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अजनबी – अपने

चेतना ठाकुर
चंपारण (बिहार)

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अजनबी के
मोहब्बत से डर गई।
अपनों के
नफरत से डर गई।
किसी के
इजहार से डर गई।
अपनों के
इनकार से डर गई।
इसी डर से
न अजनबी की हुई,
ना अपनों की।
दूसरों पर
विश्वास ना किया
और अपनों की
बेवफाई से डर गई ।
मैं ढूंढती रही
सारी रात ,सुबह को
और अंधेरे के
गहराई से डर गई।

.

परिचय :-  नाम – चेतना ठाकुर
ग्राम – गंगापीपर
जिला –पूर्वी चंपारण (बिहार)


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