परीक्षाव्रत
परीक्षाव्रत
रचयिता : भारत भूषण पाठक
दोहा - परीक्षापुरी के घाट पर भई परीक्षाव्रती के भीर।
परीक्षार्थी कलम घिसै ध्यान देत परीक्षक बलबीर।।
सुन्दर पावन पुनीत बेला ।
चहुँओर दृश्य अलबेला।।
कभी अधिगम कभी समागम।
और मध्य में बार-बार फूटता बम।।
कलरव का था लगा समाहार ।
हर तरफ केवल एक प्रश्न की गुहार।।
प्रतीत था होता हाहाकार ।
उस पर प्रचण्ड गर्मी का प्रहार।।
चल रहा था विषय पर्यावरण।
था निर्मित अद्भुत वातावरण ।।
था हो रहा हर तरफ पूछताछ का अधिगम ।
और परीक्षक फूट रहे थे बन कर बम।।
मेरी दशा को देखकर।
कहा परीक्षक ने तनिक सोचकर।।
आप भी कुछ जुगाड़ बिठाइए ।
तभी मैंने कहा मैं शाकाहारी हूँ ......
इसलिए मुहतरमा आप मुझसे परे हो जाइये।।
उसने पुन: कहा मैं समझी नहीं ।
मैंने तब उन्हें समझाया ।।
मुहतरमा आज अपन का उपवास है।
संग अपने पर पूर्ण विश्वास है।
इतने में आने को हुए ...