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बरखा

आस्था दीक्षित
 कानपुर (उत्तर प्रदेश)
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नाच नाचने बादल आया,
संग में कितना पानी लाया।

हर ओर थिरकती हवा चली,
मदहोश मचलती मनचली।

सांय-सांय हो इधर उधर,
न पता उसे जाना किधर।

बरखा को न्यौता दे आई,
देख उसे बरखा मुसकाई।

बरखा रानी हवा सयानी,
इक सिरे की दो कहानी।

घन-घन फिर बादल गरजा,
लगा जोर से ढोल बजा।

लो बरखा ने रफ्तार पकड़ ली,
थिरक रही वो छेन छबीली।

हर पत्ता भीगा, डाली भीगी,
हुई धरा भी भीगी-भीगी।

सड़क भीगी, कपड़े भीगे,
छत पर सूखे गेंहू भीगे।

इधर उधर यूं डोल कर,
घूम रही हर गली डगर।

शीतल वन उपवन हर पात-पात,
शीतल बरखा की शीतल मुलाकात।

परिचय –  आस्था दीक्षित
पिता – संजीव कुमार दीक्षित
निवासी – कानपुर (उत्तर प्रदेश)
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।


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