
रवि कुमार
बोकारो, (झारखण्ड)
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तोड़ सारी जंजीरों को मै
एकदिन को उड़जाऊंगी
सपनों से भरे है पंख मेरे,
मै पंख अपने फैलाऊंगी
रित-रिवाज कैसी है ये।
कैदखाने जैसी है ये।।
फिर-भी दूर आसमान में
अपनी जगह बनाऊंगी
परम्पराओं से बंधे है पैर
मै फिर भी पंख फैलाऊंगी
तोड़ सारी जंजीरों को मै
एकदिन को उड़जाऊंगी
सपनों से भरे है पंख मेरे,
मैं पंख अपने फैलाऊंगी
परिचय :– रवि कुमार
निवासी – नावाड़ीह, बोकारो, (झारखण्ड)
घोषणा पत्र : यह प्रमाणित किया जाता है कि रचना पूर्णतः मौलिक है।
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