। . लेखक परिचय :-  ओम प्रकाश त्रिपाठी आल इंडिया रेडियो गोरखपुर आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, हिंदी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, हिंदी ...
प्यार की कहानी
कविता

प्यार की कहानी

संजय जैन मुंबई ******************** कैसे होती है यारो, प्यार की शुरुआत। सुनाता हूँ तुम्हे आज। दिल की लगी से, दिल मचलता है। आंखों का आंखों से, मिलना काफी होता है। किसी से रोज मिलना, कोई इत्तफाक नही होता। दिल में दोनों के कुछ तो, चल रहा होता है। तभी तो एक दूसरे की आंखे, यहां से वहां चलती है। और वो उसे भीड़ में भी, आसानी से खोज लेता है। जिसे सुबह से शाम और, शाम से रात मे ढूंढता है। और उसी के सपनो में, डूबा सा रहता है। और एक नई प्यार की, कहानी लिख रहा होता है।। . लेखक परिचय :- बीना (मध्यप्रदेश) के निवासी संजय जैन वर्तमान में मुम्बई में कार्यरत हैं। करीब २५ वर्ष से बम्बई में पब्लिक लिमिटेड कंपनी में मैनेजर के पद पर कार्यरत श्री जैन शौक से लेखन में सक्रिय हैं और इनकी रचनाएं बहुत सारे अखबारों-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहती हैं। ये अपनी लेखनी का जौहर कई मंचों पर भी दिखा चुक...
अर्थ नहीं समझ वो …
कविता

अर्थ नहीं समझ वो …

वीणा वैष्णव कांकरोली ******************** अर्थ नहीं समझ, वो गलत अर्थ लगाते हैं। सोच के अनुरूप, अपना दिमाग चलाते हैं।। अर्थ बिना सब व्यर्थ, समझ नहीं पाते हैं। बिन कही बात का भी, अर्थ वो लगाते हैं।। राग द्वेष सब, इसी वजहसे पैदा होते हैं। अर्थ का अनर्थ कर, अपनों से दूर जाते हैं।। अर्थ गागर में सागर भर, यश को पाते हैं। समझदार ही, इस भाषा को समझ पाते हैं।। बाकी सब विवेकानुसार, अर्थ लगाते हैं। मन मोती संग, इच्छानुसार माला पिरोते हैं।। सकारात्मक सोच अपना, सही अर्थ लगाते हैं। इंसान वास्तव में, वही पूज्य बन जाते हैं।। . परिचय : कांकरोली निवासी वीणा वैष्णव वर्तमान में राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय फरारा में अध्यापिका के पद पर कार्यरत हैं। कवितायें लिखने में आपकी गहन रूचि है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, ह...
मिलना बहुत जरूरी है
कविता

मिलना बहुत जरूरी है

नफे सिंह योगी मालड़ा सराय, महेंद्रगढ़(हरि) ******************** मिलने की बेचैनी को वो, समझ रहे मजबूरी है। माना मोहब्बत इक तरफी मिलना बहुत जरूरी है।। येआलम बेताबी का हम बिल्कुल भी ना सह सकते। कौन बताएगा उनको कि हम उन बिन ना रह सकते।। तड़प रहे हैं ऐसे जैसे, मृग चाहत कस्तूरी है। माना मोहब्बत इक तरफी मिलना बहुत जरूरी है।। जब तक उनको देख न लें, आँखें मुरझायी रहती हैं। बिन मुस्कां के छींटों के, सूरत झुलसाई रहती हैं।। जख्म जिगर अब सह ना पाए, चोट बनी नासूरी है। माना मोहब्बत इक तरफी, मिलना बहुत जरूरी है।। रस्सी के प्रयासों से, इक दिन पत्थर घिस जाता है। चसक चने के चक्कर में चक्की में घुन पीस जाता है।। पिसकर घुन की तरह चने संग, मुझे मरना मंजूरी है। माना मोहब्बत इक तरफी मिलना बहुत जरूरी है।। पास हमेशा देख हमें वो, इतना क्यों घबराते हैं? दुनिया क्या सोचेगी शायद, सोच ये ही शरमाते हैं।। हमने भी है...
लौट आई
कविता

लौट आई

सुरेखा सुनील दत्त शर्मा बेगम बाग (मेरठ) ********************** लौट आई चेहरे की हंसी दिल की खुशी कुछ पल तेरे पास आकर रुकी हाले-ए-दिल सुनाया, फिर.... चेहरे की हंसी दिल की खुशी कुछ पल तेरे पास आकर रुकी बेचैन होकर डर कर जुदाई से लौट आई दरवाजे पर आहट के साथ तेरे पास! चेहरे की हंसी दिल की खुशी कुछ पल तेरे पास आकर रुकी...! आगे बढ़ चली . परिचय :-  सुरेखा "सुनील "दत्त शर्मा जन्मतिथि : ३१ अगस्त जन्म स्थान : मथुरा निवासी : बेगम बाग मेरठ साहित्य लेखन विधाएं : स्वतंत्र लेखन, कहानी, कविता, शायरी, उपन्यास प्रकाशित साहित्य : जिनमें कहानी और रचनाएं प्रकाशित हुई है :- पर्यावरण प्रहरी मेरठ, हिमालिनी नेपाल, हिंदी रक्षक मंच (hindirakshak.com) इंदौर, कवि कुंभ देहरादून, सौरभ मेरठ, काव्य तरंगिणी मुंबई, दैनिक जागरण अखबार, अमर उजाला अखबार, सौराष्ट्र भारत न्यूज़ पेपर मुंबई,  कहानी संग्रह, काव्य संग्रह सम्मान :...
हे धरती माता के रक्षक
कविता

हे धरती माता के रक्षक

ओम प्रकाश त्रिपाठी गोरखपुर ********************** हे धरती माता के रक्षक क्यों बनते हो खुद का भक्षक दुनिया के पेटो को भरने को खुद का पेट जलाते हो पर शस्यश्यामला धरती के सीने में आग लगाते हो। जिसके खूनो को चूस-चूस अनगिन फसलों हे धरती माता के रक्षक क्यों बनते हो खुद का भक्षक दुनिया के पेटो को भरने को खुद का पेट जलाते हो पर शस्यश्यामला धरती के सीने में आग लगाते हो। जिसके खूनो को चूस-चूस अनगिन फसलों को लहकाया जिसकी करुणा से घर आँगन फूलों से तूने महकाया अब उसी धरित्री माता के आँचल को स्वयं जलाते हो। जिन पुत्रों को पाला तुमने उनका ही दुश्मन बन बैठे तेरे इन जले पराली से सांसे उनकी कैसे पैठे हे आवश्यकता के आविष्कारक तृण से क्यो क्यों हारे बैठे हो। . लेखक परिचय :-  ओम प्रकाश त्रिपाठी आल इंडिया रेडियो गोरखपुर आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के सा...