सुधीर श्रीवास्तव
बड़गाँव, जिला-गोण्डा, (उ.प्र.)
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धरती के प्रबुद्ध प्राणियों
माना कि तुम सब
संसार के सबसे
जहीन प्राणी हो।
मगर ऐसा तुम सोचते हो,
मेरी नजर में तो तुम
बुद्धिहीन ही नहीं
सबसे बड़े बुद्धिहीन हो।
क्योंकि तुम
स्वार्थी हो,निपट कलंकी हो,
खुद को इंसान कहते हो,
पर इंसान कहलाने के
लायक नहीं हो।
गलतियां करके भी
औरों को दोष देना
तुम्हारी फितरत है,
तुम्हें तो अपने आप से भी
नफरत है।
तुमने तो भगवान को भी
हमेशा दोषी ठहराया,
अपने कर्मों में कभी
खोट न नजर आया,
जबसे मैं आया
तुम्हारे तो भाग्य खुल गए भाया।
मैं कोई रोग नहीं
दहशत भर हूँ,
बहुत कुछ देखने सुनने
तुम्हें समझाने भी आया हूँ
तुम्हारी औकात बताने आया हूँ।
क्या तुमने इंसानी धर्म निभाया?
अपने माँ बाप, परिवार, समाज को
तुमने क्या-क्या नहीं दिखाया?
लूट, हत्या, अनाचार, अत्याचार
षडयंत्र, भ्रष्टाचार का
नंगा नाच दिखाया।
प्रकृति से खिलवाड़ किया
हरियाली लीलते जा रहे
कंक्रीट के जंगल खड़े किये जा रहे
मानवता, भाईचारा, सहयोग,
सभ्यता से कोसों दूर जा रहे,
इंसान होकर भी इंसानों सा नहीं
जानवरों से भी गये गुजरे हो रहे।
अब जब से मैं आया
तुम्हें बड़ा दुश्मन लगता हूँ,
पर सोचा कभी तुमनें
मैं ऐसा क्यों दिखता हूँ?
मैं बहुत मजबूर हो गया
मगर तुम्हारी ही बेवकूफियों से
बहुत मशहूर हो गया।
क्योंकि तुम्हें तो
अपनी भी फिक्र नहीं है,
बिना हाँड़ माँस का मैं
आज दहशत बन गया हूँ।
पर सोचो तुमनें क्या किया?
मुझे तुम सबने बड़े हल्के में लिया।
न सुरक्षा न सावधानी
लापरवाही भरी सबकी राम कहानी,
अब रो क्यों रहे हो?
तुमनें कब किसे बख्शा है?
जल, जंगल, जमीन का
भरपूर दोहन किया है,
प्रकृति की खूबसूरती का
भरपूर चीरहरण किया है।
किसी को भी तुमनें बख्शा नहीं
बाढ़, सूखा, भूकंप, भूस्खलन
धरती ही नहीं बादलों का भी
फटना तुम्हें खटका ही नहीं,
प्रकृति के हर एक दर्द का
हिसाब लेने आया हूँ।
पर तुम सब बड़े बेशर्म हो
मर रहे हो मगर
अकड़कर अब भी तने हो,
अब भी समय है सँभल जाओ।
मैं कहीं जाने वाला नहीं हूँ
तुम्हारे आँसुओं का यकीन करुँ
ऐसा बेवकूफ नहीं हूँ,
तुम्हारे बहकावे में आने का
शौकीन भी नहीं हूँ।
अब तो यहीं मैं भी
अपना स्थाई घर बनाउंगा,
जब तक तुम समझोगे नहीं
इसी तरह रह रहकर समझाऊँगा।
मुझसे डरना छोड़ो
इंसान हो इंसान बनकर रहो,
प्रकृति से दुर्व्यवहार न करो
धरती माँ को खोखला नंगा न करो
नदियां नाले झरने जल स्रोतों को
अवरुद्ध न करो, खत्म न करो
धरा पर हरियाली का
फिर से आवाहन, स्थापन करो,
आखिर तुम भी तो
इसी धरती, आकाश, प्रकृति का
हिस्सा हो ये समझ जाओ,
मैं भी तुम्हारा दोस्त हूँ
इतना समझ जाओ,
अपना जीवन सरल, संयमित
निर्मल बनाओ।
मगर खुद से तुमको प्यार है
मुझे भी अहसास कराओ।
मेरा डर मन से निकाल दो
कोरोना को बदनाम न करो,
मैंनें तो सिर्फ़ आइना दिखाया है
डर डर के तुम मर रहे
तो आखिर मैं क्या करुँ?
बस आखिरी बार कह रहा हूँ
अपनी जीवनशैली बदल डालो,
हँसकर, रोकर जैसे भी हो
मेरे संग संग जीने की
आदत बना डालो,
मुझे मिटाने का सपना छोड़ दो
जीने के लिए मुझसे
दोस्ती कर डालो।
फिर मिलकर एकता की
पुराना चर्चित गीत
मिलकर गाते हैं,
मिले सुर मेरा तुम्हारा
कि सुर बने हमारा।
परिचय :- सुधीर श्रीवास्तव
जन्मतिथि : ०१/०७/१९६९
शिक्षा : स्नातक, आई.टी.आई., पत्रकारिता प्रशिक्षण (पत्राचार)
पिता : स्व.श्री ज्ञानप्रकाश श्रीवास्तव
माता : स्व.विमला देवी
धर्मपत्नी : अंजू श्रीवास्तव
पुत्री : संस्कृति, गरिमा
संप्रति : निजी कार्य
विशेष : अधीक्षक (दैनिक कार्यक्रम) साहित्य संगम संस्थान असम इकाई।
रा.उपाध्यक्ष : साहित्यिक आस्था मंच्, रा.मीडिया प्रभारी-हिंददेश परिवार
सलाहकार : हिंंददेश पत्रिका (पा.)
संयोजक : हिंददेश परिवार(एनजीओ) -हिंददेश लाइव -हिंददेश रक्तमंडली
संरक्षक : लफ्जों का कमाल (व्हाट्सएप पटल)
निवास : गोण्डा (उ.प्र.)
साहित्यिक गतिविधियाँ : १९८५ से विभिन्न विधाओं की रचनाएं कहानियां, लघुकथाएं, हाइकू, कविताएं, लेख, परिचर्चा, पुस्तक समीक्षा आदि १५० से अधिक स्थानीय से लेकर राष्ट्रीय स्तर की पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित। दो दर्जन से अधिक कहानी, कविता, लघुकथा संकलनों में रचनाओं का प्रकाशन, कुछेक प्रकाश्य। अनेक पत्र पत्रिकाओं, काव्य संकलनों, ई-बुक काव्य संकलनों व पत्र पत्रिकाओं, न्यूज पोर्टल्स, ब्लॉगस, बेवसाइटस में रचनाओं का प्रकाशन जारी।अब तक ७५० से अधिक रचनाओं का प्रकाशन, सतत जारी। अनेक पटलों पर काव्य पाठ अनवरत जारी।
सम्मान : विभिन्न साहित्यिक संस्थाओं द्वारा ४५० से अधिक सम्मान पत्र। विभिन्न पटलों की काव्य गोष्ठियों में अध्यक्षता करने का अवसर भी मिला। साहित्य संगम संस्थान द्वारा ‘संगम शिरोमणि’सम्मान, जैन (संभाव्य) विश्वविद्यालय बेंगलुरु द्वारा बेवनार हेतु सम्मान पत्र।
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।
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