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वो पुरुष ही है

आशीष तिवारी “निर्मल”
रीवा मध्यप्रदेश
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वो पुरुष ही है जिसने
साथ निभाया
जन्म से मरन तक
वो पुरुष ही है जो साथ
चला ठिठुरन से जलन तक।।

वो खुल कर ना हंसा
ना रोया अब्र से कब्र तक
खुद को संभाल कर
रखा जब्र से सब्र तक।।

चलता ही रहा वह
सवेरे से रात तक
थका नहीं कभी चलती
उखड़ती सांस तक।।

खुद को संभाले रखा
घटते-बढ़ते रक्तचाप तक
माथे का पसीना पोंछते और
देह को मरोड़ते ताप तक।।

किरदार को निभाया खूब
नींद से लेकर जाग तक
रहा सदैव मर्यादा में हंसी
और ऊंचे विलाप तक।।

असफलता पर
कटी नाक तक
और सफलता पर
रोती आंख तक।।

हर अवसर पर
जन्मदिन से ब्याह तक
खुद से जुड़े सारे
रिश्तों के निबाह तक।।

सहज सरल स्वभाव
से लेकर अक्खड़ तक
धुंए से लेकर उड़ते
धूल धक्कड़ तक।।

घर के काम लेकर
दफ्तर तक
उम्र पांच से लेकर
पच्चहत्तर तक।।

हर रिश्ते को
दिल से निभाया
कभी किसी को नहीं
अपना दुख बतलाया।।

टूटे दिल के साथ
भी मुस्कुराया
खुद के लिए और
परिवार के लिए कमाया।।

खुद भूखे पेट रहकर भी
वो परिवार को भूखा न सुलाया
परिवार को भरपेट
खिलाया फिर खुद खाया।।

और कितना करूं
उस पुरुष का बखान
जो सब कुछ सहता है
बनकर एक अंजान।।

परिचय :- आशीष तिवारी निर्मल का जन्म मध्य प्रदेश के रीवा जिले के लालगांव कस्बे में सितंबर १९९० में हुआ। बचपन से ही ठहाके लगवा देने की सरल शैली व हिंदी और लोकभाषा बघेली पर लेखन करने की प्रबल इच्छाशक्ति ने आपको अल्प समय में ही कवि सम्मेलन मंच, आकाशवाणी, पत्र-पत्रिका व दूरदर्शन तक पहुँचा दीया। कई साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित युवा कवि आशीष तिवारी निर्मल वर्तमान समय में कवि सम्मेलन मंचों व लेखन में बेहद सक्रिय हैं, अपनी हास्य एवं व्यंग्य लेखन की वजह से लोकप्रिय हुए युवा कवि आशीष तिवारी निर्मल की रचनाओं में समाजिक विसंगतियों के साथ ही मानवीय संवेदनाओं से परिपूर्ण, भारतीय ग्राम्य जीवन की झलक भी स्पष्ट झलकती है, इनकी रचनाओं का प्रकाशन एवं प्रसारण विविध पत्र-पत्रिकाओं एवं दूरदर्शन-आकाशवाणी के विविध केंद्रों से निरंतर हो रहा है। वर्तमान समय पर हिंदी और बघेली के प्रचार-प्रसार में जुटे हुए हैं।
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है, एवं आलेखों में व्यक्त किये गए विचार मेरे स्वयं के हैं। 


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